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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

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हे वीणापाणि, वाणी को सुरों का ज्ञान दे दो माँ !



हे वीणापाणि, वाणी को सुरों का ज्ञान दे दो माँ !


कलम में बल, हृदय निर्मल,सहज सम्मान दे दो माँ !


दया का दान दे दो माँ ...यही वरदान दे दो माँ !


वतन के कर्णधारों को ज़रा ईमान दे दो माँ !




ज़रा ईमान दे दो माँ, वतन ख़ुशहाल हो जाए


समृद्धि की बहे धारा मालामाल हो जाए


नई पीढ़ी के पीले चेहरे फिर से लाल हो जाए


ये भारतवर्ष जग में फिर बेमिसाल हो जाए

वसंत पंचमी अभिनन्दन

अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है

मस्ती का मदहोश समन्दर तू ही है

अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है

आँखों में तो कोई भी रह सकता है

लेकिन मेरे दिल के अन्दर तू ही है

प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से

तिनका भी मिल जाए तो टकरायेंगे तूफ़ान से

है हमें उम्मीद नव पीढ़ी के हर नौजवान से

ज़ुल्म और दहशत वतन में कौन फ़िर करेगा

प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से

हो गए कुछ लेट हम इज़हार में........


हुस्न के तेवर नुकीले हो गए

इश्क़ के सब जोड़ ढीले हो गए

हो गए कुछ लेट हम इज़हार में

और उनके हाथ पीले हो गए

तुमने पूरा जाम दे दिया ......

चाहत का इनाम दे दिया

कोशिश को अन्जाम दे दिया

मैंने एक घूँट मांगी थी

तुमने पूरा जाम दे दिया

चिलमन जो हटाई तो आफ़ताब सी लगी

वक़्ते-सहर जो देखा तो गुलाब सी लगी

और शब को वो विलायती शराब सी लगी

घूंघट में जब लजाई, मॉहताब सी
लगी

चिलमन जो हटाई तो आफ़ताब सी लगी


यह तो कोई और जगह है, अपना हिन्दुस्तान नहीं ...

नूर आँख में,

खून में हिम्मत,

दिल में दीन-ईमान नहीं


कहने को क्या है,

कह देंगे,

लेकिन वो इन्सान नहीं


भूखे को

रोटी की मुश्क़िल ,

नंगे को कपड़ा मुश्क़िल


यह तो कोई

और
जगह है

अपना
हिन्दुस्तान नहीं

प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से

तिनका भी मिल जाए तो टकरायेंगे तूफ़ान से


है हमें उम्मीद नव पीढ़ी के हर नौजवान से


ज़ुल्म और दहशत वतन में कौन फ़िर करेगा


प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से

हमसे तो तेरी फोटो भी फाड़ी न जायेगी ..............

चादर ये मुहब्बत की है झाड़ी न जायेगी

ये गाड़ी है अगाड़ी , पिछाड़ी न जायेगी

तूने तो इस जिगर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए

हमसे तो तेरी फोटो भी फाड़ी न जायेगी

तुम्हारी चाह का चाकू .......बड़ी मुश्क़िल से निकलेगा

मुन्सिफ़ से ही निकलेगा,

ये क़ातिल से निकलेगा


बनवारी से निकलेगा,

ये बिस्मिल से निकलेगा


तुम्हारी चाह का चाकू .......

बड़ी
मुश्क़िल से निकलेगा


कि दिल भी साथ निकलेगा

अगर ये दिल से निकलेगा

आदमी को यहां खा रहा आदमी

हम भी हैं आदमी, तुम भी हो आदमी

सोचता हूं मगर... है चीज़ क्या आदमी

बन में हैवां जो हैवां को खाए तो क्या

आदमी को यहां खा रहा आदमी

वतन के कर्णधारों को ज़रा ईमान दे दो माँ !

हे वीणापाणि, वाणी को सुरों का ज्ञान दे दो माँ !


कलम में बल,हृदय निर्मल,सहज सम्मान दे दो माँ !


दया का दान दे दो माँ ...यही वरदान दे दो माँ !


वतन के कर्णधारों को ज़रा ईमान दे दो माँ !




ज़रा ईमान दे दो माँ .....वतन खुशहाल हो जाए


समृद्धि की बहे धारा व मालामाल हो जाए


नई पीढ़ी के पीले चेहरे फिर से लाल हो जाए


ये भारतवर्ष जग में फिर बेमिसाल हो जाए

जो भी मिला बहुत मिला, सन्तोष कीजिए

गफ़लत तो ख़ूब हो चुकी, अब होश कीजिए

जो भी मिला बहुत मिला, सन्तोष कीजिए

वो तो पलक झपकने से भी पहले आएगा

बशर्ते अपने आप को निर्दोष कीजिए

मिर्चों के पौधे बो रहा है यार किसलिए ?

जगने के वक़्त सो रहा है यार किसलिए ?

सुनहरी मौका खो रहा है यार किसलिए ?

ये बाग़ है बादाम का , तू आम तो उगा

मिर्चों के पौधे बो रहा है यार किसलिए ?

अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है...........

मस्ती का मदहोश समन्दर तू ही है

अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है

आँखों में तो कोई भी रह सकता है

लेकिन मेरे दिल के अन्दर तू ही है

किसकी तलाश में भटक रहे हो दर-ब-दर.....

वो धूप में, दीये में, वो ही पूजा-पाठ में

वो सोमनाथ में, वो ही केदारनाथ में

किसकी तलाश में भटक रहे हो दर--दर

वो रब तो हर घड़ी है हर बशर के साथ में

जो ख़्वाबों में ही आजाओ तो अपना काम हो जाए ..........

निगाह उट्ठे तो सुबह हो, झुके तो शाम हो जाए

अगर तू मुस्कुरा भर दे तो क़त्लेआम हो जाए

ज़रूरत ही नहीं तुमको मेरी बांहों में आने की

जो ख़्वाबों में ही आजाओ तो अपना काम हो जाए

बर्क़ जब कड़कडाती हैं, तुम्हारी याद आती है............

पवन जब गुनगुनाती है, तुम्हारी याद आती है

घटा घनघोर छाती है, तुम्हारी याद आती है

बर्क़ जब कड़कडाती हैं, तुम्हारी याद आती है

कि जब बरसात आती है, तुम्हारी याद आती है




तुम्हारी याद आती है, तो लाखों दीप जलते हैं

मेरी चाहत के मधुबन में हज़ारों फूल खिलते हैं

इन आँखों में कई सपने, कई अरमां मचलते हैं

तुम्हारी याद आती है तो तन के तार हिलते हैं

आर-पार हो गया................

जब से तुम्हारे हुस्न का दीदार हो गया

मैं आदमी था काम का बेकार हो गया

मारा जो तूने खींच कर अबरू-गुलेल से

वो संग इस जिगर के आर-पार हो गया

मैंने इक चुम्बन माँगा था ..........

तुमने कितना प्यार दे दिया

जीने का आधार दे दिया

मैंने इक चुम्बन माँगा था

तुमने हर अधिकार दे दिया

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