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Albela Khatri

अब हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की




"तू सोलह बरस की, मैं सत्रह बरस का"

ऐसे गीत और गाने तो अपने बहुत सुने होंगे

परन्तु हमारा हीरो ज़रा हट के है, क्योंकि ये सत्रह का नहीं,

सत्तर साल का है जिसकी हीरोइन सोलह की नहीं, पैंसठ की है,

लेकिन आज उसके दिल में कुछ कुछ हो रहा है ......मजबूरन हीरो को

ये कहना पड़ता है :




आस
पास हूँ मैं सत्तर के, तू है पैंसठ साल की

अब हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की



सूख गई सारी सरितायें, रस का सागर सूख गया

सूख गई है गगरी तुम्हारी, मेरा गागर सूख गया

रोज़ मचलने वाला सपनों का सौदागर सूख गया

तन की राधा सूखी, मन का नटवरनागर सूख गया

ख़्वाब देखो हरियाली के..........


ख़्वाब देखो हरियाली के, ये है घड़ी अकाल की

अब हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की-


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5 comments:

डा. अरुणा कपूर. December 3, 2010 at 8:38 PM  

वाह,वाह!..बहूत मजेदार गीत की रचना की है आपने अलबेला जी!..प्रेम गीत गाने के लिए उम्र का तकाजा होना भी नहीं चाहिए!

राजीव तनेजा December 3, 2010 at 11:15 PM  

वाह!...बहुत ही मजेदार

कविता रावत December 4, 2010 at 10:15 AM  

ख़्वाब न देखो हरियाली के, ये है घड़ी अकाल की

अब हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की

अन्तर सोहिल December 4, 2010 at 10:53 AM  

जै कन्हैयालाल की
शानदार

प्रणाम

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " December 6, 2010 at 1:10 PM  

sunder vyangy kavita..
albelaji! dhanyvad.

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