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Albela Khatri

चिलमन जो हटाई तो आफ़ताब सी लगी

वक़्ते-सहर जो देखा तो गुलाब सी लगी

और शब को वो विलायती शराब सी लगी

घूंघट में जब लजाई, मॉहताब सी
लगी

चिलमन जो हटाई तो आफ़ताब सी लगी


8 comments:

Kusum Thakur September 16, 2009 at 2:47 PM  

क्या खूब कही है अपने.....

राज भाटिय़ा September 16, 2009 at 2:57 PM  

वाह जी वाह

रज़िया "राज़" September 16, 2009 at 3:55 PM  

वक़्ते-सहर जो देखा तो गुलाब सी लगी

और शब को वो विलायती शराब सी लगी

घूंघट में जब लजाई, मॉहताब सी लगी

चिलमन जो हटाई तो आफ़ताब सी लगी

कुछ और दिन तो रोक लो अपने को अल्बेला।

फ़िर ख़ुद ही बोल दोगे कि "तेज़ाब "सी लगी।

कैसी रही!!!!!
मज़ेदार लेखनी आपकी लगी।

Mithilesh dubey September 16, 2009 at 9:19 PM  

बहुत खुब,,,,,,,,,,,,,,,,

शिवम् मिश्रा September 16, 2009 at 11:47 PM  

बहुत बढ़िया, भाई जी !

शिवम् मिश्रा September 16, 2009 at 11:50 PM  

बहुत बढ़िया, भाई जी !

शिवम् मिश्रा September 17, 2009 at 12:11 AM  

बहुत बढ़िया, भाई जी !

ब्लॉ.ललित शर्मा September 17, 2009 at 10:50 AM  

तमारा मुक्तक सरस छे मजा आवी गया

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