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Albela Khatri

सामने वो हैं तो शब शमशीर सी क्यूँ है

ग़मगुसारों की निगाहें तीर सी क्यूँ है

शायरी में दर्द की तासीर सी क्यूँ है


हसरतें थीं कल बिहारी सी हमारी

आज दिल की आरज़ूएं मीर सी क्यूँ है


उनके आते ही सुकूं था लौट आता

सामने वो हैं तो शब शमशीर सी क्यूँ है


ला पिलादे मयफ़िशां अन्दाज़ ही से

दिख रही मय आज मुझको शीर सी क्यूँ है


हिन्द तो 'अलबेला' कितने साल से आज़ाद है

हम पे लेकिन अब तलक ज़ंजीर सी क्यूँ है




10 comments:

vandan gupta October 27, 2009 at 5:00 PM  

waah .........ek se badhkar ek sher........lajawaab

M VERMA October 27, 2009 at 5:04 PM  

बहुत सुन्दर भाव की गज़ल
मुकम्मल

Mohammed Umar Kairanvi October 27, 2009 at 5:09 PM  

आपकी तरह मीर को ही तो सब धर्मों से प्रेम था , आखरी शे'अर तो है ही लाजवाबः 'हिन्‍दुस्‍तान तो 'अलबेला' कितने साल से आज़ाद है, हम पे लेकिन अब तलक जंजीर सी क्‍यूं है,

आमीन October 27, 2009 at 6:22 PM  

नो वोर्ड्स टू से

मनोज कुमार October 27, 2009 at 6:43 PM  

इस ग़ज़ल को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठा।

शिवम् मिश्रा October 27, 2009 at 10:20 PM  

बहुत सुन्दर

वाह-वाह

वाह-वाह

वाह-वाह

प्रिया October 27, 2009 at 10:20 PM  

हसरतें थीं कल बिहारी सी हमारी

आज दिल की आरज़ूएं मीर सी क्यूँ है
ye line to ultimate hai

राजीव तनेजा October 27, 2009 at 10:43 PM  

'हिन्‍दुस्‍तान तो 'अलबेला' कितने साल से आज़ाद है,
हम पे लेकिन अब तलक जंजीर सी क्‍यूं है,

बहुत बढिया..

Sudhir (सुधीर) October 28, 2009 at 2:21 AM  

एक बार फिर अलबेला जी आपका अंतिम शेर गहरी चोट दे गया....



हम पे लेकिन अब तलक ज़ंजीर सी क्यों हैं.....

वाह!!

Dr. kavita 'kiran' (poetess) October 28, 2009 at 1:15 PM  

sunder gazal.lekin shayri main agar dard ki taseer na ho to wo beasar hoti hai albelaji.

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