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Albela Khatri

इन्सां आज हो रहे हैवान मेरे देश में................

जाने कब कोई के

चूर-चूर कर डाले,

ज़िन्दगी है स्वप्न समान मेरे देश में


देख लो विडम्बना कि

राशन हो हो किन्तु

हाज़िर है मौत का सामान मेरे देश में


उजड़े सुहाग लाखों,

लाखों ही यतीम हुए,

शहर ही बने शमशान मेरे देश में


कैसे कहूं बन्धु ये

ज़ुबान जली जाती है कि

इन्सां आज हो रहे हैवान मेरे देश में

10 comments:

राज भाटिय़ा September 8, 2009 at 10:44 PM  

कैसे कहूं बन्धु ये
ज़ुबान जली जाती है कि
इन्सां आज हो रहे हैवान मेरे देश में

आप की पुरी कविता ही आज का एक कडबा सच है, लोग पेसे के पीछे लगे है, देश,मान सम्मान कुछ नही.
धन्यवाद

राजीव तनेजा September 8, 2009 at 10:46 PM  

दोस्त हों ना हों...

हर तरफ आस्तीन में साँप छिपे बैठे हैँ मेरे देश में

शिवम् मिश्रा September 8, 2009 at 10:56 PM  

"जाने कब कोई आ के

चूर-चूर कर डाले,

ज़िन्दगी है स्वप्न समान मेरे देश में"



सुंदर रचना|

Anil Pusadkar September 8, 2009 at 11:23 PM  

अच्छी और सच्ची रचना।

आमीन September 8, 2009 at 11:29 PM  

जाने कब कोई आ के
चूर-चूर कर डाले,
ज़िन्दगी है स्वप्न समान मेरे देश में


शब्दों को मोतिओं की तरह पिरो दिया है आपने.. गजब कर दिया है... वैसे आपको गुड कहना मतलब सूरज को दिया दिखने के बराबर है

संगीता पुरी September 8, 2009 at 11:37 PM  

कैसे कहूं बन्धु ये

ज़ुबान जली जाती है कि

इन्सां आज हो रहे हैवान मेरे देश में
सत्‍य से कबतक इंकार किया जा सकता है ?

Udan Tashtari September 8, 2009 at 11:56 PM  

बहुत बढ़िया.

Sudhir (सुधीर) September 9, 2009 at 8:15 AM  

वाह! वाह!! आज के सच को उजागर करती हुई रचना

रज़िया "राज़" September 9, 2009 at 3:45 PM  

बहोत बढिया। सोचने पर मज़बूर कर देनेवाली रचना।

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" September 9, 2009 at 7:59 PM  

कैसे कहूं बन्धु ये

ज़ुबान जली जाती है कि

इन्सां आज हो रहे हैवान मेरे देश में।।

बिल्कुल सत्य कहा बन्धु!!!!!!

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