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Albela Khatri

किसानों घर राशन की भूख है ...........

वासना के रोगियों को

भूख है शरीर की तो

आम जनता को आश्वासन की भूख है


ये वाले हों,चाहे हों वो वाले,

सभी नेताओं को

सत्ता यानी दिल्ली के सिंहासन की भूख है


कवियों को भूख होती

कविता के श्रोताओं की

श्रोताओं को लीडर के भाषण की भूख है


देखा नहीं जाता बन्धु,

कैसी ये विडम्बना है

देश के किसानों घर राशन की भूख है

4 comments:

ओम आर्य June 14, 2009 at 11:30 AM  

बहुत ही सुन्दर लिखी है आपने ..............ये भूख भी अजीब होती है.पर मिटती नही है.

ओम आर्य June 14, 2009 at 11:33 AM  

सही लिखा आपने ..............ये भूख भी अजीब होती है जिसमे सब कुछ मिट जाती है पर भूख नही मिटती.

ताऊ रामपुरिया June 14, 2009 at 12:23 PM  

बिल्कुल सत्य है जी.

रामराम.

Udan Tashtari June 15, 2009 at 10:14 PM  

देखा नहीं जाता बन्धु,
कैसी ये विडम्बना है
देश के किसानों घर राशन की भूख

--मार्मिक!!

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