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आग जब तक लकड़ी में छिपी रहती है, तब तक कोई भी उसे लांघ जाता है, मगर जलती हुई को नहीं


आदमी शक्तिशाली हो,

लेकिन अपनी शक्ति दिखाए

तो लोग उसका तिरस्कार ही करते हैं

आग जब तक लकड़ी में छिपी रहती है

तब तक कोई भी उसे लांघ जाता है,

मगर जलती हुई को नहीं

***********


या तो जैसा अपने को बाहर से दिखाते हो

वैसा ही भीतर से बनो,

या जैसे भीतर हो

वैसे ही बाहर से दिखाओ

*************


जो नम्रतापूर्वक

किसी गुमराह को रास्ता बताता है,

उसके समान है

जो अपने चिराग से

दूसरे का चिराग रोशन करता है


- अज्ञात महापुरूष


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4 comments:

विनोद कुमार पांडेय June 12, 2010 at 9:09 AM  

अलबेला जी होना भी यही चाहिए मनुष्य को दो चेहरों के साथ नही रहना चाहिए जैसा है वैसा ही दिखना चाहिए..बहुत ही सुंदर वचन...प्रस्तुति के लिए आभार

Anamikaghatak June 12, 2010 at 9:14 AM  

manushya ko maulikta nahi khona chahiye

संगीता स्वरुप ( गीत ) June 12, 2010 at 10:58 AM  

बहुत अच्छे सुविचार....

शिवम् मिश्रा June 12, 2010 at 4:52 PM  

बहुत बढ़िया बड़े भाई ! लगे रहिये !

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