धन्य-धन्य ये धरती जिस पर ऐसे वीर जवान हुए
मातृ-भूमि की ख़ातिर जो हॅंसते हॅंसते क़ुरबान हुए
जिनकी कोख के बलिदानों पर गर्व करे मॉं भारती
आओ हम सब करें आज उन माताओं की आरती
आओ गाएं हम..
वन्दे मातरम् ...
वन्दे मातरम् ...
वन्दे मातरम् ...
ऑंचल के कुलदीप को जिसने देश का सूरज बना दिया
अपने घर में किया अन्धेरा, मुल्क़ को रौशन बना दिया
जिनके लाल मरे सरहद पर क़ौम की आन बचाने में
जान पे खेल गए जो मॉं के दूध का कर्ज़ चुकाने में
है उन पर बलिहारी, देश की जनता सारी
देश की जनता सारी, है उन पर बलिहारी
जो माताएं इस माटी पर अपने बेटे वारतीं
आओ हम सब करें आज उन माताओं की आरती... आओ गाएं हम...
जिनके दम पर फहर रहा है आज तिरंगा शान से
जिनके दम पर लौट गया है दुश्मन हिन्दोस्तान से
जिनके दम पर गूंजी धरती विजय के गौरव-गान से
जिनके दम पर हमें देखता जग सारा सम्मान से
है उन पर बलिहारी, देश की जनता सारी
देश की जनता सारी, है उन पर बलिहारी
जिनकी सन्तानें दुश्मन को मौत के घाट उतारतीं
आओ हम सब करें आज उन माताओं की आरती ... आओ गाएं हम...
जिन मॉंओं ने दूध के संग-संग राष्ट्र का प्रेम पिलाया
जिन मॉंओं ने लोरी में भी दीपक राग सुनाया
जिन मॉंओं ने निज पुत्रों को सीमा पर भिजवाया
जिन मॉंओं ने अपने लाल को हिन्द का लाल बनाया
है उन पर बलिहारी, देश की जनता सारी
देश की जनता सारी, है उन पर बलिहारी
जिनकी ममता रण-भूमि में सिंहों सा हुंकारती
आओ हम सब करें आज उन माताओं की आरती ... आओ गाएं हम...
वन्दे मातरम् ...
वन्दे मातरम् ...
वन्दे मातरम् ...
माताओं की आरती
Labels: देशभक्ति गीत
ढूंढते रह जाओगे...
लूटो खाओ मौज करो आज़ादी है
कभी किसी से नहीं डरो आज़ादी है
मौत बहुत सस्ती कर दी नेताओं ने
जी चाहे तो रोज़ मरो आज़ादी है
कल रात दो बजे मैंने एक लोकल नेता का चरित्र देखा और देख कर ख़ूब एन्जॉय किया। अब आप भी करो। हुआ यूं कि नशे में धुत्त वह नेता लड़खड़ाता हुआ सड़क पर चल रहा था। फुटपाथ पर एक बुज़ुर्ग कुत्ता सोया हुआ था, नेता को पता नहीं क्या सूझी, उस सोये हुए कुत्ते पर ज़ोर से एक लात चला दी, बेचारा नींद का मारा कुत्ता रोता हुआ वहां से भागा । ये देख कर मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैंने नेता से कुछ नहीं कहा, पीड़ित कुत्ते के पास गया और प्यार से पूछा कि उस नेता ने अकारण ही तुझे लात मार दी, क्या तुझे गुस्सा नहीं आया, क्या तेरा ख़ून नहीं खौला, क्या तेरे मन में उसे काटने के भाव नहीं जगे? वो बोला - जगे भाई साहब जगे, बहुत जगे, पर क्या करूं, वो नेता है, नेताओं के मुंह कौन लगे?
गाड़ी फिएट हो या फोर्ड,
चलाने के लिए ज़रूरत तेल की होगी
और चान्द पर बस्ती पहले रूस बसाये या अमेरिका
पर पहली मॉटेल वहां किसी पटेल की होगी।
ये दो पंक्तियां मैंने पहली बार सन 1996 के अगस्त महीने की 27 तारीख को अमेरिका के नॉक्सविल (टेनिसी) में जब सुनाईं तो तालियों की .जबर्दस्त गड़गड़ाहट से वह समूचा मंदिर गूंज उठा जहां हमारा रंगारंग कार्यक्रम चल रहा था। इन पंक्तियों की भयंकर 'वन्स मोर' हुई, तो मैंने फिर सुनाईं। फिर भी वन्स मोर हुई और तब तक होती रही जब तक कि लोग सुन-सुन के और मैं सुना-सुना के धाप नहीं गया। आगे की रॉ में बैठे एक काकाजी उठ के मंच पर आए और जेब में से 100 डॉलर का एक नोट निकाल कर मुझे भेंट किया। मैं बड़ा प्रसन्न हुआ... मैं क्या कोई भी प्रसन्न होता, तुम्हें मिलता तो तुम भी प्रसन्न होते... लेकिन मैं रातभर सोचता रहा कि आखिर ऐसी क्या बात थी इन पंक्तियों में कि लोगों ने इतना भारी प्रतिसाद दिया। जबकि दर्शकों में पटेल लोग बहुत कम थे.. ज्य़ादातर बंगाली, मराठी व दक्षिण भारतीय थे.. कुछ एक पाकिस्तानी भी थे। और मज़े की बात ये थी कि ज्य़ादातर लोग हिन्दी को पूरी तरह समझते भी नहीं थे। मैंने बहुत चिन्तन किया लेकिन समझ नहीं पाया।
अगले दिन नैशविल (टेनिसी) के डी.वी. पटेल ने बताया कि जो 40-50 लोग हिन्दी समझने वाले या गुजराती मूल के लोग थे उन्होंने तो इसलिए वन्स मोर किया क्यूंकि पूरे नॉर्थ अमेरिका में मॉटेल का सारा कारोबार पटेलों के हाथ में है और वे इस क्षेत्र में वाक़ई छाये हुए हैं जबकि अहिन्दी भाषियों ने सि़र्फ इसलिए पसन्द किया क्यूंकि उसमें पटेल का नाम था और वहां के लोग पटेल से सीधा अर्थ सरदार वल्लभ भाई पटेल लगाते हैं। अब चूंकि भारतीय ही नहीं, ग़ैर भारतीय भी सरदार पटेल की स्मृति को अत्यधिक सम्मान देते हैं इसलिए लोगों ने इन पंक्तियों को इतना सराहा। उनकी समझ में और कुछ आया या नहीं, लेकिन पटेल ज़रूर समझ में आ गया था। ये सुनके मेरे रोंगटे खड़े हो गए.... इतना सम्मान? भारत के नेताओं का इतना सम्मान? काश... कि ऐसे नेता आज भी होते... लेकिन आज तो नेता ऐसे मिल रहे हैं कि
सर में भेजा नहीं है फिर भी सोच रहे हैं
खुजली ख़ुद को है, पब्लिक को नोच रहे हैं
अब क्या बतलाऊं हाल मैं इन नेताओं का
मैल जमी है चेहरे पर और दर्पण पोंछ रहे हैं
पुराने नेताओं और आज के नेताओं में ज़मीन-आस्मां का फ़र्क है। पहले नेता से ऐसे बात होती थीः नेताजी कहां से आ रहे हो - दिल्ली से आ रहा हूं, कहां जा रहे हो- अपने चुनाव क्षेत्र में जा रहा हूं, यहां कैसे-कलेक्टर से थोड़ा काम था गांव का, वही करवा रहा हूं। जबकि आज के नेता से ऐसी बात होती है : नेताजी कहां से आ रहे हो-कांग्रेस से आ रहा हूं, कहां जा रहे हो-भाजपा में जा रहा हूं, यहां कैसे - बसपा वालों का भी कॉल आने वाला है, उसी के लिए खड़ा हूं।
इन ख़ुदगर्ज़ और अवसरवादी नेताओं की एक लम्बी जमात है इसीलिए इतने खराब हालात हैं। काश.. ये नेता सुधर जाएं तो भारत के भी दिन फिर जाएं..। पर अपनी तो तक़दीर ही खराब है। अपन मांगते कुछ हैं और मिलता कुछ है। राम को मांगा तो राम नहीं मिले सुखराम मिल गया, राणा प्रताप मांगा तो विश्र्वनाथ प्रताप मिल गया, झांसी की रानी मांगी तो रानी मुखर्जी मिली और सरदार पटेल को चाहा तो सरदार मनमोहनजी मिल गए। पता नहीं कब कोई ढंग की सरकार आएगी...और देश को अच्छे से चलाएगी। लेकिन अनुभव बताता है कि अब ईमानदार नेता मिलने बड़े मुश्किल हैं। जैसे धतूरे में इत्र नहीं होता वैसे ही आजकल नेता में चरित्र नहीं होता। कवि हुक्का बिजनौरी ने जो बात पुलिस के लिए कही, वही मैं नेता के लिए कहता हूं-
नेता और ईमान?
क्या बात करते हो श्रीमान?
सरदारों के मोहल्ले में नाई की दुकान?
ढूं....ढ़ते रह जाओगे
Labels: हास्य व्यंग्य
हमारा गुजरात
गुजरात नी सू वात छे
गुजरात तो गुजरात छे
पत्थर में पारस की,
पंछी में सारस की,
तिथियों में ग्यारस की बात ही कुछ और है,
दुनिया में एशिया की,
एशिया में भारत की
और भारत में गुजरात की बात ही कुछ और है।
गुजरात का बन्दा.....कमाल का बन्दा, बिजनैस माइण्डेड, इतना बिजनैस माइण्डेड कि कूएं में भी गिर जाए तो चिल्लाता बाद में है, पहले नहाता है और तब तक नहाता है जब तक कि मीडिया वालों का कैमरा नहीं आ जाता है। गुजरात का बन्दा..डॉक्टर भी बनेगा तो दान्त का। मेरे एक दोस्त हैं डॉक्टर वशिष्ठ, डेन्टिस्ट हैं। मैंने पूछा, 'क्या कारण है कि आप डेन्टिस्ट ही बने?' वो बोले, 'धन्धा नी वात छे। क्या है कि बाकी सारे पार्ट बॉडी में एक दो पीस होते हैं पर दान्त बत्तीस होते हैं।
गुजराती आदमी चूंकि व्यावसायिक ज्ञान में सबसे आगे होता है इसलिए मैंने एक काका से पूछा, 'काका, दूकान लगाने के लिए कोई बढिय़ा जगह बताओ', वो बोले, 'शमशान में लगाओ, वहां उधार डूबेगी नहीं, अगर कोई लेके चला भी जाएगा, आखिर तो वहीं आएगा।' गुजराती लोगों की व्यावसायिक सफलता इन दो पंक्तियों में उजागर होती हैं कि शादी चाहे किसी की हो, पहली मनुहार बाराती की होगी और चांद पर बस्ती पहले रूस बसाये या अमेरिका पर वहां पहली दूकान किसी गुजराती की होगी।
यहां पहली का उल्लेख मैंने इसलिए किया है क्योंकि दुनिया का सबसे पहला मंदिर (सोमनाथ) गुजरात में हैं, वेदों का पहला हिन्दी टीकाकार व भाष्यकार (स्वामी दयानंद) गुजरात में हुआ, अहिंसा के सहारे समूचे देश को एक सूत्र में बान्धने वाला पहला नेता या यूं कहें लोक नेता (महात्मा गांधी) गुजरात में हुआ, संगीत की दुनिया को स्वरलिपि की सौगात देने वाला महान संगीतज्ञ (उस्ताद मौलाबख्श) गुजरात ने दिया, भारत को पहला लौहपुरूष (सरदार वल्लभभाई पटेल) गुजरात ने दिया, हमारी लोकसभा को पहला अध्यक्ष (गणेश माळवणकर) गुजरात ने दिया, भारत में वस्त्रउद्योग का श्रीगणेश करने वाला पहला उद्योगपति (कस्तूरभाई लालभाई) गुजरात ने दिया, सिनेमा जगत की पहली बोलती फ़िल्म (आलमआरा) भी एक गुजराती ने बनाई, भारतीय टेस्ट क्रिकेट को पहली विजय भी एक गुजराती क्रिकेटर ने दिलाई, भारत का पहला का शक्कर कारखाना (बारडोली) भी गुजरात में कायम हुआ और स्वमूत्र चिकित्सा का ज्ञान देने वाले पहले विद्वान (मोरारजी देसाई) के साथ-साथ शेयर बाज़ार को हिला देने वाला पहला महा घोटालेबाज़ (हर्षद मेहता) भी गुजरात ने ही दिया।
जनरल माणेक शा, सैम पित्रोदा, सुनीता विलियम्स, विक्रम साराभाई, महादेव देसाई व धीरू भाई अंबानी जैसे महान लोगों की एक लम्बी सूची है जिन्होंने अपने पुरूषार्थ से गुजरात के सम्मान और स्वाभिमान को पूरी दुनिया में जगमगाया है। आओ गुजरात दिवस के स्वर्णिम अवसर पर इस रत्नगर्भा धरती को और इस धरती के रत्नों को प्रणाम करें और विश्वास व्यक्त करें कि आने वाले समय में गुजरात हमारे देश को वो प्रधानमंत्री भी देगा जो पूरी दुनिया में भारत को सबसे ऊंचे सिंहासन पर बैठाकर इसे पुनः विश्वगुरू होने का सम्मान दिलाएगा।
भक्ति भावना से उजियारा गुजरात
साहित्य सुधा की रसधारा गुजरात
कला-संस्कृति का रखवारा गुजरात
शौर्य और वीरता का नारा गुजरात
सौन्दर्य का शीतल फौव्वारा गुजरात
वसुधा की शान का सितारा गुजरात
दुनिया में सबसे है न्यारा गुजरात
स्वर्ग-सा सुरम्य है हमारा गुजरात
Labels: सन्दर्भ लेख
पीएम साहब शर्मिन्दा हैं
माननीय मनमोहनसिंहजी आजकल शर्मिन्दा हैं और घोर शर्मिन्दा हैं। इतने शर्मिन्दा हैं कि दुनिया में किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। इसलिए वे उसे छुपाते फिर रहे हैं, लेकिन मुंह है कि छुपने का नाम नहीं ले रहा है, जितना छुपाओ उतना ज्य़ादा ज़ूम होकर सामने खड़ा हो जाता है। अब करे तो क्या करे? कैसे आंख मिलाये वे मिस्टर क्वात्रोची से जिसके पीछे भाजपा वाले लट्ठ लेकर पड़े हैं और पूरी दुनिया भारत सरकार पर थू-थू कर रही है। हालांकि शर्मिन्दगी के मामले में मनमोहनजी तन्हा नहीं हैं, अकेले नहीं हैं, सोनियाजी से लेकर कपिल सिब्बल तक सारे के सारे कांग्रेसी लीडर शर्मसार हैं और अपने कर्मों को रो रहे हैं। या यूं कहो कि रो रो कर क्वात्रोची के पांव धो रहे हैं । लेकिन मनमोहनजी शर्मिन्दा होने में टॉप पर हैं। वे सर्वाधिक शर्मिन्दा हैं क्योंकि वे सर्वाधिक ग्लोबलाइज्ड हैं और सोनियाजी द्वारा हाइली ओब्लाइज्ड हैं।
देश के प्रधानमंत्री का यूं शर्मिन्दा होना, जनता के लिए बड़े दुःख की बात होनी चाहिए, लेकिन मुझे कोई दुःख नहीं है। उलटे मुझे तो ख़ुशी हो रही है, ख़ुशी ही नहीं, गर्व हो रहा है कि अभी भी अपने नेताओं में कुछ शर्म बाकी है। पूरी तरह मरी नहीं है। शर्म है, तभी तो शर्मिन्दा हो पा रहे हैं, यदि शर्म ही नहीं होती तो शर्मिन्दा कैसे होते? आने दो मेरी पत्नी को, मैं उसको बताऊंगा कि हमारे देश के नेताओं में अभी भी शर्म बाकी है। सॉरी...आई. एम. रीयली सॉरी मनमोहनजी, मैंने नेताओं को बेशर्म समझ लिया था। अच्छा किया आपने मेरी आंखें खोल दीं।
लेकिन सर.... एक बात तो बताइये, क्या आपने अपनी सारी शर्म मिस्टर क्वात्रोची के लिए ही बचा रखी थी जो आज खर्च कर रहे हैं? क्योंकि इसके पहले आपने कभी कहा नहीं कि आप शर्मिन्दा हैं। मुझे याद है, आपके वित्तमंत्री रहते, सेबी की नाक के नीचे बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं। हर्षद मेहता वाले 10 हजार करोड़ के महा घोटाले ने अनेक लोगों को कंगाल कर दिया था और कितने ही लोगों को आत्म हत्या करनी पड़ी थी, तब तो आप शर्मिन्दा नहीं हुए। स्वर्गीय हर्षद मेहता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय नरसिंहराव को एक करोड़ रिश्वत देने की बात कही, तब भी आप शर्मिन्दा नहीं हुए, एनरान पावर प्रोजेक्ट यानी एक अमेरिकी कम्पनी ने हमें जीभर कर लूटा, तब भी आप शर्मिन्दा नहीं हुए, आदिवासी और गरीब औरतों को अक्सर निवस्त्र करके गांव में घुमाया जाता है पर आपको शर्म नहीं आती, अफज़ल गुरू जैसे दुर्दांत आतंकवादी को अभी तक फांसी पर नहीं लटकाया गया, इसके लिए भी आप शर्मिन्दा नहीं हैं, शेयर बाजार में भयंकर गिरावट के कारण लोग मरे पर आप तनिक भी शर्मिन्दा नहीं हुए, बाढ़-अकाल-दावानल तथा भूस्खलन के अलावा देश में आग की बड़ी-बड़ी भीषण दुर्घटनाएं घटीं, रेल हादसों में हज़ारों लोग मरे तथा डेंगू, चिकनगुनिया व बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों ने देश में कोहराम मचाया व सरकार कुछ नहीं कर सकी, लेकिन आप शर्मिन्दा नहीं हुए और तो और संसद में सरेआम नोटों की गड्डियां दिखाई गयीं तब सांसदों की खरीद फरोख्त पर भी आपको शर्म नहीं आयीं थी
याद करो डा. साहब, याद करो.... मुंबई में पाकिस्तानी आतंकियों के प्रवेश ने पूरी दुनिया के सामने हमें नंगा कर दिया, पाकिस्तानी हत्यारों ने हमारी भारत मां के अनेक वीर सपूतों का खून बहा दिया, लेकिन आपको शर्म नहीं आयी, आपको विदेशी कंपनियां भारत बुलाने में शर्म नहीं आयी, महंगाई की मार से जनता को सताने में शर्म नहीं आयी तथा एक महिला के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचने में शर्म नहीं आयी, लेकिन जहां शर्म नहीं आनी चाहिए थी वहां आपको शर्म आ गयी। क्यों डाक्टर साहब, दाल में कुछ काला है या पूरी दाल ही काली है। बोलिये डाक्टर साहब बोलिये, बोलिये ना प्लीज़.... क्या एक क्वात्रोची हम करोड़ों भारतीयों से भी बड़ा है...
Labels: हास्य व्यंग्य
डोन्ट बी इमोशनल
सादर वन्दे।
गत दिनों बाबा भीमराव अम्बेडकर जयंती के अवसर पर हमारी संसद में जो तमाशा हुआ उसे पूरे देश ने देखा और देख कर शर्मिंदा भी हुआ। जिस प्रकार अखबार में छपे फोटो में आप दोनों के सिर झुके हुए थे उसी प्रकार हम सब के भी झुक गए थे। लेकिन आप इस घटना को दिल पर मत लेना क्योंकि ये अपमान केवल आपका नहीं, बल्कि समूचे भारतीय परिवेश का है, राम-बुद्ध और महावीर के देश का है जिसमें पारस्परिक वैमनस्य और घृणा के लिए कोई जगह नहीं। हालांकि 'गुस्सा और देख लेने का भाव' तो आप में भी भरा था लेकिन आपने उसे जाहिर नहीं होने दिया। ये नेता में अभिनेताओं वाले विशेष गुण हैं जो सब में नहीं पाए जाते। आप में हैं, मुबारक हो।
आपने तो अपना हाथ भी बढ़ाया और वाणी से भी हाय हैलो किया लेकिन उन्होंने मुंह फेर कर अपने भीतर भरी हुई कड़वाहट दिखा दी जिससे पूरा माहौल खराब हो गया था। हो सकता है इसके लिए बाबा भीमरावजी और बापू गांधीजी ने उन्हें डांटा भी हो, लेकिन जहां तक मेरा ख्याल है, कुछ तो गलती आपकी भी थी। आखिर आपने ये कैसे सोच लिया कि जिस व्यक्ति की आप सरेआम जनसभाओं में धुर्रियां उड़ा रहे हैं, उसे एक कमज़ोर और नाकारा प्रधानमंत्री बता रहे हैं तथा उसकी कुर्सी के लिए सबसे बड़ा खतरा बन कर खड़े हुए हैं, वह रूबरू मिलने पर आपको नमस्ते कहेगा या हाथ मिलाएगा अथवा गले मिल कर अभिनंदन करेगा? छोड़ो जी, ऐसी विनम्रता गई तेल लेने। ऐसे विनम्र तो शास्त्रीजी थे। ये शास्त्रीजी नहीं, अर्थशास्त्रीजी हैं। अपना एक एक कदम बाज़ार का रुख देखकर चलते हैं और सबसे बड़ी बात ये है कि बाज़ार की तरह स्वयं भी अंदर से टूटे हुए हैं। अब एक टूटे फूटे और मंदी के मारे आदमी से स्वस्थ व्यक्ति जैसे सद्व्यवहार और शिष्टाचार की अपेक्षा रखना हो सकता है आचार संहिता के खिलाफ़ न हो, लेकिन वर्तमान राजनीतिक मूल्यों (?) के खिलाफ़ तो है ही। आपको उनसे ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए थी।
खैर.. जो हो गया, उसपे मिट्टी डालो और आगे बढ़ो, कम आन, बी प्रोफेशनल, डोन्ट बी इमोशनल, क्योंकि ये चुनाव का समय है इसलिए पूरे तनाव का समय है। अब भावुकता और मित्रता के दिन लद गए। वो तो त्रेता था जिसमें राम ने रावण को मारने के पहले उसकी विद्वता के लिए प्रणाम किया था, वो तो द्वापर था जिसमें अर्जुन जैसे धनुर्धर, भीष्म और द्रोण पर आक्रमण के पहले उन्हें प्रणाम करके उन्हीं से आशीर्वाद प्राप्त किया करते थे। आज तो राजनीति इतनी पतित और गर्हित हो गई है कि न कोई किसी का लिहाज करता है न ही किसी को शर्म आती है। क्योंकि चुनाव-चुनाव नहीं दंगल हो गया है। वैसे वे भी क्या करते, उनकी भी तो मजबूरी है कि वे अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते। अरे भाई, ये कुर्सी उन्हें आपने नहीं दी। जिस महिला के कारण वे पीएम पद का मजा लूट रहे हैं, उसी की प्यारी बिटिया पर जब आपके सिपहसालार नरेन्द्र मोदी शब्दों के पैने बाण चलाते हैं और आप स्वयं राहुल बाबा को बच्चा कहकर चिढाते हैं तो मैडम बर्दाश्त कैसे करेंगी और जब वे बर्दाश्त नहीं करेंगी तो उनके लोग भी कैसे करेंगे। इसलिए कुछ नहीं पड़ा इन बातों में, चुनाव लड़िए, जी भर के लडि़ए और जो थोड़ा बहुत भाईचारा व प्यार बचा है उसे भी छोड़िये ताकि दुनिया को पता तो चले कि भारत में आम चुनाव हो रहे हैं।
Labels: हास्य व्यंग्य
उजले नेता काला धन
कमाल की नज़र है हमारे नेताओं के पास। हज़ारों मील दूर पड़ा कालाधन भी देख लेते हैं। ये अलग बात है कि इन्हें अपने देश में पड़ा माल दिखाई नहीं देता। नामांकन पत्र भरते समय जब बड़े-बड़े महारथी नेता अपनी सम्पत्ति और रुपया पैसा का ब्यौरा दे रहे थे तो पूरे देश के साथ-साथ मैं भी हैरान था, हैरान क्या परेशान था कि ये क्या? इनके सारे रुपए पैसे कहां गए? जिनके पास हज़ारों करोड़ होना चाहिए, वे एक-दो करोड़ पर कैसे आ गए? क्या भारत को चलाने वाले दिग्गज नेता इतनी साधारण सी वेल्थ के स्वामी हैं? मेरा मन कहता है कि रुपया तो है और स्विस बैंकों से भी कहीं ज्यादा रुपया हमारे देश में है लेकिन काला है ना, इसलिए दिखाई नहीं देता। उजले वस्त्रधारी हमारे कर्णधार इसमें झांकना ही नहीं चाहते वे जानते हैं कि इस अंधेरे में रखा कालाधन किसी और का नहीं, अपना ही है या किसी अपने वाले का है। इसलिए निकल पड़े मजबूत व पक्के इरादे के साथ स्विस बैंक की ओर। इसके दो फायदे हैं एक तो अपना धन सुरक्षित रहेगा, दूसरा जनता भी जय-जयकार करेगी कि देखो ये नेता कितने महान हैं जो विदेशों में पड़ा काला धन देश में वापस लाने की बात करते हैं। मैंने एक छुटभैये नेता से पूछा, क्या वाकई आप स्विस बैंकों में पड़ा काला धन वापस भारत में लाएंगे। वो बोले, क्यों नहीं लाएंगे। मैंने पूछा, इसकी क्या गारंटी है, वो बोले, हमारा बचन ही गारंटी है। हमने जो कह दिया सो कह दिया, जो कह दिया उसे पूरा करेंगे। मैंने कहा, कहा तो आपने पहले भी बहुत कुछ है लेकिन पूरा कुछ नहीं किया। एक बार आपने मंदिर बनाने का वादा किया था। वादा ही नहीं, दावा किया था कि हम सत्ता में आ गए भव्य मंदिर का निमार्ण करेंगे लेकिन आपने नहीं किया उसके बाद आपने वादा किया था कि हम सत्ता में आ गए तो मुंबई बम धमाकों के जिम्मेदार दाऊद इब्राहिम और उसके साथियों को भारत लेकर आएंगे ओर उन्हें मृत्यु दण्ड देंगे। उसमें भी आप असफल रहे।' मेरी बातें सुनकर उस नेता की त्यौरियां चढ़ गई। मैंने कहा, ' क्रोध मत कीजिए, जनता के लिए कुछ काम कीजिए ताकि जनता आपका भरोसा कर सके और आपको अपना समर्थन दे सके। रही बात स्विस बैंकों से कालाधन लाने की, तो वह आपको पांच साल पहले करनी चाहिए थी ताकि अब तक इस मुद्दे पर पूरा देश एक हो जाता और आपको चुनाव लड़ने का बड़ा मंच बना बनाया मिल जाता। लेकिन यदि वाकई आप देशहित में सोचते हैं तो पहले भारत में छुपा कालाधन निकलवाइए, भ्रष्ट अफसरशाहों व राजनीतिकों के नामी, बेनामी खाते खंगालिए और उन्हें निचोडि़ये, बहुत माल मिलेगा।' उन्होंने मुझे खिसियानी नज़र से देखा तो मैंने ये शेर मारा-
सोने की कैंची लाओ कि मुन्सिफ़ के लब खुलें
क़ातिल ने होंठ सी दिए चांदी के तार से
Labels: हास्य व्यंग्य
आचार संहिता या लाचार संहिता
देखा जाए तो आचार संहिता से हमें कोई ख़ास ऐतराज़ नहीं है। आप लगाओ, .जरूर लगाओ, एक्सट्रा पड़ी हो, तो दो-चार एक साथ लगाओ लेकिन पहले कहीं आचार तो दिखाओ। कहीं तो दिखाओ, किसी के पास तो दिखाओ। अरे जब आचार ही नहीं है तो संहिता को क्या शहद लगाकर चाटें? बहुत हो गया नाटक, अब ये चूहे बिल्ली का तमाशा बन्द करो । जब आप किसी अपराधी को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बता देते हैं तो वो अपनी लुगाई को मैदान में उतार देता है। आप 10 बजे लाउडस्पीकर बन्द करा देते हैं, तो टी.वी. पर विज्ञापन और भाषण शुरू हो जाते हैं जो रात भर चलते हैं। आप जनसभाओं की वीडियो शूटिंग करते हैं तो लोग उस फुटेज को डब किया हुआ तथा फ़र्जी बता देते हैं। क्या तीर मार लिया आचार संहिता ने ? सिवाय इसके कि जनता के सारे काम रुक गए। न कोई नया काम शुरू हो सकता है, न ही कोई घोषणा हो सकती है। इसलिए मैं कहता हूं ये आचार संहिता आचार संहिता नहीं, लाचार संहिता है। इसके पास कोई चारा नहीं। सारा चारा भाई लोगों के पेट में पहुंच चुका है और देश का भाईचारा अलगाव की लपेट में पहुंच चुका है।
अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं? देश को अब आचार संहिता की नहीं, विचार संहिता की .जरूरत है। क्योंकि आचार तो एक क्रिया है और क्रिया करने से होती है अपने आप नहीं होती जबकि करने में अपन कितने आलसी हैं ये तो बताने की बात ही नहीं है, दुनिया जानती है। विचार जो है वो कारण है और हर क्रिया की जननी है। इसे करना भी नहीं पड़ता क्योंकि ये स्वयंभू है। समय साक्षी है, हमारे राजनीतिकों के आचार से ज्य़ादा विचार दूषित हैं। दूषित विचार से शुद्ध आचार का सृजन हो ही नहीं सकता इसलिए आचार संहिता का अचार डालो और विचार संहिता लागू करो क्योंकि अब देश में विचार विषैले हो गए हैं और बहुत ज्य़ादा विषैले हो गए हैं।
'एक सांप ने एक नेता को डसा, नेता मज़े में पर सांप चल बसा' क्योंकि आज का स्वार्थी और सत्तालोलुप नेता सांप से भी ज्य़ादा .जहरीला हो गया है, इतना हुआ कठोर कि पथरीला हो गया है। इसका इलाज करो, जैसे भी होता हो जिस तकनीक से भी होता हो करो, वर्ना ये सांप पूरे देश को डस जाएगा और तुम्हारी आचार संहिता खड़ी-खड़ी देखती रह जाएगी।
'सादा जीवन- उच्च विचार' इस देश की व देश के महान नेताओं की परंपरा रही है। इस परंपरा को बचाने के लिए विचार पर नियंत्रण करो। अन्यथा तुम कितनी भी पाबन्दियां लगाओ, कितनी भी शूटिंग कराओ और चाहे कितने ही मुकदमें दर्ज़ कराओ, नतीजा ठन-ठन गोपाल ही आने वाला है।
'तुम मुझे ख़ून दो- मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा' एक विचार था, 'अहिंसा परमोधर्मः' भी विचार था, 'ग़ाजिय़ों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिन्दोस्तान की' भी विचार था और 'जय जवान'-'जय किसान' के अलावा 'गरीबी हटाओ- देश बचाओ', 'तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें' इत्यादि विचारों ने हमारे राष्ट्र और जनमानस को देश प्रेम से सराबोर किया है जबकि आजकल 'तिलक-तराजू और तलवार-इनके मारो जूते चार' जैसे विषैले विचार देश में घृणा का वातावरण बनाये हुए हैं। कोई किसी को बुढिय़ा बता रहा है, कोई किसी के हाथ काटने की बात करता है, कोई उत्तर भारतीयों के पीछे लठ्ठ लेके पड़ा है और कोई मां जितनी उम्रदराज़ महिला (महिला भी ऐसी-वैसी नहीं सर्वांगशक्तिमान मुख्यमंत्री सुश्री मायावती) को सार्वजनिक रूप से पप्पी देने की बात करता है तो बड़ा खेद होता है विचारों के इस सामूहिक पतन पर।
रोको, विचारों को अश्लील, अभद्र और अमानवीय होने से रोको अगर रोक सकते हो। नहीं रोक सकते तो आचार संहिता के ढक़ोसले को ही रोक लो, भगवान तुम्हारा भला करेगा। क्योंकि इस आचार संहिता से नेता नहीं जनता परेशान है। बाकी तुम जानो और तुम्हारा सिस्टम जाने।
तुम्हारी ऐसी की तैसी
जय हिन्द !
-अलबेला खत्री
Labels: हास्य व्यंग्य

