हे वीणापाणि, वाणी को सुरों का ज्ञान दे दो माँ !
कलम में बल, हृदय निर्मल,सहज सम्मान दे दो माँ !
दया का दान दे दो माँ ...यही वरदान दे दो माँ !
वतन के कर्णधारों को ज़रा ईमान दे दो माँ !
ज़रा ईमान दे दो माँ, वतन ख़ुशहाल हो जाए
समृद्धि की बहे धारा व मालामाल हो जाए
नई पीढ़ी के पीले चेहरे फिर से लाल हो जाए
ये भारतवर्ष जग में फिर बेमिसाल हो जाए
वसंत पंचमी अभिनन्दन
हे वीणापाणि, वाणी को सुरों का ज्ञान दे दो माँ !
Labels: मुक्तक the albeli poem
अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है
मस्ती का मदहोश समन्दर तू ही है
अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है
आँखों में तो कोई भी रह सकता है
लेकिन मेरे दिल के अन्दर तू ही है
Labels: मुक्तक the albeli poem
प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से
तिनका भी मिल जाए तो टकरायेंगे तूफ़ान से
है हमें उम्मीद नव पीढ़ी के हर नौजवान से
ज़ुल्म और दहशत वतन में कौन फ़िर करेगा
प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से
Labels: मुक्तक the albeli poem
हो गए कुछ लेट हम इज़हार में........
हुस्न के तेवर नुकीले हो गए
इश्क़ के सब जोड़ ढीले हो गए
हो गए कुछ लेट हम इज़हार में
और उनके हाथ पीले हो गए
Labels: मुक्तक the albeli poem
तुमने पूरा जाम दे दिया ......
चाहत का इनाम दे दिया
कोशिश को अन्जाम दे दिया
मैंने एक घूँट मांगी थी
तुमने पूरा जाम दे दिया
Labels: मुक्तक the albeli poem
चिलमन जो हटाई तो आफ़ताब सी लगी
वक़्ते-सहर जो देखा तो गुलाब सी लगी
और शब को वो विलायती शराब सी लगी
घूंघट में जब लजाई, मॉहताब सी लगी
चिलमन जो हटाई तो आफ़ताब सी लगी
Labels: मुक्तक the albeli poem
यह तो कोई और जगह है, अपना हिन्दुस्तान नहीं ...
नूर आँख में,
खून में हिम्मत,
दिल में दीन-ईमान नहीं
कहने को क्या है,
कह देंगे,
लेकिन वो इन्सान नहीं
भूखे को
रोटी की मुश्क़िल ,
नंगे को कपड़ा मुश्क़िल
यह तो कोई
और जगह है
अपना हिन्दुस्तान नहीं
Labels: मुक्तक the albeli poem
प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से
तिनका भी मिल जाए तो टकरायेंगे तूफ़ान से
है हमें उम्मीद नव पीढ़ी के हर नौजवान से
ज़ुल्म और दहशत वतन में कौन फ़िर करेगा
प्यार गर मिलता रहे इन्सान को इन्सान से
Labels: मुक्तक the albeli poem
हमसे तो तेरी फोटो भी फाड़ी न जायेगी ..............
चादर ये मुहब्बत की है झाड़ी न जायेगी
ये गाड़ी है अगाड़ी , पिछाड़ी न जायेगी
तूने तो इस जिगर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए
हमसे तो तेरी फोटो भी फाड़ी न जायेगी
Labels: मुक्तक the albeli poem
तुम्हारी चाह का चाकू .......बड़ी मुश्क़िल से निकलेगा
न मुन्सिफ़ से ही निकलेगा,
न ये क़ातिल से निकलेगा
न बनवारी से निकलेगा,
न ये बिस्मिल से निकलेगा
तुम्हारी चाह का चाकू .......
बड़ी मुश्क़िल से निकलेगा
कि दिल भी साथ निकलेगा
अगर ये दिल से निकलेगा
Labels: मुक्तक the albeli poem
आदमी को यहां खा रहा आदमी
हम भी हैं आदमी, तुम भी हो आदमी
सोचता हूं मगर... है चीज़ क्या आदमी
बन में हैवां जो हैवां को खाए तो क्या
आदमी को यहां खा रहा आदमी
Labels: मुक्तक the albeli poem
वतन के कर्णधारों को ज़रा ईमान दे दो माँ !
हे वीणापाणि, वाणी को सुरों का ज्ञान दे दो माँ !
कलम में बल,हृदय निर्मल,सहज सम्मान दे दो माँ !
दया का दान दे दो माँ ...यही वरदान दे दो माँ !
वतन के कर्णधारों को ज़रा ईमान दे दो माँ !
ज़रा ईमान दे दो माँ .....वतन खुशहाल हो जाए
समृद्धि की बहे धारा व मालामाल हो जाए
नई पीढ़ी के पीले चेहरे फिर से लाल हो जाए
ये भारतवर्ष जग में फिर बेमिसाल हो जाए
Labels: मुक्तक the albeli poem
जो भी मिला बहुत मिला, सन्तोष कीजिए
गफ़लत तो ख़ूब हो चुकी, अब होश कीजिए
जो भी मिला बहुत मिला, सन्तोष कीजिए
वो तो पलक झपकने से भी पहले आएगा
बशर्ते अपने आप को निर्दोष कीजिए
Labels: मुक्तक the albeli poem
मिर्चों के पौधे बो रहा है यार किसलिए ?
जगने के वक़्त सो रहा है यार किसलिए ?
सुनहरी मौका खो रहा है यार किसलिए ?
ये बाग़ है बादाम का , तू आम तो उगा
मिर्चों के पौधे बो रहा है यार किसलिए ?
Labels: मुक्तक the albeli poem
अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है...........
मस्ती का मदहोश समन्दर तू ही है
अखिल भुवन में सबसे सुन्दर तू ही है
आँखों में तो कोई भी रह सकता है
लेकिन मेरे दिल के अन्दर तू ही है
Labels: मुक्तक the albeli poem
किसकी तलाश में भटक रहे हो दर-ब-दर.....
वो धूप में, दीये में, वो ही पूजा-पाठ में
वो सोमनाथ में, वो ही केदारनाथ में
किसकी तलाश में भटक रहे हो दर-ब-दर
वो रब तो हर घड़ी है हर बशर के साथ में
Labels: मुक्तक the albeli poem
जो ख़्वाबों में ही आजाओ तो अपना काम हो जाए ..........
निगाह उट्ठे तो सुबह हो, झुके तो शाम हो जाए
अगर तू मुस्कुरा भर दे तो क़त्लेआम हो जाए
ज़रूरत ही नहीं तुमको मेरी बांहों में आने की
जो ख़्वाबों में ही आजाओ तो अपना काम हो जाए
Labels: मुक्तक the albeli poem
बर्क़ जब कड़कडाती हैं, तुम्हारी याद आती है............
घटा घनघोर छाती है, तुम्हारी याद आती है
कि जब बरसात आती है, तुम्हारी याद आती है
तुम्हारी याद आती है, तो लाखों दीप जलते हैं
मेरी चाहत के मधुबन में हज़ारों फूल खिलते हैं
इन आँखों में कई सपने, कई अरमां मचलते हैं
तुम्हारी याद आती है तो तन के तार हिलते हैं
Labels: मुक्तक the albeli poem
आर-पार हो गया................
जब से तुम्हारे हुस्न का दीदार हो गया
मैं आदमी था काम का बेकार हो गया
मारा जो तूने खींच कर अबरू-गुलेल से
वो संग इस जिगर के आर-पार हो गया
Labels: मुक्तक the albeli poem
मैंने इक चुम्बन माँगा था ..........
तुमने कितना प्यार दे दिया
जीने का आधार दे दिया
मैंने इक चुम्बन माँगा था
तुमने हर अधिकार दे दिया
Labels: मुक्तक the albeli poem

