Albelakhatri.com

Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

ताज़ा टिप्पणियां

Albela Khatri

आन बान का राजस्थान ......स्वाभिमान का राजस्थान

राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में एक बार भीषण अकाल पड़ा । खाने को कुछ भी नहीं मिलने के कारण लाखों मवेशी और हज़ारों ग्रामवासी भूख से बिलबिलाते हुए मर गए । बड़ा भारी संकट था । लोगों ने सूख चुके पेड़ों की छाल खा- खा कर स्वयं को जीवित रखा । सेठ -साहूकारों के पास पैसा बहुत था , सोना -चाँदी बहुत थे, लेकिन अनाज नहीं था वे चाह कर भी गरीबों की कोई सहायता नहीं कर पा रहे थे । मैंने यहाँ तक सुना है कि लोगों के पास जब अपनी गायों , भैंसों, बकरियों, घोड़ों और ऊँटों को खिलाने के लिए कुछ भी नहीं बचा तो उन्होंने अपने पालतू जानवरों के गले में सोने और चाँदी से भरी थैलियाँ बाँध - बाँध कर उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ दिया ।

बड़ा भयानक दृश्य था । भूख से तड़पने और तड़प-तड़प कर मरने का सिलसिला घर-घरb में चल रहा था । ऐसे में अपने नन्हे से बच्चे कोh भूख से तड़पता देख एक गरीबa माँ ने बहुत प्रयास किया लेकिनv कहीं कुछ नहीं मिला तो के साहूकार की देहरी पर पहुँची जहाँ उसे साहूकार की कुछ जूठन इसलिए मिल गई क्योंकि साहूकार नेअभी-अभी भोजन कर के थाली रखी ही थी ।


मज़बूरी की मारी वह गरीब माँ अपने बेटे को वह जूठन खिलाना चाहती है, लेकिन राजस्थानी धरती का वह नन्हाबालक बहुत स्वाभिमानी है .........वह भूख से मरना मंज़ूर कर लेता है लेकिन जूठन नहीं खाता.........


प्रस्तुत है कविता________________

___________________माँ - बेटा सम्वाद _____________________-
मुण्डो ऐंठ ले म्हारा लाल
क्यूँ सतावै ?
आन्सुडा अनमोल
क्यूँ अनउता धल्कावै ?

_______________मईना रा मईना बीत्या माँ
_______________दया थने नी आवै ?
_______________भूख मरूं हूँ रोटी री
_______________तू जूठन ल्यार खवावै ?

आज तो बेटा साहू री
जूठन मान्ग्याँ मिलगी
कालै हाथ नी आवै
माँ लागूँ , जणा पेट काट' दयूं थने
किंरै बाप रो कांयीं जावै ?

_______________कूड़ी बात करै क्यूँ माँ ?
_______________क्यूँ म्हानै तर्कावै ?
_______________धान धूड म्हें निपजै है मैं जाणू हूँ
_______________क्यूँ जूठन माँग' ल्यावै ?

धान धूड म्है बनै लाल !
जद बादल मेव गिरावै
बिन पाणी बिन बीज मिनख
किंकर धान उगावै ?

_______________अत री सी बात मावडी
_______________म्हारी हमझ म्है आवै
_______________जा,साहू स्यूं लोटो' पाणी अर बीज मांगल्या
_______________थारो बेटो धान उगावै

बोलो-बालो जीमले बेटा,
देख कागलो आवै
अणूती क्यूँ करै ? जगत म्है अणूती नी होवै
क्यूँ माँ रो जीव जलावै ?

_______________तो सुणले म्हारी मायड़
_______________भूख भले मर जावै
_______________इण हाथां री आस है जिननै
_______________जूठन कदै नी खावै

कै' नानियों राम -राम इण दुनिया नै कर जावै
देख पूत री लास , तड़प' मायड़ भी मर जावै

................................................................................................
................................................................................................


6 comments:

ब्लॉ.ललित शर्मा October 12, 2009 at 10:44 AM  

भाई जी राम-राम-हगड़ो हंव्वाद हुणायो माँ बेटाँ रो धोरां री-मोरां री- वीरां री धरती रो लाल एड़ो ही होवणु चाहिजे। मर जावे पण झुठ मति खावे। वाह-वाह आज रो दिन बढिया हे।

Murari Pareek October 12, 2009 at 11:15 AM  

सही कहा अलबेला जी वो अकाल ५६ ना अकाल कहलाता है ! इतनी मार्मिक कविता के के लिए बधाई !!

दिनेशराय द्विवेदी October 12, 2009 at 4:35 PM  

बहुत मार्मिक कविता है, इस वर्ष ऐसे ही हालात होने वाले हैं राजस्थान में। इस कविता के लिए बधाई।
हाँ एक सुझाव भी है। इस कविता के कुछ मौलिक स्वर लिपि में बदल से गए हैं। कई स्थानों पर ल के स्थान पर ळ का प्रयोग किया जा सकता था।
जैसे मुण्डो को मूण्डो और जूठन को झूठण लिखा जा सकता था।

Unknown October 12, 2009 at 5:11 PM  

धन्यवाद द्विवेदी जी,
आपने सही जगह संकेत किया..........लेकिन समस्या ये है कि मैं बहुत प्रयास

करके भी इस तकनीकी असुविधा पर विजय न पा सका........ इसलिए जानते

बूझते मजबूरी में ऐसा किया गया है । कोशिश और करूंगा लेकिन अभी के

लिए क्षमा .............

राजीव तनेजा October 13, 2009 at 8:31 AM  

मार्मिक कविता

शरद कोकास October 21, 2009 at 12:34 AM  

अकाल पर बाबा नागार्जुन की कविता " कई दिनो तक चुल्हा रोया चक्की रही उदास " याद आ गई । यह कविता और पूर्वकथन दोनो ही मन को भिगो गये ।

Post a Comment

My Blog List

myfreecopyright.com registered & protected
CG Blog
www.hamarivani.com
Blog Widget by LinkWithin

Emil Subscription

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

Followers

विजेट आपके ब्लॉग पर

Blog Archive