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आलस्य के लिए प्रायश्चित करना असाधारण है



पानी में अगर सिवार हो तो 

मनुष्य उसमे  अपना प्रतिबिम्ब  नहीं देख सकता .  

इसी प्रकार जिसका चित्त आलस्य  से पूर्ण  होता है, 

वह अपना ही हित नहीं समझ सकता, 

दूसरों का तो क्या समझेगा .

- महात्मा बुद्ध 




पाप के  लिए प्रायश्चित  करना तो साधारण है  

लेकिन आलस्य के लिए प्रायश्चित करना असाधारण है 


- जून्नुन








 www.albelakhatri.com  

2 comments:

शिवम् मिश्रा July 4, 2010 at 5:33 PM  

क्या कहने महाराज ! बहुत खूब !

soni garg July 5, 2010 at 11:06 AM  

great..........

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