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Albela Khatri

जान-बूझ कर अपनी पत्नी को व्यभिचारिणी बनाना है





शाबास है उसकी मर्दानगी को जो पराई स्त्री पर नज़र नहीं डालता !

वह नेक और धर्मात्मा ही नहीं, वह सन्त है

-तिरुवल्लुवर



पर-स्त्रीगमन

जान-बूझ कर अपनी पत्नी को व्यभिचारिणी बनाना है

-विजयधर्म सुरिश्वर


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4 comments:

Majaal September 5, 2010 at 1:40 PM  

जो मन चंगा तो कठोती में गंगा,
जो मन में पंगा, तो मंदिर में भी रंभा,
जो ऐसे हालत, तो घर में होगा दंगा,
और शामत है तय, जो बीवी से लो पंगा,
इसलिए बेटा 'मजाल', रखो मन चंगा !

दीपक 'मशाल' September 5, 2010 at 2:49 PM  

badhaai ji

निर्मला कपिला September 5, 2010 at 8:28 PM  

सत्य वचन। आपके कई ब्लाग खुलते ही नही। समझ नही आता कि कहां टिप्पणी करें ब्लागवाणी के जाने से सब कुछ गडबड हो गया। शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' September 5, 2010 at 10:13 PM  

सत्य कथन!

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