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Albela Khatri

दो ऐसा वरदान प्रभो !




परचिन्तन, परहित, परसेवा, परमार्थ के काज करूँ

पवन - गति से चलूँ सत्य पे, सदा झूठ से लाज करूँ

वैर - भाव रखूं किसी से, दो ऐसा वरदान प्रभो !

झुकूं सदा मैं सभी के आगे, सबके हृदय पे राज करूँ



9 comments:

नीरज मुसाफ़िर May 25, 2010 at 8:06 PM  

झुकूं सदा मैं सभी के आगे, सबके हृदय पे राज करूँ
झुकने की जरुरत नहीं है जी, राज तो आप कर ही रहे हैं।

Urmi May 25, 2010 at 8:10 PM  

वाह बहुत खूब कहा है आपने! हर शब्द में इतनी गहराई है और सत्य वचन है जिसे सभी को पालन करना चाहिए! इन पंक्तियों से अच्छी प्रेरणा मिली है !

पी के शर्मा May 25, 2010 at 8:10 PM  

सुधरने का इरादा कर लिया क्‍या....

दिलीप May 25, 2010 at 8:30 PM  

waah achcha socha hamare liye bhi kuch maang lijiye sirji...pata nahi mujh paapi ki sunega bhi ya nahi...

DR. ANWER JAMAL May 25, 2010 at 8:31 PM  

First Vote n Nice Post .रचनाएं अपने रचनाकार का परिचय कराती हैं ।
http://blogvani.com/blogs/blog/15882

Unknown May 25, 2010 at 8:34 PM  

ha ha

Shah Nawaz May 25, 2010 at 10:01 PM  

वह क्या बात है..... बहुत खूब!

Ra May 25, 2010 at 10:44 PM  

बहुत अच्छी रचना ....स्वच्छ मन की सुन्दर अभ्व्यक्ति ...इसे पढ़कर फिर से यकीन हुआ ,,, की सच है एक हास्यकलाकार बहुमुखी प्रतीभा का धनी होता है

संजय भास्‍कर June 3, 2010 at 4:53 AM  

इन पंक्तियों से अच्छी प्रेरणा मिली है !

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