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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

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बहना मुझको इस दिन की प्रतीक्षा रहती है

बाँध दे राखी मेरी कलाई, रीत ये कहती है

बहना मुझको इस दिन की प्रतीक्षा रहती है


रंग छूटे इस माथे से ऐसा तिलक लगादे

इस कुमकुम में तेरे स्नेह की नदिया बहती है


आज सजादे मेरी कलाई, मुंह में दाल मिठाई

रोज़ नहीं आता है ये दिन, दुनिया कहती है


रक्षा-बन्धन दिन है तेरा, जो चाहे सो बोल !

तेरा ही है सब - कुछ तू संकोच क्यों करती है


फ़र्ज़ निभाउंगा 'अलबेला' रक्षा का आजीवन

करता भइया आज वही जो बहना कहती है

रफ़्ता रफ़्ता उभर रही है ...........

उनकी किस्मत में हँसना, अपनी किस्मत में रोना था

क्योंकि अपने अरमानों का बोझ हमीं को ढोना था


बेशक मेरे घर की हर दीवार मुझ ही पर टूट पड़ी

लेकिन कुछ अफ़सोस नहीं है, हुआ वही जो होना था


समझे थे जिसको हम दिल और ख़्वाब बुने थे बड़े-बड़े

आज हुआ मालूम हमें वह ख़ाक का एक खिलौना था


सिगरेट पी कर जब सोचें तो धुआं आड़े जाता है

बिस्तर सारा सुलग चुका है जिस पे मुझको सोना था


रफ़्ता-रफ़्ता उभर रही है 'अलबेला' उनकी तस्वीर

सूना-सूना सा अब तक लगता दिल का हर कोना था

आदमी भगवान से कुछ कम नहीं

नम्रता यदि ज्ञान से कुछ कम नहीं
तो अहम अज्ञान से कुछ कम नहीं

सड़ रहे हैं शव जहां पर प्राणियों के
वे उदर श्मशान से कुछ कम नहीं

जिस हृदय में प्रेम और करुणा नहीं
वो हृदय पाषाण से कुछ कम नहीं

इतनी महंगाई में भी ज़िन्दा हैं हम
यह किसी बलिदान से कुछ कम नहीं

आचरण यदि दानवों का छोड़ दे तो
आदमी भगवान से कुछ कम नहीं

काव्य में जिसके कलेजे की क़शिश है
वह कवि रसखान से कुछ कम नहीं

आपने अलबेला की कविताएं पढ़ लीं
यह किसी ऐहसान से कुछ कम नहीं

मद मोहब्बत का उतर जाए तो कुछ आराम हो....


दर्द गर हद से गुज़र जाए तो कुछ आराम हो

ज़िन्दगी अब भी संवर जाए तो कुछ आराम हो


उसने मेरी शायरी में मस्तियां भर दीं मगर

मद मोहब्बत का उतर जाए तो कुछ आराम हो


दर्द--ग़म की तो शफ़ा मिल सकी लेकिन अगर

टूट कर यह दिल बिखर जाए तो कुछ आराम हो


अन्जुमन में यों तो लाखों पैक़र--अहबाब हैं

अक़्स उसका भी उभर जाए तो कुछ आराम हो


आज तक 'अलबेला' सहते जा रहे हैं हम जिसे

कुछ घड़ी यह ग़म उधर जाए तो कुछ आराम हो

देश में सरकार है............

यों तो इस महफ़िल में मस्ती बेशुमार है
पर आ सकें तो आपका भी इन्तेज़ार है

जब से आया है तुम्हारा अक्स मेरी आँख में
गुलबदन है हर शहर औ हर गली गुलज़ार है

कौन कहता है चमन में अब अमन का दौर है
हमने तो देखा, यहाँ पर हर नज़र तलवार है

इस तरफ़ सैलाब-ए-खूँ है उस तरफ़ जू-ए-जुनूं
बच के जाएँ किस तरफ़ हर ओर मारा-मार है

जल रही है रात-दिन इन्सानियत की होलियाँ
फ़िर भी सुनते हैं कि अपने देश में सरकार है

अभी खंजर सलामत है !

न जाने क्या मुसीबत है न जाने क्या क़यामत है

नज़र आएगा नूर-ए-कल तसव्वर ला ज़मानत है


तशद्दुद इस क़दर हावी दहर पै हो गया यारो

बशर है चीज क्या यां तो ख़ुदा भी बे हिफाज़त है


अगर ज़िन्दा जलाता तो न जाने क्या हुआ होता

सितम इतना भी न करना सितमगर की शराफ़त है


तमाशा क्या है 'अलबेला' मेरे ज़ेहन से बाहर है

बशर तो मर गया लेकिन अभी खंजर सलामत है

जायें तो जायें कहाँ ?

हो गया बदरंग आलम, है क़यामत सा समां

हर तरफ़ बिखरी है आतिश, जायें तो जायें कहाँ



धोते हैं अश्कों से अपने यारो ! हम ज़ख्मे-जिगर

क्या ख़बर अहले-ज़ुबां को हो गये हम बे-ज़ुबां



बेदरद - -बेमुरव्वत, बेवफ़ा--बेरहम

बेहया--बेशरम सब हो गये अहले-जहाँ



शमा से शोला हुआ दिल शोले से आतिश हुआ

आह ! से इतना जले, अब क्या जला पाये तवां



ठोकरों से रहगुज़र की दर तेरे तक गये

अर्ज़ यारब ! तेरे आगे कलम से कर दी बयां

मैं भी वतन का राज़ हूँ ..............

तुम हो अन्जाम-ए-वफ़ा मैं प्यार का आगाज़ हूँ

तुम हो कल की दास्ताँ, मैं आज की आवाज़ हूँ



लाखों बाजू मुझपे हावी थे बजाने के लिए

हाय ! लेकिन क्या करूँ ? गर खुरदरा सा साज़ हूँ



दलालों ! बेच दो मुझको भी तुम बाज़ार में

मैं भी हूँ बशर--वतन मैं भी वतन का राज़ हूँ



खाक़ उसकी ज़िन्दगी पे, लाहनतें उस पर हज़ार

जो मुझे कहता रहा तकदीर का मोहताज़ हूँ



सरफिरे दहशत पसन्दों ने लगाई आग गर

चीर डालूँगा उन्हें , देखो मैं तीरन्दाज हूँ



ज़िन्दगी "अलबेला" तुम ज़िन्दादिली से जीयो तो

मौत भी आकर कहेगी "जीने का अन्दाज़ हूँ "

है बाकी अभी...............

अक़्स--सावन उभरना है बाकी अभी

रुत का सजना, संवरना है बाकी अभी


उनकी क़ातिल अदाओं का दिल में मेरे

दशना बन के उतरना है बाकी अभी


उनकी गलियों से तो कल गुज़र आए हैं

अपनी हद से गुज़रना है बाकी अभी


उनके आने के झूठे भरम का दिल !

टूटना और बिखरना है बाकी अभी


जल्दबाजी कर 'अलबेला' इस कदर

उनका इज़हार करना है बाकी अभी

हँसाने का हुनर रखते हैं ................

आग से आग बुझाने का हुनर रखते हैं

हम सितमगर को सताने का हुनर रखते हैं


मौत क्या हमको डराएगी अपनी आँखों से

मौत को आँख दिखाने का हुनर रखते हैं


कोई आँखों से पिलाता है, कोई होटों से

हम तो बातों से पिलाने का हुनर रखते हैं


कद्रदां हो तो कोई देखे क़रिश्मा अपना

ख़ुद रो कर भी हँसाने का हुनर रखते हैं


पाई है हमने विरासत में कबीरी यारो

जो भी है पास, लुटाने का हुनर रखते हैं

अपनी कोमल हथेली सजा लीजिये

ज़िन्दगानी नहीं अब क़ज़ा दीजिये

मुझको मेरे किए की सज़ा दीजिये


साथ चलने की तुमको ज़रूरत नहीं

चल तो सकता हूँ रस्ता बता दीजिये


पीस डालो मेरा दिल हिना जान कर

अपनी कोमल हथेली सजा लीजिये


ज़ख्म रिसते हैं मेरे तो रिसते रहें

आप गैरों के ग़म की दवा कीजिये


राह से गर हटाना ही चाहो जो तुम

पाँव से एक ठोकर लगा दीजिये

पास ही है ज़िन्दगी....................

हताश सी है ज़िन्दगी

उदास सी है ज़िन्दगी


ज़िन्दगी में मौत की

तलाश सी है ज़िन्दगी


जाम भी है ज़हर का

गिलास भी है ज़िन्दगी


अनगढे हीरे हैं हम

तराशती है ज़िन्दगी


जिंदा भी लगती नहीं

लाश ही है ज़िन्दगी


दूर क्यों जाते हो तुम

कि पास ही है ज़िन्दगी


रोते रोते कलम बेज़ुबां हो गई ............

मेरी ज़िन्दगी तू कहाँ खो गई ?

शायरी भी मेरी अब जवां हो गई


जल रही है ज़मीं जल रहा आसमां

क़ायनात--तमाम पुर-तवां हो गई


हर शहर हर मकां मौतगाह बन गया

हर निगाहो - नज़र खूंफ़िशां हो गई


तौबा-तौबा ख़ुदा ! लुट गए - लुट गए

आज घर- घर यही दास्ताँ हो गई


ईश्वर ! रहम कर हाल पे हिन्द के

रोते - रोते कलम बेज़ुबां हो गई


जल जाऊं कहीं 'अलबेला' डर गया

अब तो आबो - हवा आतिशां हो गई


क्या है गर वो चले गए..........

अरमानों की भीड़ गई, दिल में उठते वलवले गए

साक़ी सागर और सुराही मस्ती के मश्गले गए


दूर उफ़क में दिखता था वह पैक़र एक मस्सर्रत का

जब-जब भी हम हुस्न देखने आसमान के तले गए


आज उदासी के साये से छलकी है ये शाम--हसीं

दूर बहुत अब दिल से अन्धड़-तूफ़ान--ज़लज़ले गए


उनके हर फ़र्मान को हमने सर - आँखों पे रक्खा पर

उनके हाथों ज़ख्म हमारे नमक लगा कर तले गए


कभी चमन में खिजां, कभी आती है यार बहार यहाँ

हरगिज़ मत रोना 'अलबेला' क्या है गर वो चले गए

तिनका भी न मिला हमें........................

दर्दे-मुहब्बत दर्दे-जिगर और दर्दे-जुदाई मिला हमें

फिर भी वफ़ा करते जायेंगे शिकवा गिला हमें


जिन ज़ुल्फ़ों के जाल में उलझे-उलझे ही दम टूट गया

हाय ! सुलगती धूप में उनका साया तक मिला हमें


दर- दर गिरते - पड़ते गुज़री उम्र हमारी क्या कीजे

साथी सईगर कोई , ही राहबर मिला हमें


बीच समन्दर पहुंचे हम तो तूफ़ानों की दहशत थी

साहिल तो है बात दूर की तिनका भी मिला हमें


आह ! जवानी फूट-फूट क्यों रोये इस हालत पर

मर जाएँ तो लोग कहेंगे क़फ़न तलक मिला हमें


पढ़ते - पढ़ते 'अलबेला' काबिल तो हुए वज़ारत के

यार मगर चपरासी तक का ओहदा भी मिला हमें

अक्सर ये हिन्दुस्तान रोता है............

उदर की आग में जलता जहाँ इन्सान रोता है

ज़मीं के हाल पे बन्धु वहाँ आस्मान रोता है


कुचलता है जहाँ माली ही निज कदमों से कुसुमों को

वहाँ तामीर रोती है, वहाँ निर्माण रोता है


भुवन पर छा रहे हैं रात-दिन विध्वंस के बादल

अमन नेहरू का और राजीव का अरमान रोता है


सियासत नाचती है निर्वसन हो रोज़ संसद में

और आँसू खून के इस देश का संविधान रोता है


उस इक बेटी का कद माँ भारती से भी बड़ा पा कर

पिता दशमेश की सन्तान का बलिदान रोता है


अज़ान-ओ-आरती की तेग़ जब नर-रक्त पीती है

लिपट अल्लाह की छाती से तब भगवान रोता है


किसे फ़ुर्सत, जो अब देखे वतन के ज़ख्म 'अलबेला'

कि अपने हाल पर अक्सर ये हिन्दुस्तान रोता है

लेकिन अब शैतान हुए .................

सत, त्रेता और द्वापर युग तीनों ही अन्तर्ध्यान हुए

कलयुग आया, आटा महंगा, सस्ते दीन - ईमान हुए


पांचाली का चीरहरण हर तीन मिनट में होता है

पाण्डव तो लाचार खड़े थे, मोहन भी हैरान हुए


कल तक ये मन्दिर और मस्जिद अमन-चैन के वाहक थे

आज यही मन्दिर और मस्जिद दंगों का सामान हुए


फूट-फूट रोता है ईश्वर आज हमारी हालत पर

कितने हम मक्कार हुए हैं, कितने हम बेईमान हुए


आगजनी हाय राहजनी और बलात्कार भी करते हैं

हम तो इन्सां थे 'अलबेला' कब कैसे शैतान हुए ?

आदमी को आदमी से प्रीत हो

अधर-अध मधुर-मधुर गीत हो

और वातावरण में संगीत हो


हे प्रभु ! तेरे बनाये जगत में

आदमी को आदमी से प्रीत हो


नाश हो अधर्म का पाखण्ड का

धर्म के ध्वज की सदैव जीत हो


शत्रुता में 'अलबेला' धरा है क्या ?

जग में जो भी हो, हमारा मीत हो


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