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Sunday, March 24, 2013
प्यारे साथियो, भावभीना नमस्कार .
बीती रात कलोल में इफ्को परिसर में
एक शानदार हास्य कवि-सम्मेलन
संपन्न हुआ . कवियों की संख्या भले ही कुल
चार थी, परन्तु ठहाकों और
तालियों की गूंज चार घंटे तक समूचे अंचल में
गूंजती रही . इफ्को के
नवरात्रि महोत्सव के समापन अवसर पर, शहीदी दिवस के
उपलक्ष्य में
होली के रंगों को समर्पित इस रंगारंग काव्य-समारोह का रसीला
सञ्चालन
हास्यकवि अलबेला खत्री ने किया और एक एक करके अपने तीन साथी
कवियों
को प्रस्तुत किया . इफ्को की कलोल यूनिट के मुखिया श्री शमशेर सिंह
समेत
अनेक वरिष्ठ महाप्रबंधक चार घंटे तक मंत्र मुग्ध हो कर काव्य का आनंद
लेते रहे .
जय हिन्द !
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Thursday, July 15, 2010
बम्बई, बम्बई थी भाई और मुम्बई, मुम्बई है भाई !
27 साल पहले की वो बम्बई जो मैंने पहली बार देखी थी और 20
तक मेरी कर्म-भूमि रही, वो बम्बई और आज की मुम्बई में जो
भयानक अन्तर आया है उसका विकराल सौन्दर्य कल ही मैंने देखा
और इस बात पर भरोसा हो गया कि अब मुम्बई को शंघाई बनने से
कोई नहीं रोक सकता । किसी का बाप भी नहीं रोक सकता ।
कल सुबह - सुबह जब मैं बोरीवली स्टेशन पर उतरा और ऑटो रिक्शा
पकड़ने बाहर सड़क पर आया तो अचानक मांसपेशियों में खिंचाव होने
से बड़ी पीड़ा होने लगी । जल्दी से मैंने वहां पड़े ईंटों के एक चट्टे पर
अपना बैग रखा और जेब से डिस्प्रिन गोली निकाल कर, पानी की
बोतल में डाल दी ताकि उसके घुलते ही पी सकूँ । गोली का चमकीला
कागज़ मैंने फैंक दिया सड़क पर, बस यहीं से मुम्बई शंघाई बनना
शुरू हो गया ।
एक लड़का आया जिसकी कमीज़ पर इंग्लिश में क्लीन-अप लिखा था,
बोला- निकालो दो सौ रुपया...........मैंने पूछा किस बात का ? बोला-
सड़क पर कचरा फैंकने का । मैंने पूछा - कौनसा कचरा ? उस भले
आदमी ने मेरा फैंका हुआ डिस्प्रिन का कागज़ दिखाया । बोला- ये !
और रसीद काट कर मेरे हाथों में थमादी.........जो कि मुम्बई महानगर
पालिका के स्वास्थ्य विभाग की है ।
मैंने कहा - भैया मैं तो बाहर से आया हूँ, दर्द हो रहा था, इसलिए गोली
खा ली, अब कागज़ कहाँ फैंकूं ? तुम बताओ..........वो बोला - ये काम
मेरा नहीं, मेरा काम सिर्फ़ पैसा लेना है क्योंकि मुम्बई को शंघाई बनाना
है और उसमे दो सौ रूपये कम पड़ रहे हैं इसलिए निकालो........जल्दी
जल्दी । मैंने उसे दो सौ रूपये दिए और ख़ुद को शाबासी दी कि चलो
आज अपन किसी काम तो आये अब जब मुम्बई को शंघाई बनाए जाने
का इतिहास लिखा जायेगा तो मेरा भी नाम याद रखा जाएगा ।
भैया, खाना लग चुका है और गुड्डू की माँ छाती पर आ कर खड़ी हो गई
है इसलिए बाकी की बातें अगली पोस्ट में.......लेकिन वो बड़ी रोचक
बातें हैं पढ़ने ज़रूर आना
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