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Albela Khatri

Showing posts with label कलियुगी माता मा का दूध फ़िगर. Show all posts
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फ़िगर की आग में जिगर के टुकड़े को मत जलाओ कलयुगी माता ! वर्ना बुढ़ापे में बहुत पछताओगी......





जयपुर से मुम्बई आने वाली सुपर फास्ट ट्रेन के वातानुकूलित

शयनयान में जो कुछ मैंने देखा, वह कुछ और लोगों ने भी देखा

लेकिन वे लोग शायद भूल गये हों, मैं नहीं भूला ......भूल सकता

भी नहीं क्योंकि चाहे कितना व्यावसायिक हो जाऊं आखिर दिल

तो एक इन्सान का ही है ..जो पसीजना जानता है, जो रोना भी

जानता है और जो सम्वेदना की अनुभूति तो कर ही सकता है,

अभिव्यक्ति भी कर सकता है


दोपहर दो बजे ट्रेन रवाना हुई मेरे सामने एक बहुत ही खूबसूरत

जोड़ा बैठा था जिनकी गोद में एक नन्ही सी दूधमुंही बच्ची थी

वे परस्पर पति-पत्नी थे और अच्छे खाते-पीते मारवाड़ी घर के थे

(
नाम जानता हूँ लेकिन बताऊंगा नहीं )


बच्ची बहुत प्यारी थी माँ -बाप उसे ख़ूब लाड़ कर रहे थे वह कभी

बोतल से दूध पीती, कभी हँसती, कभी किलकारियां मारती तो

कभी सो जाती इस प्रकार तीन घंटे गुज़र गये और कोटा गया

कोटा में बच्ची का पिता दूध लेने गया लेकिन नहीं ला सका क्योंकि

उसे बोतल धोने में ही इतना समय लग गया कि ट्रेन प्रस्थान कर

चुकी थी तब पेन्ट्री के वेंडरों से दूध मंगाया गया लेकिन उन्होंने

मना कर दिया ये कह के कि दूध पीने योग्य नहीं है


तभी बच्ची जाग गई और दूध के लिए रोने लगी........माँ ने बहुत

प्रयास किया लेकिन वह चुप नहीं हुई बच्ची ने ज़ोर ज़ोर से रोना

शुरू किया और पूरी बोगी में हल्ला हो गया किलकारियां मारने

वाली चीत्कारें कर रही थी......लेकिन अब तक लगातार लाड़ करने

वाली माता अचानक अब कठोर हो गई थी उसने गुस्से में वह

बच्ची अपने पति की गोद में लगभग पटक दी...............


पति - मैं क्या करूँ ? मेरे पास क्या दूध रखा है ?


पत्नी - तो ले के आओ दूध कहीं से भी............तुम्हीं को चाहिए थी

औलाद .........


पति - भागवान ! अब नखरे छोड़ और दूध पिलादे बच्ची को,

भगवान ने तुझे ख़ूब दिया है


पत्नी - एक बार कहो या सौ बार...........मैं पिलाने वाली नहीं .......


ख़ूब बडबड होती रही, बच्ची रोती रही और माँ की ममता पता नहीं

कहाँ सोती रही, नहीं पसीजा तो नहीं पसीजा उसका मन क्योंकि

वह बहुत सुन्दर थी और किसी भी कीमत पर अपने सौन्दर्य में

ढीलापन नहीं लाना चाहती थी अर्थात उसे अपने फ़िगर को

मेंटेन रखना था


बात बहुत आगे तक बढ़ी, बहुत कुछ हुआ लेकिन बच्ची को दूध

तभी मिला जब साढ़े तीन घंटे बाद नागदा आया पिता गया

और जैसा भी था ले कर आया .............



मैं सोच रहा था काश ! भगवान् ने पुरूष के स्तनों में भी थोड़ा दूध

दिया होता तो वह मासूम यों बिलखती.........


मेरा मन और मूड दोनों खराब हो गये तब मैंने गुस्से में उस

माँ से कहा - याद रखना ! जो तुम आज इसे दे रही हो, वही कल

इस से मिलेगा क्योंकि ये रूप - रंग तो चार दिन की चाँदनी है

इसके मद में रहना मूर्खता है आज फ़िगर की आग में जिगर के

टुकड़े को जलाओगी, तो बुढ़ापे में ख़ुद को वृद्धाश्रम में ही

पाओगी........ तब बहुत पछताओगी



आज ही सम्हल जाओ तो अच्छा है





















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