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Albela Khatri

अब अमन के देश को सौहार्द्र की शक्ति मिले

चलो धुंधलका हटा

एक बड़ा काम पटा

असमंजस का कुहासा तंग कर रहा था

वैमनस्यता का सियाह रंग भर रहा था


आज आकाश कुछ और खुल गया है, यों लगता है

सबको अपना इन्साफ़ मिल गया है, यों लगता है


मन मेरा भी ख़ुश है, शुक्रगुज़ार है

फ़ैसले का स्वागत बार - बार है


निर्णय भी हुआ और न्याय भी.............

ये शुभ संकेत हैं

शेष हम सचेत हैं


सम्मान हो इस फ़ैसले का तो हमारी शान है

क्योंकि ये अब एकता का हिन्दोस्तान है


अब ज़रूरत ही नहीं है गाँठ के उलझाव की

हाथ में जब गई हैं कुंजियाँ सुलझाव की


अब अमन के देश को सौहार्द्र की शक्ति मिले

अब वतन को मज़हबी षड्यंत्रों से मुक्ति मिले


हैं यही शुभकामनायें

हैं यही शुभकामनायें

हैं यही शुभकामनायें

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13 comments:

वीरेंद्र सिंह September 30, 2010 at 6:53 PM  

आपकी भावनाओं का स्वागत है
आपकी ये सार्थक रचना बहुत अच्छी लगी.

आपकी रचना में कई बातें बहुत ही नेक इरादों वाली और भावपूर्ण हैं.
आभार .....

Rahul Rathore September 30, 2010 at 6:53 PM  

अब अमन के देश को सौहार्द्र की शक्ति मिले

अब वतन को मज़हबी षड्यंत्रों से मुक्ति मिले

न किसी की जीत हुई न किसी की हार ..अफवाओं पर मत जाईये ..यहाँ ओर्जिनल कॉपी पढ़िए

Majaal September 30, 2010 at 6:59 PM  

वक़्त जैसे भी, जो भी आता रहे,
आदमी आदमियत से न जाता रहे ..

सुन्दर सामायिक रचना,
लिखते रहिये .....

Satish Saxena September 30, 2010 at 7:07 PM  

दिल है कदमो पर किसी के सर झुका हो या न हो
बंदगी तो अपनी फितरत है, खुदा हो या न हो !!

फ़िरदौस ख़ान September 30, 2010 at 8:24 PM  

सार्थक रचना...

राज भाटिय़ा September 30, 2010 at 9:56 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

कुमार राधारमण September 30, 2010 at 11:16 PM  

कवि की कविता मात्र में ऊंची उड़ान नहीं होनी चाहिए। उसके जीवन में भी काव्यधारा प्रवाहित होनी चाहिए। आपने एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय दिया है।

ओशो रजनीश September 30, 2010 at 11:34 PM  

बढ़िया प्रस्तुति .......
अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

इसे पढ़े और अपने विचार दे :-
क्यों बना रहे है नकली लोग समाज को फ्रोड ?.

राजीव तनेजा October 1, 2010 at 12:11 AM  

बरसों पुराने इस विवादित मुद्दे पर माननीय हाई कोर्ट का फैसला आज आ गया...इस फैसले को अगर सही ढंग से मान लिया जाए तो इससे बढ़िया और कोई बात नहीं हो सकती लेकिन इसके विरोध में अभी से इससे जुड़े पक्षों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जाने की बाते हो रही हैं...ऐसी स्तिथि देश के लिए अच्छी नहीं...
दरअसल कुछ ताकतें ऐसी हैं जो ये कभी नहीं चाहेंगे कि कभी भी इस मुद्दे का हल हो ...
बढ़िया एवं प्रभाशाली रचना

दीपक 'मशाल' October 1, 2010 at 3:11 AM  

आमीन... कविता सुन्दर बन पड़ी है सर..

महेन्‍द्र वर्मा October 1, 2010 at 4:39 PM  

कोई हास्य कवि जब गंभीर मुद्दे पर लिखता हे तो वह रचना और ज्यादा उत्तम होती है...आपकी इस रचना ने यह साबित कर दिया है ...शुभकामनाएं

कविता रावत October 2, 2010 at 1:11 PM  

बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' October 2, 2010 at 2:11 PM  

दो अक्टूबर को जन्मे,
दो भारत भाग्य विधाता।
लालबहादुर-गांधी जी से,
था जन-गण का नाता।।
इनके चरणों में मैं,
श्रद्धा से हूँ शीश झुकाता।।

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