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Albela Khatri

आम + आदमी = आम आदमी

मैं आज अपना सीना ठोक के कहता हूं कि मैं भारत गणतंत्र का नागरिक हूं। नागरिक इसलिए हूं क्योंकि नगर में रहता हूं और सीना इसलिए ठोक रहा हूं क्यूंकि एक तो इससे वक्ता की बात में वजन आ जाता है, दूसरे सीना भी अपना है और ठोकने वाले भी अपन ही हैं इसलिए किसी दूसरे की आचार संहिता भंग होने का डर नहीं है। हालांकि मैं सीने के बजाय पीठ भी ठोक सकता हूं, लेकिन ठोकूंगा नहीं, क्यूंकि एक तो वहां तक मेरा हाथ ठीक से नहीं पहुंचता, दूसरे ज्यादा ठुकाई होने से पीठ में दर्द हो सकता है और तीसरे मैं एक कलाकार हूं यार, कोई नेता थोड़े न हूं जो अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोकता रहूं।

सरकारी और गैर सरकारी सूत्र मुझे आम आदमी कह कर चिढ़ाते हैं जबकि मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं कोई आम-वाम नहीं हूं। आम क्या, आलू बुखारा भी नहीं हूं, हां चाहो तो आलू समझ सकते हो क्योंकि एक तो मैं जमीन से जुड़ा हुआ हूं। दूसरे मेरी खाल इतनी पतली है कि कोई भी उधेड़ सकता है, तीसरे गरीब से गरीब और अमीर से अमीर, सभी मुझे एन्जॉय कर सकते हैं और चौथे हर मौसम में, हर हाल में सेवा के लिए मैं उपलब्ध रहता हूं। न मुझे गर्मी मार सकती है न सर्दी, लेकिन मुझे आलू नहीं, आम कहा जाता है और इसलिए आम कहा जाता है ताकि मेरे रक्त को रस की तरह पिया जा सके। हालांकि ये रक्त पिपासु भी कोई बाहर वाले नहीं हैं, अपने ही हैं, बाहर वाले तो जितना पी सकते थे, पीकर पतली गली से निकल लिए, अब अपने वाले बचाखुचा सुड़कने में लगे हैं। मजे की बात ये है कि बाहर वाले तो कुछ छोड़ भी गए, अपने वाले पठ्ठे तो एक-एक बून्द निचोड़ लेने की जुगत में है।

कल रात एक भूतपूर्व सांसद से मुलाकात हो गई। हालांकि वे भूतपूर्व होना नहीं चाहते थे लेकिन होना पड़ा क्योंकि भूतकाल में उन्होंने एक अभूतपूर्व काम कर किया था। (लोगों से रुपया लेकर संसद में सवाल पूछने का) जिसके चलते वे एक स्टिंग आप्रेशन की चपेट में आ गए और भूत हो गए। मैंने पूछा, 'भूतनाथजी, ये नेता लोग जनता को आम जनता क्यों कहते हैं? वो बोले, वैसे तो बहुत से कारण हैं लेकिन मोटा-मोटी यूं समझो कि आम जो है, वो फलों का राजा है और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ही असली राजा होती है, शासक तो बेचारा सेवक होता है। दूसरा कारण ये है कि आम का सीजन, आम चुनाव की तरह कुछ ही दिन चलता है, बाकी समय तो बेचारा लापता ही रहता है, लेकिन तीसरा और सबसे खास कारण ये है कि आम स्वादिष्ट बहुत होता है। इसे खाने में मजा बहुत आता है, चाहे किसी प्रान्त का हो, किसी जात का हो, किसी रंग का हो अथवा किसी भी साइज का हो।

आम के आम और गुठलियों के दाम तो आपने सुना ही होगा, जनता को आम कहने का एक कारण ये भी है कि इसे खाने में कोई खतरा नहीं क्यूंकि न तो इनमें कीड़े पड़ते है, न इसकी गुठली में कांटे होते हैं और न ही इनसे अजीर्ण होता है, अरे भाई आम तो ऐसी चीज है कि लंगड़ा हो, तो भी चलता है। मैंने कहा, नेताजी आप एक बात तो बताना भूल ही गए कि आम हर उम्र में उपयोगी होता है।

कच्चा हो तो अचार डालने के काम आता है, पका हुआ रसीला हो तो काट-काट के खाया जा सकता है और बूढ़ा, कमजोर व पिलपिला हो तो चूसने के काम आता है लेकिन सावधान नेताजी..अब आदमी को आम कहना छोड़ दो, क्योंकि वो अब आम से खास हो गया है। विद्रोह की परीक्षा में पास हो गया है। जिस दिन कोई ढंग का बन्दा नेतृत्व के लिए आगे आ जाएगा उस दिन आप जैसे स्वार्थी, मक्कार और दुष्ट नेताओं का राजनीतिक कार्यक्रम, किरिया क्रम में बदल जाएगा। इसलिए सुधर जाओ, अब भी मौका है।

उसने मुझे खा जाने वाली नजरों से घूरा। मैंने कहा, घूरते क्या हो? समय बदल चुका है। जिस जनता को तुम पांव की जूती समझते थे वो अब जूते चलाना सीख गई है। इससे पहले कि हर आदमी अपने हाथ में जूता ले ले, तुम लाईन पर आ जाओ वरना ऐसी ऑफ लाइन पर डाल दिए जाओगे जहां से आगे कोई रास्ता नहीं होगा आपके पास। विश्र्वास नहीं होता तो जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को ही देख लो जो अब घर बैठ गए हैं। नेताजी मेरी बातों से उखड़ गए और चलते बने। मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गया, लेकिन मेरे मन में एक विजेता जैसी सन्तुष्टि है। मैंने सिद्ध कर दिया कि मैं कोई आम नहीं हूं।

वोट दो भाई वोट दो

आज मौका मिला है और सुनहरी मौका मिला है। मेरे भाई इस मौके को हम चूकें नहीं, इस मौके को हम छोड़ें नहीं...बल्कि लपक लें, पकड़ लें और पूरा फायदा उठाएं इस मौके का। क्योंकि आज ही का दिन हमारा है। आज ही हमारा राज है और आज ही के दिन हम राजा हैं। इसलिए आज के दिन हमें राजा की तरह निर्णय लेना है। न तो किसी लालच में आना है और न ही किसी से डरना है। सि़र्फ और सि़र्फ अपने देश का हित सोचना है तथा मां भारती के आंसू पोंछने का प्रयास करना है।
लोग क्या कहते हैं, इस पर ध्यान मत दो। जात वाले, समाज वाले, जानवाले, पहचान वाले, ये वाले, वो वाले सब आएंगे और अपनी-अपनी राय देंगे, लेकिन सभी रायचन्दों को दरकिनार करते हुए सि़र्फ अपने विवेक से काम लेना है। क्योंकि वोट तुम्हारा है, तुम्हारी निजि सम्पाि है और अपनी निजि सम्पाि कभी किसी ऐरे-गैरे को नहीं दी जाती हमेशा उसे दी जाती है जो पात्र हो और सुपात्र हो ताकि वह उस सम्पत्ती का सम्मान कर सके और उसकी रक्षा भी कर सके।
हमारा देश आज संकट के दौर से गु.जर रहा है। हर तरफ़ अफरा-तफरी मची है। छोटे से लेकर बड़े तक व गुमनाम से लेकर मशहूर तकस्न्, सभी जन परेशान हैं क्योंकि पिछले कई सालों से हमारी राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्थायें वैसी नहीं हैं जैसी होनी चाहिए और इसका एक मात्र कारण यह है कि सभी सियासी लोग अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में और अपनों के घर भरने में लगे हैं। पूरे प्रबंधन में लूट मची है और जनता असहाय खड़ी देख रही है। कुछ भी नहीं कर पा रही है।
आज......सिर्फ आज का दिन जनता का दिन है इसलिए उठो, और सम्हालो अपने मुल्क़ को। बचालो, अब भी बचालो इस देश को। क्योंकि ये दुर्गति इसलिए नहीं हुई कि अच्छे लोग चुनाव में खड़े नहीं हुए थे, बल्कि इसलिए हुई है कि अच्छा-बुरा का भेद समझने वाले लोगों ने वोट ही नहीं दिया था। अर्थात्‌ अपराधी वो नहीं जिन्होंने गलत लोगों को चुना, अपराधी वो हैं जिन्होंने सही व्यक्ति को नहीं चुना। इसलिए वोट दीजिए, .जरूर दीजिए। बस छोड़नी पड़े तो छोड़ो, ट्रेन छोड़नी पड़े तो छोड़ो, पिकनिक, सिनेमा, किट्टी-विट्टी, सब छोड़ो यहां तक कि आज ऑफिस, दुकान, फैक्ट्री, नौकरी कुछ भी छोड़ना पड़े तो छोड़ो लेकिन वोट डालने का अवसर मत छोड़ो। क्योंकि आज अगर वोट नहीं दिया तो बाद में सि़र्फ हाथ मलते रह जाओगे।
यदि भारत को बचाना है और देश में शान्ति पूर्ण व्यवस्था बनाये रखनी है तो मेरे प्यारे पाठकों, मैं आप से करबद्ध निवेदन करता हूं कि मतदान करने जाओ और इतनी श्रद्धा से जाओ जैसे मंदिर में दर्शन करने जाते हो, इतनी खुशी से जाओ जैसे अपनी शादी में जाते हो और ऐसी मस्ती में जाओ जैसे अपनी प्रेयसी से मिलने जाते हो।
जाओ भाई जाओ, जल्दी जाओ... भ्रष्ट तथा अवांछित तत्वों पर चोट करो और एक साफ सुथरी, मजबूत सरकार के लिए वोट करो।

मेगा प्रधानमंत्री मण्डल

यों तो मुकेश अंबानी और मुझमें बहुत से फर्क हैं, मैं आपको गिनाना भी चाहूं तो कहां तक गिना और कहां तक आप झेलेंगे, लेकिन सबसे बड़ा फर्क ये है कि उनके पास सब कुछ है सि़र्फ टाइम नहीं है और मेरे पास टाइम ही टाइम है इसके अलावा कुछ नहीं है। फिर भी उनमें और मुझमें एक समानता है। वो ये कि उन्हें भी मुफ्तखोरों से परहेज है और मैं भी मुफ्तखोरों को मुंह नहीं लगाता । वे भी अपना माल किसी को फोकट में नहीं देते और मैं भी किसी को मुफ्त में एन्टरटेन नहीं करता। लेकिन कहना मत किसी से.... आज मैं आपको एक बात बिल्कुल निःशुल्क बता रहा हूं और वो बात ये है कि कल मैंने जो लेख लिखा था उसको सूरत शहर के बुद्धिजीवियों का .जबर्दस्त प्रतिसाद मिला। इतना मिला, इतना मिला कि दिन भर फोन आते रहे और मैं सबकी बधाइयां स्वीकार करता रहा। कुछ फोन परिचितों के थे, कुछ अपरिचितों के थे, लेकिन सबके सब लोकतेज के नियमित पाठक थे।
लोगों ने मेरे द्वारा अविष्कृत बहु प्रधानमंत्री फार्मूले की खूब प्रशंसा की और इसे एक क्रान्तिकारी सोच बता-बता कर मुझे ऐसा चने के झाड़ पे बैठाया कि अभी तक फूला नहीं समा रहा हूं, लेकिन लोगों ने प्रशंसा के साथ-साथ मुझे एक संकट भी दे दिया। उन्होंने डिमाण्ड की कि मैं उन्हें मेरे सपनों का मंत्रीमण्डल बनाकर दिखान्नं। अब मैं कोई चुनाव तो लड़ नहीं रहा हूं कि लोगों के वोट लेने के लिए अपना प्रधानमंत्री मण्डल घोषित करूं, लेकिन पाठक चाहते हैं इसलिए कर देता हूं।
तो साहब मैं आपको साफ-साफ बता दूं कि मैं अगर किसी सियासी पार्टी का सदर होता तो अपने घोषणा पत्र में और कुछ नहीं लिखता, केवल अपना भावी प्रधानमंत्री मण्डल ही लिखता जिसे देखकर सभी लोग मेरी पार्टी को समर्थन दे देते और सरकार भी बन जाती बिना किसी को बुढिय़ा बताये, बिना किसी का हाथ काटे और बिना किसी पर रोड रोलर चलाये। मेरी सरकार का वह हाहाकारी प्रधानमंत्री मण्डल ऐसा होताः-
वरिष्ठ प्रधानमंत्री : डॉ. मनमोहन सिंह
मुख्य प्रधानमंत्री : लालकृष्ण अडवाणी
विशेष प्रधानमंत्री : लालू यादव
कार्यवाहक प्रधानमंत्री : शरद पवार
अतिरिक्त प्रधानमंत्री : मुलायम सिंह
मनोनीत प्रधानमंत्री : मुरली मनोहर जोशी
उप प्रधानमंत्रीस (1) :प्रफुल्ल पटेल
उप प्रधानमंत्री (2) : अभिषेक मनु संघवी
उप प्रधानमंत्रीस (3) :अरुण जेटली
उप प्रधानमंत्री (4) : रामविलास पासवान
उप प्रधानमंत्री (5) : ममता बेनर्जी
प्रधान गृहमंत्री : नरेन्द्र मोदी
प्रधान वित्तमंत्री : चिदम्बरम
प्रधान खेलमंत्री : सचिन तेंदुलकर
प्रधान स्वास्थ्यमंत्री : जयललिता
प्रधान रेलमंत्री : कर्नल बैंसला
प्रधान उद्योगमंत्री : रतन टाटा
और इसी प्रकार बाकी सब मंत्रालय के भी प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिए जाते। ये आइडिया मुकेश अम्बानी को भी आ सकता था, लेकिन नहीं आया क्योंकि उनके पास ऐसी फालतू बातों के लिए टाइम नहीं है, और मुझे आना ही था क्योंकि अपने पास टाइम के अलावा कुछ नहीं है। क्यूं कैसी रही काका?

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tepa & wageshwari award winner the great indian laughter champion -2 fame hindi hasyakavi, lyric writer,music composer, producer, director, actor, t v  artist  & blogger from surat gujarat . more than 6200 live performance world wide in last 27 years
this time i creat an unique video album SHREE HINGULAJ CHALISA for TIKAM MUSIC BANK
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