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Albela Khatri

प्रेम के फूल खिलाऊंगा,गीत ख़ुशी के गाऊंगा

ज़िन्दगी इक इल्म है,

सुपर डुपर फ़िल्म है


देखूँगा,दिखलाऊंगा ....गीत ख़ुशी के गाऊंगा



ज़िन्दगी असहाय है,

व्यय अधिक कम आय है


फिर भी काम चलाऊंगा,गीत ख़ुशी के गाऊंगा



ज़िन्दगी इक कीर है,

सुख व दु:ख ज़ंजीर है


तोड़ इसे उड़ जाऊँगा...गीत ख़ुशी के गाऊंगा



ज़िन्दगी अभिषेक है,

मन्दिर- मस्जिद एक हैं


सब पर शीश झुकाऊंगा,गीत ख़ुशी के गाऊंगा



ज़िन्दगी शृंगार है,

दोस्ती है ..प्यार है ...


प्रेम के फूल खिलाऊंगा,गीत ख़ुशी के गाऊंगा



ज़िन्दगी अनमोल है,

मेरा जो भी रोल है


हँसते हुए निभाऊंगा , गीत ख़ुशी के गाऊंगा



ज़िन्दगी पहचान है,

सब उसकी सन्तान हैं


बात यही दोहराऊंगा , गीत ख़ुशी के गाऊंगा

6 comments:

संगीता पुरी October 14, 2009 at 9:38 AM  

वाह .. कमाल की रचना है !!

शिवम् मिश्रा October 14, 2009 at 10:51 AM  

अलबेला की एक और अलबेली रचना !

शिवम् मिश्रा October 14, 2009 at 10:51 AM  

अलबेला की एक और अलबेली रचना !

M VERMA October 14, 2009 at 4:45 PM  

जिन्दगी की परिभाषाए सुन्दर है

Mohammed Umar Kairanvi October 14, 2009 at 5:06 PM  

वाह बहुत खूब, यह वही रचना है मैं जानूं हूं जो आपके दिल से निकले है, जब ऐसी रचना निकले मैं रोमन लिखना चाहूं maien abala naara naahen Huon, पर लिख ना सकूं, अति सुन्‍दर अपनी मां को दिखाउंगा

राजीव तनेजा October 14, 2009 at 10:05 PM  

बहुत बढिया
लेकिन ज़िन्दगी अगर अभिषेक है,तो फिर ऐश्वर्या क्या है?

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