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Albela Khatri

अपनी चोरविद्या में संत तरुण सागर जी को क्यों शामिल करते हो भाई पाठक जी ?



मेरी एक साधारण सी कविता जो कि संयोग से बहुत प्रसिद्ध हो गयी है आजकल कई लोग उसे अपने काम में ले रहे हैं . कितने ही पोस्टर में वह छप चुकी है और गाहे ब गाहे कुछ लोग मंच पर भी सुना देते हैं  लेकिन  हद तो तब हो जाती है जब मेरी कविता को संत पुरुषों के सन्देश में ढाल कर उन्हीं की कविता बता दिया जाता है

ऐसा ही एक उदाहरण आप देख रहे हैं कि भास्कर अख़बार में किसी पाठक ने तरुण सागर जी कद नाम से छपवा रखी है ...सुना तो मैंने यहाँ तक है कि यह कविता तरुण सागर जी के कड़वे वचन नामक पुस्तक में भी प्रकाशित हो चुकी है

अब क्या करूँ ?  धन्यवाद दूं  इस चोरी के लिए  या विरोध करूँ ?

जय हिन्द ! 






6 comments:

Shah Nawaz October 17, 2013 at 5:57 PM  

बिलकुल विरोध दर्ज कराना चाहिए!

प्रवीण पाण्डेय October 17, 2013 at 6:56 PM  

आप उन्हें सूचित अवश्य करें।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक October 17, 2013 at 7:51 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (18-10-2013) "मैं तो यूँ ही बुनता हूँ (चर्चा मंचःअंक-1402) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

संगीता पुरी October 17, 2013 at 11:31 PM  

होना तो विरोध ही चाहिए ...

"Aks" October 18, 2013 at 8:41 PM  

कहाँ कहाँ पकड़ेंगे यहाँ छिछोरो की नगरी है कुछ तो ध्यान में आ जाते है और न जाने कितनी बिना ध्यान की अब भी पड़ी होंगी ....

Amrita Tanmay October 24, 2013 at 11:21 AM  

had hai is chori ki..

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