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Albela Khatri

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jab ek bhains bhi ilection 2014 ke liye khadi ho gayi


ye bhains bhi election 2014 ke liye abhi se khadi ho gayi hai . 

ek pressvaarta me isne bataya ki jab log gobar ganeshon ko 

vote de sakte hain to gobar ke ATM ko kyon nahin

jai hind !

23 july ko apne 50ven janmdin par main aap sabhi mitron ko hardik naman

23 july ko apne 50ven janmdin par main aap sabhi mitron ko 

hardik naman karta hun aur jane-anjane jo bhi bhool mujhse 

aapke prati ab tak hui ho, uske liye vinamra kshmaprarthi hoon. 

saath hi jin logon ne mere sath vishwasghat athva dhokhadhadi 

karke mera dil dukhaya hai, unhen unki sabhi galtiyon ke liye 

kshma karta hun JAI HIND !
50th birth day of albela khatri

ये सांप पूरे देश को डस जाएगा और तुम्हारी आचार संहिता खड़ी-खड़ी देखती रह जाएगी



'घर में नहीं दाने, पर अम्मा चली भुनाने' ये एक मुहावरा है और बड़ा प्यारा मुहावरा है। इसका रचयिता कौन था, इसका जन्म कहां और किन हालात में हुआ, इसकी मुझे न तो कोई जानकारी है तथा न ही मैं जानने को उत्सुक हूं। अपने को क्या लेना-देना यार, कोई भी हो, हमें क्या फ़र्क पड़ता है? हमें अपने ख़ुद  के दादाजी के दादाजी का नाम मालूम नहीं है तो दूसरों का इतिहास पढऩे का औचित्य ही क्या है। हां, इस मुहावरे का अर्थ अपन जानते हैं, इसलिए गाहे-ब-गाहे यूज .जरूर कर लेते हैं। आज भी करेंगे, क्योंकि चुनाव आयोग ने देश में एक आदर्श आचार संहिता लागू कर रखी है और ये संहिता उन लोगों के लिए लागू कर रखी है जिनका न तो कोई आदर्श है, न ही आचार। इसलिए ये आचार संहिता, लाचार संहिता बन चुकी है। रोज़-रोज़  इस संहिता का शीलभंग होता है, रोज़  मुकदमें दर्ज़  होते हैं, लेकिन साक्ष्य के अभाव में पीड़िता को न्याय नहीं मिल पा रहा। अब तो जैसे ''करत-करत अभ्यास  के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निसान'' वाली स्थिति हो गई है। अब तो आचार संहिता को बार-बार भंग होने की आदत सी पड़ गई है, इसलिए इसे उतनी तकलीफ़ नहीं होती जितनी कि शुरू-शुरू में होती थी। लेकिन विषय चिन्ता का है और चिन्ता करनी चाहिए इसलिए कर लेते हैं क्योंकि अपने देश की चिन्ता अपने को ही करनी है, बराक ओबामा तो इस काम के लिए आएगा नहीं।


देखा जाए तो आचार संहिता से हमें कोई ख़ास ऐतराज़ नहीं है। आप लगाओ, .जरूर लगाओ, एक्सट्रा पड़ी हो, तो दो-चार एक साथ लगाओ लेकिन पहले कहीं आचार तो दिखाओ। कहीं तो दिखाओ, किसी के पास तो दिखाओ। अरे जब आचार ही नहीं है तो संहिता को क्या शहद लगाकर चाटें? बहुत हो गया नाटक, अब ये चूहे बिल्ली का तमाशा बन्द करो । जब आप किसी अपराधी को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बता देते हैं तो वो अपनी लुगाई को मैदान में उतार देता है। आप 10 बजे लाउडस्पीकर बन्द करा देते हैं, तो टी.वी. पर विज्ञापन और भाषण शुरू हो जाते हैं जो रात भर चलते हैं। आप जनसभाओं की वीडियो शूटिंग करते हैं तो लोग उस फुटेज को डब किया हुआ तथा फ़र्जी बता देते हैं। क्या तीर मार लिया आचार संहिता ने ? सिवाय इसके कि जनता के सारे काम रुक गए। न कोई नया काम शुरू हो सकता है, न ही कोई घोषणा हो सकती है। इसलिए मैं कहता हूं ये आचार संहिता आचार संहिता नहीं, लाचार संहिता है। इसके पास कोई चारा नहीं। सारा चारा भाई लोगों के पेट में पहुंच चुका है और देश का भाईचारा अलगाव की लपेट में पहुंच चुका है।

अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं? देश को अब आचार संहिता की नहीं, विचार संहिता की .जरूरत है। क्योंकि आचार तो एक क्रिया है और क्रिया करने से होती है अपने आप नहीं होती जबकि करने में अपन कितने आलसी हैं ये तो बताने की बात ही नहीं है, दुनिया जानती है। विचार जो है वो कारण है और हर क्रिया की जननी है। इसे करना भी नहीं पड़ता क्योंकि ये स्वयंभू है। समय साक्षी है, हमारे राजनीतिकों के आचार से ज्य़ादा विचार दूषित हैं। दूषित विचार से शुद्ध आचार का सृजन हो ही नहीं सकता इसलिए आचार संहिता का अचार डालो और विचार संहिता लागू करो क्योंकि अब देश में विचार विषैले हो गए हैं और बहुत ज्य़ादा विषैले हो गए हैं।


'एक सांप ने एक नेता को डसा, नेता मज़े में पर सांप चल बसा' क्योंकि आज का स्वार्थी और सत्तालोलुप नेता सांप से भी ज्य़ादा .जहरीला हो गया है, इतना हुआ कठोर कि पथरीला हो गया है। इसका इलाज करो, जैसे भी होता हो जिस तकनीक से भी होता हो करो, वर्ना ये सांप पूरे देश को डस जाएगा और तुम्हारी आचार संहिता खड़ी-खड़ी देखती रह जाएगी।

'सादा जीवन- उच्च विचार' इस देश की व देश के महान नेताओं की परंपरा रही है। इस परंपरा को बचाने के लिए विचार पर नियंत्रण करो। अन्यथा तुम कितनी भी पाबन्दियां लगाओ, कितनी भी शूटिंग कराओ और चाहे कितने ही मुकदमें दर्ज़  कराओ, नतीजा ठन-ठन गोपाल ही आने वाला है।

'तुम मुझे ख़ून दो- मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा'  एक विचार था, 'अहिंसा परमोधर्मः' भी विचार था, 'ग़ाजिय़ों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिन्दोस्तान की' भी विचार था और 'जय जवान'-'जय किसान' के अलावा 'गरीबी हटाओ- देश बचाओ', 'तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें' इत्यादि विचारों ने हमारे राष्ट्र और जनमानस को देश प्रेम से सराबोर किया है जबकि आजकल 'तिलक-तराजू और तलवार-इनके मारो जूते चार' जैसे विषैले विचार देश में घृणा का वातावरण बनाये हुए हैं। कोई किसी को बुढिय़ा बता रहा है, कोई किसी के हाथ काटने की बात करता है, कोई उत्तर भारतीयों के पीछे लठ्ठ लेके पड़ा है और कोई मां जितनी उम्रदराज़  महिला (महिला भी ऐसी-वैसी नहीं सर्वांगशक्तिमान मुख्यमंत्री सुश्री मायावती) को सार्वजनिक रूप से पप्पी देने की बात करता है तो बड़ा खेद होता है विचारों के इस सामूहिक पतन पर।

रोको, विचारों को अश्लील, अभद्र और अमानवीय होने से रोको अगर रोक सकते हो। नहीं रोक सकते तो आचार संहिता के ढक़ोसले को ही रोक लो, भगवान तुम्हारा भला करेगा। क्योंकि इस आचार संहिता से नेता नहीं जनता परेशान है। बाकी तुम जानो और तुम्हारा सिस्टम जाने।

तुम्हारी ऐसी की तैसी

जय हिन्द !
-अलबेला खत्री
he hanuman bachalo - albela khatri

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he hanuman bachalo - albela khatri

नरेन्द्र मोदी के मुंह से कुत्ता शब्द निकल गया तो शरीफ़ लोगों की तशरीफ़ में गूमड़ उग आये



धर्मेन्द्र जब कहते हैं,  "कुत्ते मैं तेरा ख़ून पी जाऊंगा" या "बसन्ती, इन कुत्तों के 


सामने मत नाचना"  तो किसी को  कोई तकलीफ़  नहीं होती, राजीव गाँधी जब 

राम जेठमलानी को कुत्ता कहते हैं तो किसी हरामखोर को  शर्म  नहीं आती  और 

तो और  पुरखों द्वारा बनाई गई कहावतों - कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती, 

धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का, कुत्ते की मौत मरना, तेरे नाम का कुत्ता पालूं, 

कुत्ते को हड्डी डालना और  हाथी चलते रहते हैं कुत्ते भोंकते रहते हैं इत्यादि से भी 

किसी के  पिछवाड़े में  कोई काँटा नहीं चुभता  परन्तु  नरेन्द्र मोदी के मुंह से कुत्ता 

शब्द निकल गया तो  कुछ शरीफ़ लोगों की तशरीफ़ में बड़े बड़े गूमड़ उग आये ......

....है न हैरानी की बात .........


वे लोग कहते हैं - कुत्ते का नाम क्यों लिया ?  बकरी का ले लेते, बिल्ली का ले लेते . 


अरे भाई,  नरेन्द्र मोदी ने कुछ गलत नहीं कहा . जो कहा ठीक कहा . ये और कोई 

जाने या न जाने, मैं भली भान्ति जानता हूँ . और अगली पोस्ट में बताऊंगा भी 

लेकिन पहले मैं आप सब मित्रों की राय जानना चाहता  हूँ  कि  मोदी जी ने  बिल्ली 

और बकरी का नाम न  लेकर कुत्ते का नाम ही क्यों लिया .  आइये, फटाफट बताइए .....


-अलबेला खत्री 



संकट में आज है हमारी गौ माँ ........................

गोवर्धन धारी की दुलारी गौ माँ
साधुसन्तों मुनियों की प्यारी गौ माँ
ममता की मृदु फुलवारी गौ माँ
पर्यावरण की रखवारी गौ माँ
मानव पे सदा उपकारी गौ माँ
कदम-कदम सुखकारी गौ माँ
हाय ! फिर भी है दु:खियारी गौ माँ
संकट में आज है हमारी गौ माँ


गौ माता का दूध अमृत समान है
गोबर और मूत्र भी गुणों की खान है
रक्तचाप, मधुमेह, ज्वर, अस्थमा
कैन्सर जैसे रोग का ये करे खात्मा
गौ मूत्र से बड़ा एन्टी बायटिक नहीं है
गौ से ज़्यादा कोई स्वास्थ्यदायक नहीं है
हृदय रोग में भी गुणकारी गौ माँ
संकट में आज है हमारी गौ माँ


न केवल गौ-रक्षा का नारा दीजिये
न केवल मुंह से ही जैकारा कीजिये
दूध जिसका पीया उसे चारा दीजिये
बेसहारा प्राणी को सहारा दीजिये
अहिंसा का बुलन्द सितारा कीजिये
गौ हत्या करने वालों को कारा दीजिये
देखो कैसे रो रही बेचारी गौ माँ
संकट में आज है हमारी गौ माँ


कातर निगाहें हमें देख रही हैं
आँसू भरी आँखें हमें देख रही हैं
चीखें और आहें हमें देख रही हैं
फैली हुई बाँहें हमें देख रही हैं
हम चारा-पानी का प्रबन्ध करेंगे
बूचड़खानों में गौ वध बन्द करेंगे
हमें ही बचानी है हमारी गौ माँ
संकट में आज है हमारी गौ माँ

जय हिन्द 
अलबेला खत्री 




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