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ताज़ा टिप्पणियां

Albela Khatri

राष्ट्रभक्त राजीव दीक्षित का असामयिक निधन भारतीय स्वाभिमान की अपूर्णीय क्षति है






समय नदी की धार,

जिसमे सब बह जाया करते हैं

पर होते हैं कुछ लोग ऐसे

जो इतिहास बनाया करते हैं




प्रखर राष्ट्रभक्त और मुखर वक्ता राजीव दीक्षित अब हमारे बीच

नहीं रहे । यह हृदयविदारक समाचार पढ़ कर मेरा मन विषाद

से भर गया है । राजीव दीक्षित भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक

पुरूष बन गये थे, करोड़ों लोग उनके वक्तव्यों के प्रशंसक ही

नहीं बल्कि अनुयायी भी हैं । राजीव दीक्षित से भले ही मेरा

सीधा कोई सरोकार नहीं था परन्तु एक भारतीय होने के नाते

और एक देशभक्त स्वाभिमानी नागरिक होने के नाते मैं उन्हें

बहुत पसन्द करता था । राजीव दीक्षित का न रहना एक बड़ा

शून्य छोड़ गया है, यह एक ऐसी क्षति है भारत की जो अपूर्णीय

है । परमपिता परमात्मा राजीव दीक्षित की पवित्र आत्मा को

परम शान्ति प्रदान करे, आइये ऐसी प्रार्थना हम सब करें-



सजल नेत्रों और भारी मन से विनम्र श्रद्धांजलि !



.............ओम शान्ति ! शान्ति ! शान्ति !

लो जी हो गये एक तीर से दो दो शिकार.... पहले पोस्ट पर टिप्पणी, फिर टिप्पणी से पोस्ट तैयार

ये भी ख़ूब रही...........


परिकल्पना ब्लॉग पर रवीन्द्र प्रभात जी ने आज की पोस्ट में पूछा था

कि " वर्ष २०१० में हिन्दी ब्लोगिंग ने क्या खोया, क्या पाया ?"


इस पर मैंने भी एक टिप्पणी की है,

वही यहाँ भी चिपका रहा हूँ

यानी करके दिखा रहा हूँ एक तीर से दो दो शिकार

पहले की टिप्पणी, फिर टिप्पणी से पोस्ट तैयार



_______2010 में क्या खोया, क्या पाया ?


तो जनाब खोने को तो यहाँ कुछ था नहीं,

इसलिए पाया ही पाया है .

नित नया ब्लोगर पाया है,

संख्या में वृद्धि पायी है

और रचनात्मक समृद्धि पाई है



लेखकजन ने एक नया आधार पाया है

मित्रता पाई है, निस्वार्थ प्यार पाया है

दुनिया भर में फैला एक बड़ा परिवार पाया है

इक दूजे के सहयोग से सबने विस्तार पाया है

नूतन टैम्पलेट्स के ज़रिये नया रंग रूप और शृंगार पाया है

रचनाओं की प्रसव-प्रक्रिया में परिमाण और परिष्कार पाया है

नये पाठक पाए हैं,

नवालोचक पाए हैं

लेखन के लिए सम्मान और पुरस्कार पाया है

नयी स्पर्धाएं, नयी पहेलियों का अम्बार पाया है


लगे हाथ गुटबाज़ी भी पा ली है, वैमनस्य भी पा लिया है

टिप्पणियाँ बहुतायत में पाने का रहस्य भी पा लिया है

बहुत से अनुभव हमने वर्ष 2010 में पा लिए

इससे ज़्यादा भला 11 माह में और क्या चाहिए


-हार्दिक मंगलकामनाओं सहित,

-अलबेला खत्री




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सबसे ज़लील व शर्मनाक बात है अपने से परास्त हो जाना



जो
बल से पराजित करता है

वह अपने शत्रुओं को सिर्फ़ आधा जीतता है ।

सबसे शानदार विजय है अपने पर विजय प्राप्त करना

और सबसे ज़लील व शर्मनाक बात है अपने से परास्त हो जाना ।


-प्लेटो

प्रस्तुति : अलबेला खत्री


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बड़ी निराशा हुई सोनिया गांधी का चुनाव क्षेत्र देख कर

ऊंचाहार जाते समय राय बरेली रास्ते में पड़ता है जो कि श्रीमती सोनिया

गांधी का चुनाव क्षेत्र है, लेकिन नगर की हालत देख कर लगा नहीं कि वह

सचमुच सोनियाजी का चुनाव क्षेत्र है ।



जगह जगह गन्दगी, बेतरतीब बसावटें, संकरी गलियां और बेकायदा

यातायात देख कर तो निराशा हुई ही....वहां का घंटाघर देख कर भी

हँसी छूट पड़ी.........क्योंकि जिसे वहां घंटाघर कहा जाता है, वो घंटीघर

कहलाने के काबिल भी नहीं


सड़कों की हालत तो तौबा ! तौबा !


जय हो वहां के निवासियों की और उनकी सम्माननीया सांसद की ।

N T P C ऊंचाहार के स्थापना दिवस समारोह में ख़ूब जमा हास्य कवि सम्मेलन - अलबेला खत्री ने मचाई धूम




अभी दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के सुन्दर क्षेत्र ऊंचाहार में एन टी पी सी

के स्थापना दिवस समारोह में आयोजित अखिल भारतीय हास्य कवि-

सम्मेलन में बहुत आनन्द आया ।



देश के कोने कोने से आये कवि और कवयित्रियों ने अपने रचनापाठ से

श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ।



महाप्रबंधक श्रीमान राव ने स्वागत सम्भाषण में ही अत्यन्त परिष्कृत

हिन्दी और संस्कृत में कविता की व्याख्या की तथा कविगण का स्वागत

किया । तत्पश्चात हिन्दी अधिकारी श्री पवन मिश्रा ने कमान कवियों को

सौंप दी और एक के बाद एक रचनाकार ने अपनी प्रस्तुति से जन का मन

मोहा



चूँकि कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए संचालक ने मेरा नाम प्रस्तावित

कर दिया ..लिहाज़ा मुझे सबसे बाद में ही आना था ..मगर शुक्र है कि मेरा

नम्बर आने तक लोग डटे रहे, जमे रहे और मैंने भी फिर खुल कर काम

किया । उस दिन 26-11 वारदात की दूसरी बरसी थी इसलिए पहले मैंने

उस अवसर पर कुछ कहा .एक गीत शहीदों के नाम पढ़ा और बाद में

हँसना-हँसाना आरम्भ किया ।


जलवा हो गया जलवा !


दर्शकों का ख़ूब स्नेह और आशीर्वाद मिला .........तालियाँ और ठहाके गूंज उठे

.....कुल मिला कर बल्ले बल्ले हो गई ।


इसका वीडियो जल्दी ही मिलेगा तो आपको दिखाऊंगा


-अलबेला खत्री


रचनायें सादर आमन्त्रित हैं स्पर्धा क्रमांक - 5 के लिए ...... कृपया इस बार बढ़-चढ़ कर हिस्सा लीजिये




स्नेही स्वजनों !

सादर नमस्कार ।


लीजिये एक बार फिर उपस्थित हूँ एक नयी स्पर्धा का श्री गणेश करने के


लिए और आपकी रचना को निमन्त्रण देने के लिए ।


स्पर्धा क्रमांक - 5 के लिए www.albelakhatri.com पर आपकी रचना


सादर आमन्त्रित है । जैसा कि पहले ही बता दिया गया था कि इस बार


स्पर्धा हास्य-व्यंग्य पर आधारित होगी ।


नियम एवं शर्तें :


स्पर्धा क्रमांक -५ का शीर्षक है :

लोकराज में जो हो जाये थोड़ा है

स्पर्धा में सम्मिलित करने के लिए कृपया उपरोक्त शीर्षक के

अनुसार ही रचना भेजें . विशेषतः इस शीर्षक का उपयोग भी

रचना में अनिवार्य होगा अर्थात रचना इसी शीर्षक के इर्द गिर्द

होनी चाहिए .


हास्य-व्यंग्य में हरेक विधा की रचना इस स्पर्धा में सम्मिलित की


जायेगी । आप हास्य कविता, हज़ल, पैरोडी, छन्द, दोहा, सोरठा, नज़्म,

गीत, मुक्तक, रुबाई, निबन्ध, कहानी, लघुकथा, लेख, कार्टून अर्थात कोई


भी रचना भेज सकते हैं



एक व्यक्ति से एक ही रचना स्वीकार की जायेगी ।


रचना मौलिक और हँसाने में सक्षम हो यह अनिवार्य है ।


स्पर्धा क्रमांक - 5 के लिए रचना भेजने की अन्तिम तिथि है


15 दिसम्बर 2010



सभी साथियों से निवेदन है कि इस स्पर्धा में पूरे उत्साह के साथ सहभागी


बनें और हो सके तो अपने ब्लॉग पर भी इसकी जानकारी प्रकाशित करें


ताकि अधिकाधिक लोग लाभान्वित हो सकें



मैं और भी बातें विस्तार से लिखता लेकिन कल कानपुर में काव्य-पाठ


करना है इसलिए थोड़ी नयी रचनाएँ तैयार कर रहा हूँ । इस कारण

व्यस्तता बढ़ गई है । आप सुहृदयता पूर्वक क्षमा कर देंगे ऐसा मेरा


विश्वास है



तो फिर निकालिए अपनी अपनी रचना और भेज दीजिये

........all the best for all of you !


-अलबेला खत्री





जी हाँ मैंने रात भर आनन्द लिया रचना का, किसी को ऐतराज़ हो तो वो भी आनन्द ले ले "अलबेला खत्री " का





"चोर की दाढ़ी में तिनका" होता है, ये तो मैंने सुना था परन्तु कुछ लोगों

की पूरी दाढ़ी ही तिनकों की होती है जिसकी झाड़ू बना कर "वे" लोग

अपने घर की सफाई करने के बजाय दूसरों के घोच्चा करने में ज़्यादा

मज़ा लेते हैं, ये मुझे तिलियार ब्लोगर्स मीट के बाद ललित शर्मा की पोस्ट

पर आई टिप्पणियों से ही पता चला . और ये सारा बखेड़ा इसलिए खड़ा

होगया क्योंकि मैंने उसमे अपनी टिप्पणी में स्वीकार किया था कि मैंने

रात भर रचना का मज़ा लिया . अब न तो रचना कोई बुरी चीज़ है, न ही

मज़ा लेना कोई पाप है, लेकिन चूँकि मज़ा मैंने लिया था और रात भर

लिया था सो कुछ अति विशिष्ट ( आ बैल मुझे मार ) श्रेणी के गरिमावान

( सॉरी हँसी आ रही है ) लोगों को अपच हो गया और उन्होंने आनन्द

जैसी परम पावन पुनीत और दुर्लभ वस्तु को भी अश्लील कह कर 'आक थू'

कर दिया । ये देख कर ललित जी की बांछें भी उदास हो गईं होंगी चुनांचे

मेरा धर्म है कि मैं बात स्पष्ट करूँ । लिहाज़ा ये पोस्ट लिख रहा हूँ ताकि

सनद रहे और वक्त ज़रूरत प्रमाण के तौर पर काम ( काम से मेरा मतलब

कामसूत्र वाला नहीं है ) ली जा सके :



तो जनाब ! सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देता हूँ उन लोगों का जिन लोगों

ने तिलियार में मुझ से मिल कर, प्रसन्नता प्रकट की और मेरी "रचना"

को झेला अथवा मेरी प्रस्तुति का आनन्द लिया । तत्पश्चात ये भी स्पष्ट

कर दूँ कि मैं एक रचनाकार हूँ और रचनाकारी करना मेरा दैनिक कार्य

है, कार्य क्या है कर्त्तव्य है और मुझे गर्व है कि न केवल मैं अपनी रचना

की सृष्टि कर सकता हूँ अपितु दूसरों की रचनाएं सुधारने का काम भी

बख़ूबी करता हूँ, जो लोग on line मुझसे सलाह लेते हैं अथवा अपनी

रचना मुझसे सुधरवाते हैं उनमे नर भी कई हैं और नारियां भी अनेक हैं

परन्तु मैं किसी का नाम नहीं लूँगा, क्योंकि ये केवल मैत्रीवश होता है ।

अस्तु-



उस रात 9 बजे जो महफ़िल जमी, वह करीब 3 बजे तड़के तक चली

...........और इस दौरान वो सब हुआ जो यारों की महफ़िल में होता है ।

महफ़िल जब पूरी जवानी पर आ गई, तब ललित जी को अपनी रचनाएं

सुनाने का भूत लग गया । अब लग गया तो लग गया ......कोई क्या कर

सकता है ...कहीं भाग भी नहीं सकते थे..........नतीजा ये हुआ कि ललित

शर्मा एक के बाद एक रचना पेलते गये और हम सहाय से झेलते गये

............जल्दी ही मुझे इसमें आनन्द आने लगा और मैं पूर्णतः सजग

हो कर सुनने लगा । नि:सन्देह ललित जी रात भर सुनने की चीज हैं ।

यह अनुभव मुझे पहली ही रात में हो गया ..हा हा हा



तो साहेब ये कोई ज़रूरी तो नहीं कि परायी रचना" में सभी को उतनी रुचि

हो, जितनी कि मुझे रहती है, इसलिए बन्धुवर केवलराम, नीरज जाट,

सतीश और स्वयं मेज़बान राज भाटिया जी भी एक एक करके निंदिया के

हवाले हो गये, बस..........मैं ही बचा रहा सो मैं ही सुनता रहा और आनन्द

लेता रहा ।



सुबह जब उठा, तो ललितजी फिर जाग्रत हो गये और लिख मारी पोस्ट

..........साथ ही सबसे कह भी दिया कि अपने अपने कमेन्ट दो.........

भाटियाजी बोले - मैं तो जर्मनी जा कर करूँगा, तब भी उनसे ज़बरन

टिप्पणी करायी गई क्योंकि पोस्ट को हॉट लिस्ट में लाने का और कोई

उपाय है ही नहीं.......लिहाज़ा मैंने भी अपनी टिप्पणी कर दी जिसमे

स्वीकार किया कि रात भर "रचना" का आनन्द लिया ........अब इस

"रचना" से मेरा अभिप्राय: ललित जी कि काव्य-रचना से था । लिहाज़ा

मैंने कोई गलत तो किया नहीं । गलत तो तब होता जब मैं ये लिखता

कि मुझे "रचना" में कोई मज़ा नहीं आया..........



अब संयोगवश रचना नाम किसी नारी का हो जिसे मैंने कभी देखा नहीं,

जाना नहीं, जिसका मैंने कोई क़र्ज़ नहीं देना और जिससे मुझे कोई

सम्बन्ध बनाने की लालसा भी नहीं, कुल मिला कर जिसमे मेरा कोई

इन्ट्रेस्ट ही नहीं,

वो अगर इस टिप्पणी में ज़बरदस्ती ख़ुद को घुसेड़ ले तो मैं क्या करूँ यार ?

मैंने कोई ठेका ले रखा है सबके नामों का ध्यान रखने का ...और वैसे भी

" रचना " शब्द क्या किसी के बाप की जागीर है ? बपौती है किसी की ?

क्या रचना नाम की एक ही महिला है दुनिया में ? मानलो एक भी है तो

क्या मैंने ये लिखा कि "इस" विशेष रचना का आनन्द लिया ?



जाने दो यार क्या पड़ा है इन बातों में..............मेरी रचनाओं के तो सात

संकलन प्रकाशित हो चुके हैं, रचनाकारी करते हुए 28 साल हो गये मुझे

जबकि ब्लोगिंग तो जुम्मा जुमा डेढ़ साल से कर रहा हूँ । रचना शब्द

को मैं जब, जैसे, जितनी बार चाहूँ, प्रयोग कर सकता हूँ .....किसी को

ऐतराज़ हो तो मेरे ठेंगे से !


आप भी स्वतन्त्र हैं " अलबेला " शब्द से खेलने के लिए । चाहो तो आप

भी लिखो " रात भर अलबेला का आनन्द लिया " और आनन्द ले भी सकते

हो । "अलबेला " नाम की फ़िल्म चार बार बनी है............उसे रात भर देखो

और सुबह पोस्ट लिखो कि रात भर "अलबेला" का मज़ा लिया .... मैं कभी

कहने नहीं आऊंगा कि ऐसा क्यों लिखा......क्योंकि जैसे "रचना" शब्द

किसी कि बपौती नहीं, वैसे ही "अलबेला" शब्द भी किसी की बपौती नहीं है ।



विनम्रता एवं सद्भावना सहित इससे ज़्यादा नेक सलाह मैं अपने घर का

अनाज खा कर आपको फ़ोकट में नहीं दे सकता ।


-अलबेला खत्री




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