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Albela Khatri

जो करता है निगहबानी, यहाँ दिन और रात अपनी




उसी रब को अखरने में गुज़ारी है हयात अपनी

सजाई है यहाँ जिसने ये सारी क़ायनात अपनी

गये - गुज़रे हैं हम कितने, उसी को भूल बैठे हैं

जो करता है निगहबानी, यहाँ दिन और रात अपनी


3 comments:

एस.एम.मासूम May 26, 2011 at 1:32 AM  

बड़े मूड मैं लग रहे हैं खत्री जी.

राज भाटिय़ा May 26, 2011 at 11:52 PM  

वाह वाह जी.बहुत खुब

Babli May 31, 2011 at 1:50 PM  

वाह ! क्या बात है! बहुत खूब!

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