हर पथिक पवन बन जाता है
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जो करता है निगहबानी, यहाँ दिन और रात अपनी
उसी रब को अखरने में गुज़ारी है हयात अपनी
सजाई है यहाँ जिसने ये सारी क़ायनात अपनी
गये - गुज़रे हैं हम कितने, उसी को भूल बैठे हैं
जो करता है निगहबानी, यहाँ दिन और रात अपनी
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हज़ारों हाथ से करता है रखवाली वो पग - पग पर
बिलावजह चटकना क्यों, है हासिल क्या बिखरने में
मस्सर्रत ज़िन्दगानी की चमकने में - निखरने में
हज़ारों हाथ से करता है रखवाली वो पग - पग पर
मगर हम हैं लगे हर दम, उसी रब को अखरने में
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मिटाया था कभी जिसने, उसी ने फिर बनाया है
वो तन में भी समाया है, वो मन में भी समाया है
जिधर देखूं उधर जलवा, उसी का ही नुमाया है
मेरा मुझमे नहीं कुछ भी, जो कुछ भी है उसी का है
मिटाया था कभी जिसने, उसी ने फिर बनाया है
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