बड़ों का चरण स्पर्श करना हरि की वन्दना सा है
ये हैं मुखिया हमारे, इनकी आज्ञा धर्म है अपना
बड़ों की आज्ञा में रहना सतत आराधना सा है
पिता-माता की आशीषों से बिगड़े काम बन जाते
रखें इनको हमेशा ख़ुश तो यह इक साधना सा है
इन्हें अनुभव भी ज़्यादा हैं, इन्हें है ज्ञान भी ज़्यादा
घड़ी भर इनसे बातें करना गीता बांचना सा है
ये दीर्घायु,शतायु हों, स्वस्थित हों, आनन्दित हों
तबस्सुम इन बुज़ुर्गों का किसी शुभ-कामना सा है
रहे साया सदा इनका हमारे सर पे और घर पे
यही कहना मेरे ह्रदय की अन्तर्भावना का है

