प्यारे साथियों !
आज ज़िन्दगी में पहले से ही इतना तनाव है कि कोई भी व्यक्ति और
ज़्यादा तनाव झेलने की स्थिति में नहीं है इसके बावजूद अगर वह नये
वाद-विवाद खड़े करता है और बिना कारण करता है तो उसे बुद्धिजीवी
या साहित्यकार अथवा कलमकार कहलाना इसलिए शोभा नहीं देगा
क्योंकि इनका काम समाधान करना है, समस्या को और उलझाना नहीं
...........बेहतर होगा यदि हम अपनी लेखनी के ज़रिये समाज के मसलों
को हल करने की कोशिश करें, न कि मसलों का हिस्सा बन कर बन्दर की
तरह अपना पिछवाड़ा लाल दिखाने के लिए विभिन्न आपसी दल गठित
करलें और गन्द फैलाएं ।
यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि धर्म के नाम पर रोज़ अधर्म हो रहा है। कुछ
लोग इस्लाम का झंडा लिए घूम रहे हैं और लगातार इस्लाम को दुनिया
का सर्वश्रेष्ठ मज़हब मान रहे हैं बल्कि साबित भी किये जा रहे हैं जबकि
कुछ लोग अनिवार्य रूप से उनका विरोध कर रहे हैं । इस चक्कर में भाषा
और वाक्य अपनी मर्यादाएं लांघ रहे हैं । अब कौन क्या कह रहा है उसे
दोहराने का मतलब पतले गोबर में पत्थर मारना है इसलिए वो छोड़ो.......
केवल एक बात पूछता हूँ कि किसी भी धर्म का या मज़हब का कोई भी
व्यक्ति यदि अपने धर्म या मज़हब को बड़ा और श्रेष्ठ बताता है तो अपने
बाप का क्या जाता है ? वो कौनसा अपने घर से पेट्रोल चुरा रहा है ?
इसमें बुरा ही क्या है कि कोई अपने धर्म या मज़हब को सर्वोत्तम बताये
...........जलेबी अगर ये समझे कि उससे ज़्यादा सीधा और कोई नहीं, तो
समझती रहे...केला क्यों ऐतराज़ करता है ?
ये तो बहुत अच्छी बात है कि कोई ख़ुद को और ख़ुद के सामान को श्रेष्ठ
समझे.........इसमें किसी भी प्रकार के विरोध का कारण ही kahan पैदा
hota है ? हर व्यापारी अपने माल को उत्तम बताता है, हर नेता केवल ख़ुद
के दल को देशभक्त बताता है, हर स्त्री केवल स्वयं को सर्वगुण सम्पन्न
मानती है और हर पहलवान केवल ख़ुद को भीमसेन समझता है ...इसका
मतलब ये तो नहीं कि दूसरा कोई उनका विरोध करे ।
जो व्यक्ति अपने धर्म या मज़हब को उत्तम समझ कर उस पर गर्व
करता हुआ उसे प्रचारित-प्रसारित नहीं कर सकता वो किसी दूसरे
के धर्म और मज़हब की क्या खाक इज़्ज़त करेगा ? जो अपनी माँ
को माँ नहीं कह सकता, वो मौसी को क्या माँ जैसा सम्मान दे
पायेगा ? अपने पर गुरूर करना इन्सान की सबसे बड़ी ख़ूबी है, इसी
ख़ूबी के चलते व्यक्ति जीवन में तुष्ट रहता है वरना ..सूख सूख कर
मर जाये क्योंकि मानव अन्न से नहीं, मन से ज़िन्दा रहता है .
दुनिया से प्यार करने के लिए देश से, देश से प्यार करने के लिए
प्रान्त से, प्रान्त से पहले ज़िला, ज़िले से पहले शहर, शहर से पहले
घर और घर से भी पहले व्यक्ति को ख़ुद पर गर्व होना चाहिए भाई !
हम सब रंग हैं और अलग अलग रंग हैं । हम सब का महत्व है । हम सब
को बनाने वाला एक ही है । ये जानते बूझते भी यदि हम आपस में बहस
करें या तनाव फैलाएं तो हम से ज़्यादा दुःख और तनाव उसे होगा जिसने
हम सब को पैदा किया है ।
कृपया विचार करें और बताएं कि क्या धर्म -सम्प्रदाय या मज़हब का
गढ़ जीतना हमारे लिए इतना ज़रूरी है कि हम प्यार करना भूल जाएँ ?
आनन्द करना भूल जाएँ और अपनी रोज़मर्रा की समस्याएं भूल जाएँ ?
क्या महंगाई का मसला कुछ नहीं, क्या पर्यावरण का मसला कुछ नहीं ?
क्या भष्टाचार का मुद्दा गौण है ? क्या व्यसन और फैशन के कारण बढ़ते
अपराध गौण है ? क्या सड़क दुर्घटनाओं से हमें कोई सरोकार नहीं ? क्या
दुश्मन देश ख़ासकर चाइना से हमें रहना ख़बरदार नहीं ? क्या मिलावट
करने वालों का विरोध हमें सूझता नहीं ? क्या टूटते परिवारों को बचाना
हमें बूझता नहीं ? गाय समेत लगभग सभी दुधारू पशु रोज़ बुचडखाने में
क़त्ल हो रहे हैं, क्या वे हमें दिखते नहीं ? आखिर क्यों हम प्राणियों को
बचाने के लिए कुछ लिखते नहीं ?
अलबेला खत्री विनम्रता पूर्वक कुछ पूछना चाहता है आप सब से..... जवाब ज़रा सोच - समझ कर दें
Labels: दिल को जोड़ो , प्यार , भारत बचाओ , मज़हब छोड़ो , मोहब्बत , हिन्दी कविता
दुनिया ने उसे अपने घर की आज़ादी दे दी
शक्ति ने दुनिया से कहा, 'तू मेरी है';
दुनिया ने उसे अपने तख़्त पर क़ैदी बना कर रखा ।
प्रेम ने दुनिया से कहा, 'मैं तेरा हूँ' ;
दुनिया ने उसे अपने घर की आज़ादी दे दी
-गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर
शुभ प्रभात
-अलबेला खत्री
Labels: प्रेम , महापुरूषों के अमृत वचन और अनुभव , शक्ति , हिन्दी कवि
मन में ही रह गई "महावीर शर्मा जी" से मिलने की आरज़ू ..........वे तो चलते बने महफ़िल छोड़ के
अभी-अभी दीपक मशाल ने दु:खद समाचार बताया
भीतर ही भीतर मेरे आत्मिक अस्तित्व को रुलाया
महावीर ब्लॉग वाले वयोवृद्ध साहित्यकार
महावीर शर्मा जी नहीं रहे, उनका निधन हो गया है
ये जान कर शोक से संतप्त मेरा मन हो गया है
मन में ही रह गई आरज़ू उनसे मिलने की
भाग्य में ही नहीं थी ये कलियाँ खिलने की
प्रार्थना मन पूर्वक कर रहा हूँ विनम्र श्रद्धांजलि के साथ
सदैव रहे दिवंगत के सिर पर परमपिता का कृपालु हाथ
उनके परम सखा श्री प्राण जी शर्मा ये सदमा झेल सकें
इतना सामर्थ्य उन्हें देना दाता !
दिवंगत आत्मा के परिवारजन को हौसला देना दाता !
ओम शान्ति !
ओम शान्ति !!
ओम शान्ति !!!
Labels: दुखद निधन , महावीर शर्मा , शोक समाचार , साहित्यकार , हिन्दी ब्लोगर का देहांत
जागो देवता जागो !
घणा दिन सो लिया थे
पूरा फ़्रेश हो लिया थे
अब आलस त्यागो अर काम पर लागो
जागो देवता जागो
जागो देवता जागो
तुलसी रो ब्याव करणो है
भारत रो बचाव करणो है
काम घणोइ करणो है बाकी
मंहगाई रांड बण बैठी काकी
खादी पैरयाँ घूमै है कई डाकी
ख़ून पीवै है गरीबां रो खाकी
आंकै डाम दागो, म्हारै बाँधो रक्षा धागो
जागो देवता जागो
जागो देवता जागो
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राजकोट में कामदार परिवार ने धूमधाम से मनाया माँ इन्दिरा बेन अनंत राय कामदार का अमृत महोत्सव
लगभग दो महीने पहले जब नितिन भाई कामदार ने अमेरिका से फोन
करके मुझे एक प्रोग्राम के लिए बुक किया था तब मुझे इल्म नहीं था कि
14 नवम्बर को राजकोट में मुझे जिस कार्यक्रम में प्रस्तुति देनी है वह
इतना निजि और पारिवारिक कार्यक्रम होगा परन्तु दो दिन पहले जब
मैं वहां उपस्थित हुआ तो कामदार परिवार द्वारा आयोजित अपनी पूज्या
माताजी श्रीमती इन्दिरा बेन अनन्तराय कामदार के 75 वें जन्मदिवस
पर अमृत महोत्सव के दृश्य को देख कर मन गदगद हो गया ।
दुनिया भर से सैकड़ों अतिथियों समेत देश भर से करीब एक हज़ार लोग
सम्मिलित हुए इस अनूठे पारिवारिक समारोह में और तरह तरह के
सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम संयोजित हुए ।
14 नवम्बर को दोपहर में सिर्फ़ मेरी ही एकल प्रस्तुति थी सो मैंने भी
उस कार्यक्रम में अपनी भरपूर मस्ती लुटाई और प्रोग्राम में आये सभी
का मनोरंजन किया साथ ही माँ की महत्ता पर कुछ खास रचनाएं
प्रस्तुत कीं ।
बधाई हो कामदार परिवार को इस सफल आयोजन के लिए ।
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Labels: अमृत महोत्सव , अलबेला खत्री , कामदार परिवार , माँ , राजकोट
बे-मतलब मशक्कत करते हैं
दो शख्स फ़िजूल तकलीफ़ उठाते हैं
और
बे-मतलब मशक्कत करते हैं ।
एक तो वह जो धन संचय करता है परन्तु उसे भोगता नहीं ;
दूसरा वह
जो ज्ञानार्जन करता है किन्तु तदनुसार आचरण नहीं करता
अनुभव : शेख सादी
प्रस्तुति : अलबेला खत्री
Labels: अलबेला खत्री , शेख सादी , सूत्र , हास्य kavita , हिन्दी ब्लोगर्स
लीजिये गीत स्पर्धा में सहभाग और बनिए विजेता 55,555 रुपये के बम्पर अवार्ड के
प्यारे हिन्दी चिट्ठाकार मित्रो !
सस्नेह दीपावली अभिनन्दन !
लीजिये कल की गई अनुसार आज मैं धन तेरस के मंगलमय अवसर
पर धन बरसाने वाली स्पर्धा का श्री गणेश करने के लिए
उपस्थित हो गया हूँ
कल मैंने ये कहा था ( देखें लिंक ) :
परिणाम ये रहा कि कुल मिला कर 19 लोगों से 26 टिप्पणियां प्राप्त हुईं
जिनमे से प्रसंग अनुसार सटीक टिप्पणियां कुल 12 ही देखने को
मिलीं । चूँकि चुनाव इन्हीं में से करना था सो कुल सात टिप्पणियां
मैंने इनमे से चुनी हैं जिनके अनुसार श्री समीरलाल, सुश्री मृदुला प्रधान
व सुश्री वन्दना जी ने कविता विधा का पक्ष लिया है जबकि डॉ रूपचंद्र
शास्त्री, डॉ अरुणा कपूर, श्री राजकुमार भक्कड़ व सुश्री उर्मिला उर्मि ने
गीत का पक्ष लिया है लिहाज़ा गीत ने कविता को तीन के मुकाबले चार
वोटों से पछाड़ दिया है ।
अब स्पर्धा 'माँ' विषय पर गीत की होगी ।
मेरा सभी गीतकारों से अनुरोध है कि माँ पर बेहतरीन गीत भेजें ।
जिस गीत को सर्वश्रेष्ठ गीत चुना जाएगा उस गीत के रचयिता को
दिसम्बर माह में सूरत के एक विराट समारोह "गीत गंधा" में रूपये
55,555 नगद, सम्मान-पत्र, शाल श्रीफल व स्मृति- चिन्ह भेन्ट
करके अभिनन्दित किया जायेगा ।
शर्तें व नियम :
एक व्यक्ति चाहे जितने गीत भेज सकता है
लेकिन सब स्वरचित होने चाहियें ।
स्पर्धा का परिणाम अगर किन्हीं दो रचनाकारों में बराबर रहा तो
सम्मान-राशि दोनों विजेताओं में समान रूप से बाँट दी जायेगी ।
रचनाएं भेजने की अन्तिम तिथि है 18 नवम्बर 2010
नियत तिथि तक यदि न्यूनतम 111 गीतकारों से रचनाएं प्राप्त होगयीं
तो परिणाम घोषित होगा और यदि संख्या कम रही तो परिणाम की
तिथि आगे बढ़ाई जा सकती है
इस स्पर्धा में अन्तिम निर्णय www.albelakhatri.com द्वारा गठित
निर्णायक मण्डल का ही मान्य होगा ।
तो फिर देर किस बात की..............जल्दी से भेज दीजिये माँ की वन्दना
का एक गीत और बनिए विजेता 55,555 रुपये और विराट सार्वजनिक
सम्मान के...............आपके स्वागत में सूरत तत्पर है - गुड लक !
विनीत
-अलबेला खत्री
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___________________आप सभी को दीपावली की हार्दिक मंगल
कामनाएं..........मैं अभी रवाना हो रहा हूँ जयपुर के लिए, आने वाले 12
दिन तक मैं लगातार प्रवास पर रहूँगा । कुछ दिन परिवार के साथ उत्सव
के लिए कुछ दिन रोज़ी रोटी अर्थात काव्योत्सव के लिए -
@@@@@@@ टाइपिंग में कोई त्रुटि रही हो,तो क्षमा चाहता हूँ ,,,,
जल्दबाज़ी में पोस्ट तैयार की है
Labels: अलबेला खत्री , गीत स्पर्धा , माँ , सूरत , हिन्दी हास्यकविता

