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Albela Khatri

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हमें कुछ फ़र्क लगता ही नहीं अपनों में-गैरों में


सज़ा  हम दे नहीं सकते, हमें तो प्यार आता है 

ये मौसम अपने ही जीवन में बारम्बार आता है 

हमें कुछ फ़र्क  लगता ही नहीं अपनों में-गैरों में 

हमें दिखता है दुश्मन भी गोया  दिलदार आता है 


-अलबेला खत्री 
 

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी से हास्यकवि अलबेला खत्री की साहित्यिक मुलाकात


प्यारे मित्रो नमस्कार

गाँधी नगर में मेरा कल का दिन बहुत ऊर्जा  और प्रफुल्लता भरा 


रहा .  अहमदाबाद  के बंधुवर  राजकुमार भक्कड़ के सौजन्य से  

अनेकानेक  दिग्गज  हस्तियों से  मुलाकात का सिलसिला  दिन भर 

चला . विशेषकर ऊर्जा, शौर्य  और पराक्रम के प्रतीक पुरूष, गुजरात 

के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी से एक लम्बी भेंट हुई तथा उन पर 

रचित एक लम्बी कविता उन्हीं के कार्यालय में सुनाने व भेंट करने का 

अवसर मिला .


मोदीजी ने बड़े आनंद से पूरी रचना का श्रवण करने के बाद जो टिप्पणी 


की वो उनकी आत्मिक विनम्रता की सुगंध थी ...उनकी  शुभ कामनाओं  

की महक  मुझे बहुत दिनों  तक  आह्लादित रखेगी

जय हिन्द ! 








तुझको मीठा होना ही था, बाप तेरा हलवाई है ....

.
 


लस्सी पीने वालों ने  अब  व्हिस्की मुँह लगाई है

तन-मन के दुःख दूर हुए, ज़ेहन पर मस्ती छाई है



बड़भागी वे नर हैं जिनको रोज़ नई सप्लाई  है


अपनी फूटी किस्मत में तो केवल एक लुगाई है



तेरे गालों के गड्ढे में गिर कर ही दम टूट गया


पूछे कौन समन्दर से तुझमे कितनी गहराई है



हाँ भई हाँ, हम तो कड़वे हैं, खारे हैं और खट्टे भी


तुझको मीठा होना ही था, बाप तेरा  हलवाई है



पाकिस्तानी मलिक हो चाहे, हिन्दुस्तानी मलिका हो


जिसने जितना जिस्म दिखाया, उतनी शोहरत पाई है



घर के सब बच्चे ख़ुश होकर लगे नाचने आँगन में


मैंने पूछा- क्या लफड़ा है, बोले- बिजली आई है



महानगर की ये विडम्बना हमने देखी 'अलबेला'


भीतर बहना बदन बेचती,  बाहर बैठा भाई है 



 जय हिन्द !
 -अलबेला खत्री 
 

कितने साल घिसा है ख़ुद को, तब ये दौलत पाई है




सूनापन है,   सन्नाटा है,   तल्खी है,   तन्हाई है


ऐसे में क्या ख़बर कहाँ से ग़ज़ल उतर कर आई है



उमड़ रहा पुरज़ोर तलातुम जब मुर्शद के प्याले में 


पूछे कौन समन्दर से तुझमे कितनी गहराई है



महल तो है पर सपनों का है, घोड़े हैं पर ख़्वाबों के


चन्द तालियाँ, वाहवाहियां, अपनी असल  कमाई है



औरों ने कितना सरमाया जोड़ लिया है  बैंकों में


हमने  तो बस झख मारी है,  केवल धूल उड़ाई है



लाल किला लगता है गोया  महबूबा की लाली सा


ताजमहल भी किसी हसीना की कातिल अंगड़ाई है



सर पे चिट्टे बाल देख कर, काहे को शरमाऊं मैं


कितने साल घिसा है ख़ुद को, तब ये दौलत पाई है



प्यार-मोहब्बत, यारी-वारी, अपने बस की बात नहीं


जब भी कोशिश की "अलबेला" चोट करारी खाई है



____जय हिन्द !


albela khatri live on stage in surat at event of jai jawan


ख़बरदार ! आज की तुकबन्दियाँ केवल वयस्कों के लिए हैं फेसबुकिया मूड में रचित इन मुक्तकों को कच्ची उम्र के लोग न पढ़ें



एक उम्र का साथ नहीं, ये जनम - जनम का साथ है

हम और तुम जो मिले हैं इसमें भी कुदरत का हाथ है


ये अनुपम सम्बन्ध हमारा दुनिया में मिसाल बनेगा


अपनी मोहब्बत, अपनी चाहत, ईश्वर  की  सौगात है 




ये बिन्दू बिन्दू  दीप सजाये लगते हैं


मुझको ये  सब तेरे ही साये लगते हैं


लफ्ज़ जहाँ पर चुप्पी साध लिया करते


वहाँ आपने  अधर हिलाये लगते हैं


ये तड़प स्वयं बतलाती है, तुम  उतर चुकी हो सागर में


तुम मीरा से कान्हा बन कर आई हो नेह  की गागर में


तुम देह नहीं हो देह्तर हो, तुम नाद हो बंशी वाले का 



दुनिया उसकी दीवानी है, जो दीवाना  उस ग्वाले का 




काम भले कितना  मुश्किल हो, किन्तु सरल हो जाएगा


तुम चाहो तो शाम को मिलना भी पोसिबल  हो जायेगा


तुम कहती धूप - छाँव  तक मुँह से कुछ  नहीं  कहती है


मैं कहता हूँ, कह कर देखो, हर लफ़्ज़  ग़ज़ल हो जायेगा



ख्याले यार में गुम वो जानेमन रहता  क्यों नहीं है


मेरी तरह  मस्ती के दरिया  में बहता क्यों नहीं है


हया कैसी मोहब्बत में उसे, डर कैसा बदनामी का


वो मुझसे प्यार करता है तो फिर कहता क्यों नहीं है 




नख से ले शिख तक तुम  प्रेम में पगी हो


इसलिए हे नेहवती ! तुम सबकी  सगी हो


कृष्ण तुम्हारे, तुम कृष्णा की जग जाहिर है 



जब भी देखा मैंने तुमको मीरा सी ही लगी हो 




ह्रदय समर्पित कर तुमको  मैंने नन्हा  उपहार दिया


भला करे भगवान आपका, तुमने इसे स्वीकार किया


कौन पूछता है जग में, किसने किसको कितना चाहा


पर एक बात तो पक्की है कि मैंने तुम से प्यार किया


_____सुप्रभात


_____उर्जस्वित दिवस .......


जय हिन्द !



Rajkot me albela khatri ke audio NAMAN MAHIMA  ka lokarpan samaroh


जो मज़ा संन्यास में है, वो कहाँ सहवास में.....

जो मज़ा ऐश्वर्य में है, वो कहाँ सन्त्रास में

जो मज़ा है तृप्तियों में, वो कहाँ है प्यास में


योगरथ को छोड़ कर क्यों रोगपथ पर मैं चलूँ ?

जो मज़ा संन्यास में है, वो कहाँ सहवास में.....




-अलबेला खत्री 

अलबेला खत्री की कवितायेँ

हाथ पीले करदो वरना मुंह काला हो जाएगा ................

महिलाओं का मैं बहुत सम्मान करता हूं। हंसने की बात नहीं है, सचमुच करता हूं,
वाकई करता हूं और मैं तो क्या मेरे पिताजी भी किया करते थे। हो सकता है

उनके पिताजी भी करते हों लेकिन मैं गारंटी से कुछ नहीं कह सकता क्योंकि

उस वक्त मैं था नहीं इसलिए देखा नहीं। पर इतना .जरूर जानता हूं कि आदमी

जिससे डरता है उसका सम्मान करता ही है और करना भी चाहिए

नहीं तो महिलायें इतनी तेज़ तथा आत्म निर्भर होती हैं कि ख़ुद करवा लेती हैं

और अपने तरीके से करवा लेती हैं। इतिहास साक्षी है, जिस-जिस व्यक्ति ने

महिलाओं का सम्मान किया, वह मज़े में रहा और जिसने नहीं किया

वह कहीं का नहीं रहा। कंस, रावण, दुर्योधन और दुःशासन जैसे

महाबलियों की कैसी वाट लगी थी, ये हम बचपन से पढ़ते आए हैं।



पुरानी बात छोड़ो, आज के हालात देख लो....

डॉ. मनमोहन सिंह ने एक महिला का विश्र्वास जीत लिया तो बिना चुनाव

लड़े भी देश के प्रधानमंत्री बन गए जबकि अटल बिहारी वाजपेयी कुंवारे

होकर भी एक अखण्ड कुंवारी को ख़ुश नहीं रख सके और उनकी बनी बनाई

गवर्नमेन्ट सि़र्फ एक महिला यानी महारानी जयललिता के कारण गिर गई थी।

लालू यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया तो उसके पुण्य-प्रताप से

केन्द्र में रेलमंत्री बनने का गौरव प्राप्त किया जबकि उन्हीं के बिरादरी भाई

मुलायम सिंह ने मायावती से टक्कर ली तो ऐसी मुंह की खाई

कि सारी हवा निकल गई। ऊपर से मतवाला हाथी सायकल पर ऐसा चढ़ा

था कि पुर्ज़ा पुर्ज़ा रगड़ दिया, रायता बनाकर रख दिया।



इसलिए मेरे भाई, नारी का सम्मान करना .जरूरी है, लाज़िमी है, अनिवार्य है।

क्योंकि सारा का सारा माल महिलाएं दबा के बैठी हैं, पुरूष तो बेचारा

अपने मुंह पर थप्पड़ मार कर गाल लाल रखता है ताकि समाज में

उसकी हेकड़ी बनी रहे। धन दौलत लक्ष्मी मां के पास है,

शक्ति-सामर्थ्य दुर्गा मां के पास है, विद्या-बुद्धि शारदा मां के पास है,

अन्न-औषधि धरती मां के पास है, जल की धारा गंगा-यमुना आदि

माताओं के पास है, दूध-दही की व्यवस्था गाय-भैंस माता के पास है

और बाकी जो बचा वो सब प्रकृति मां के पास है। पुरूषों के पास

छोड़ा क्या है? यहां तक कि जिसके कारण हम सांस लेकर .जिन्दा हैं

वो हवा भी माताजी ही हैं। इसलिए मैंने तो कान पकड़ लिए हैं और

क़सम खा ली है कि चाहे में ख़ुद का सम्मान न करूं, पर महिलाओं का

अवश्य करूंगा और मरते दम तक करता रहूंगा।


हालांकि इस मामले में कुछ लोग मेरे भी उस्ताद हैं। इतने उस्ताद हैं कि

दिन-रात महिलाओं के बारे में ही सोचते रहते हैं और उनका सम्मान

करने का सही मौका ढ़ूंढते रहते हैं। ये पठ्ठे इतने उत्साहीलाल हैं कि

सुबह सवेरे ही घर से निकल पड़ते हैं महिलाओं की तलाश में और

शाम होने तक लगे रहते हैं महिलाओं का सम्मान करने में। इनकी गिद्ध दृष्टि

लगातार ऐसी महिलाओं को ढूंढती रहती है जिसका मन सम्मान

करवाने को मचल रहा हो। आम तौर पर ये भले लोग अपने मिशन में

कामयाब हो जाते हैं और सम्मान प्रक्रिया पूर्ण होने पर

शरीफ़ लोगों की तरह अपने घर चले जाते हैं लेकिन जिस दिन इन्हें कोई

सम्मान कराऊ महिला नहीं मिलती उस दिन वे बेचैन हो जाते हैं

और .जबर्दस्ती सम्मान करने पर उतारू हो जाते हैं। इन्हें रोकने के लिए

तब महिलाओं को शक्ति प्रदर्शन करना पड़ता है कई बार तो पुलिस भी

बुलानी पड़ती है। लेकिन ये पठ्ठे इतने मजबूत हैं कि पुलिसिया मार

खाके भी सुधरते नहीं हैं, थाने से छूटते ही फिर किसी महिला को ढ़ूंढऩे

निकल पड़ते हैं सम्मान करने के लिए। असल में ये लोग कुंवारे होते हैं

इसलिए महिलाओं का सम्मान करने के लिए मरे जाते हैं, जो शादीशुदा

लोग हैं वे इस पचड़े में नहीं पड़ते।


शादीशुदा आदमी तो महिला के नाम से ही आतंकित हो जाता है उनका

सम्मान करना तो दूर की बात है। इसलिए हे मेरे देश के औलाद वालो,

अपनी औलाद को सम्हालो, इनकी दिनचर्या का ध्यान रखो और बेटे की

उम्र शादी लायक होते ही उसके हाथ लाल-पीले कर डालो वरना

किसी दिन वह मुंह काला करता पकड़ा जाएगा तो तुम्हारा सारा सम्मान

हवा हो जाएगा। समझ गए ना?


जय हिन्द !

- अलबेला खत्री

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