जीवन में तुम प्यार तो घोलो बाबाजी
फिर तुम अपना श्रीमुख खोलो बाबाजी
साहित्य के इस मंच पे गर कुछ कहना है
साहित्यिक भाषा में बोलो बाबाजी
जीवन में सुख दुःख का सीधा मतलब है
थोड़ा हँस लो, थोड़ा रो लो बाबाजी
मान गया मैं, नहीं डरे तुम झूले पर
अब तो अपने कपड़े धोलो बाबाजी
ढाई बज गये, बाबी द्वार न खोलेगी
यहीं किसी फुटपाथ पे सो लो बाबाजी
हाथ में थी वो सारी फ़सल उड़ा डाली
साथ की खातिर भी कुछ बो लो बाबाजी
रोने से क्या संकट कम हो जायेंगे ?
आओ झूमो, नाचो, डोलो बाबाजी
'अलबेला' सब रूखापन मिट जायेगा
जीवन में तुम प्यार तो घोलो बाबाजी
-अलबेला खत्री
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इन चाण्डालों के चंगुल से हिन्दुस्तान बचालो ! संकट में है जान हमारी, हे हनुमान बचालो !
संकट में है जान हमारी, हे हनुमान बचालो !
पड़ी ज़रूरत आन तुम्हारी, हे हनुमान बचालो !
अवध धरा पर वध जारी है और तुम देख रहे हो
मानवता पर बमबारी है और तुम देख रहे हो
पुलिस यहाँ अत्याचारी है और तुम देख रहे हो
अधिकारी भ्रष्टाचारी है और तुम देख रहे हो
पूरी व्यवस्था व्यभिचारी है और तुम देख रहे हो
आज हुकूमत हत्यारी है और तुम देख रहे हो
देश की जनता आज पुकारी, बाबा जान बचालो !
पड़ी ज़रूरत आन तुम्हारी, हे हनुमान बचालो !
मंहगाई के लट्ठ से सबका माथा फूट रहा है
अर्थशास्त्री मनमोहनसिंह जम कर कूट रहा है
कब तक अपने आँसू रोकूँ, धीरज छूट रहा है
बाँध सब्र का अब तक रोका, पर अब टूट रहा है
न अब घर में दूध दही है, न अब फ्रूट रहा है
देश का नेता दोनों हाथों से देश को लूट रहा है
इन चाण्डालों के चंगुल से हिन्दुस्तान बचालो !
संकट में है जान हमारी, हे हनुमान बचालो !
-अलबेला खत्री
अरे भाई कोई समझाओ इसे ........हर चीज फ्रिज में रखने की नहीं होती
और तरो-ताज़ा रहता है, परन्तु मेरे घर का फ्रिज कुछ विचित्र है ।
वह केवल और केवल मेरा दिमाग गर्म करने के लिए ही बना है शायद ।
अब क्या बताऊँ कि कैसा है ? बिलकुल हमारी पार्लियामेंट जैसा है
जिसमे सही से ज़्यादा गलत तत्त्व भरे पड़े हैं । उसपे तुर्रा ये है कि मुझे
सिर्फ़ सहन करना है............ न तो मैं पार्लियामेंट में कुछ बदलाव ला
सकता हूँ और न ही अपने घर के फ्रिज में ।
हालाँकि मैं फ्रिज सिर्फ़ तभी खोलता हूँ जब देर रात को घर के बाकी
लोग सोये रहते हैं और मुझे चाय बनाने के लिए दूध की दरकार होती है,
वरना मैं तो ज़िन्दगी भर उसकी तरफ़ झाँकूँ भी नहीं, क्योंकि जब भी
खोलता हूँ खून खौल उठता है मेरा.................क्योंकि ऐसी ऐसी चीज़ें
भरी मिलती हैं उसमे जो कि फ्रिज में रखनी ही नहीं चाहिए....मसलन
अचार, केले, काजू, किशमिश व बादाम और तो और पापड़ भी !
पापड़ ?
पापड़ भी फ्रिज में ?
प्याज़ भी फ्रिज में ?
दवाइयाँ तो ठीक है लेकिन ग्लूकोज़ पाउडर भी फ्रिज में ?
अब कुछ बोलो तो घर में झगड़ा होता है क्योंकि गुड्डू की माँ इस
विश्वास पर अड़ी है कि फ्रिज में रखने से हर चीज तरो-ताज़ा और
अच्छी रहती है । वो तो साइज़ छोटा पड़ जाता है वरना मेरी पत्नी
का वश चले तो मेरा पलंग भी वह उसी फ्रिज में बिछादे ............
लेकिन पापड़ ?
अरे कोई समझाओ इसे भाई...हर चीज फ्रिज में रखने की नहीं होती,
आप समझायेंगे तो मुझे दो लाभ होंगे, एक तो वो समझ जाएगी और
दूसरा मुझे इस पोस्ट पर टिप्पणियां मिल जाएँगी.................
क्यों ठीक है न ठीक ?

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Labels: अलबेला खत्री , घर की बात , पलंग , पापड़ , फ्रिज , मैं और मेरा फ्रिज , हास्य
उसको वन में रहने से क्या लाभ हो सकता है ?
जिसने इच्छा का त्याग किया
उसको घर छोड़ने की क्या आवश्यकता है
और जो इच्छा का बन्धुआ है,
उसको वन में रहने से क्या लाभ हो सकता है ?
सच्चा त्यागी
जहाँ रहे
वहीँ वन और वहीँ भजन-कन्दरा है
-महाभारत



