बहुत इन्तज़ार किया तूने भारत माता !
बड़ा ज़ुल्म सहा,
बड़ी वेदना और पीड़ा से गुज़री
परन्तु अब तेरे करण -अर्जुन आ गये हैं माँ.........
कह दो अब राणा से
कि ठाकुर तो गियो ! गियो !! गियो !!!
-अलबेला खत्री
भारत माता तेरे करण - अर्जुन आ गये हैं अब ठाकुर तो गियो...गियो.....गियो....
Labels: अन्ना , अलबेला खत्री , दिग्गीराजा , बाबा , मनमोहन , हास्यकवि
बाबा रामदेव के नाम हास्यकवि अलबेला खत्री का पैग़ाम - दूसरा व अन्तिम भाग
गतांक से आगे.......
जिस देश में करोड़ों लोग दो जून की रोटियों के लिए भागते फिरते हैं, उस देश
में हज़ारों लोग चार जून की लाठियों से बचने के लिए भागते फिर रहे थे और
ये हो रहा था बुद्ध, महावीर, नानक और गांधी के देश की राजधानी में....इससे
ज़्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है । इस अत्याचार की जितनी निंदा की जाये,
कम है ।
परन्तु हे योगाचार्य बाबा रामदेव !
आप तो सत्याग्रही थे........अनशनकर्ता थे.......आपको तो योद्धा की तरह उस
पुलिसिया कार्रवाही का सामना करना चाहिए था । गिरफ़्तार होना कोई
मुश्किल नहीं था आपके लिए ...यदि आप भागते नहीं और शान्तिपूर्ण तरीके से
अपने आपको पुलिस के हवाले कर देते तो ज़्यादा अच्छा होता क्योंकि तब
आपके समर्थक भी गिरफ्तारियां देते और देश भर के लोगों का प्रचूर समर्थन
आपको मिल जाता जिसके दम पर आपकी विजय का मार्ग निर्बाध हो जाता ।
जबकि आपकी बुज़दिली ने लोगों को आप पर ऊँगली उठाने का मौका घर
बैठे ही दे दिया ।
बुरा नहीं मानना बाबाजी.........एक बात तो तय है कि आप पेट को चाहे कितना
ही हिलालो...और लोगों से कपालभाती की कितनी ही फूं फां करालो पर आपके
पास कोई आध्यात्मिक शक्ति तो नहीं है । योग में...ख़ासकर ध्यानयोग में
कितनी अलौकिक शक्ति है ये तो मैं मेरे वैयक्तिक अनुभव से जानता हूँ । इसलिए
मुझे दुःख है कि आपने पराशक्ति के इत्ते बड़े सोपान पर यात्रा करके भी कुछ
नहीं हासिल किया । भले ही पतंजली पीठ के रूप में आपने कितना ही बड़ा
साम्राज्य स्थापित कर लिया हो....लेकिन सिर्फ़ नाशवान सामान ही इकट्ठा
किया है आपने अब तक। शाश्वत कुछ नहीं पाया...........पर मुझे इससे क्या
लेना देना ? मैं तो सिर्फ़ इसलिए हैरान हूँ कि जिस ओम की शक्ति से ब्रह्माण्ड
के सब द्वार शतदल की भान्ति खुल जाते हैं उस ओम का रातदिन रट्टा लगाने
और लगवाने वाला एक व्यक्ति अपने बाल-वाल खोल कर , दाढ़ी-वाढी बिखेर
कर भरी सभा में देवव्रत की तरह पहले तो भीष्म प्रतिज्ञा करता है फिर
परिस्थितिवश शिखंडी जैसा व्यवहार भी कर लेता है । ये दोनों बातें एक साथ
कैसे हो सकती हैं ? खैर...जान बड़ी चीज़ है ...भगवान आपको सौ बरस
ज़िन्दा रखे और इसी तरह कामयाब रखे।
मेरा कहना केवल इत्ता है गुरू ! कि आप एक प्रतिभावान योगी, सॉरी .....योग
प्रशिक्षक हैं और आपकी दूकान ठीकठाक जमी हुई भी है तो बजाय इस तरह
के सत्याग्रहों के कुछ और सकारात्मक काम करो । क्योंकि आज देश के
सामने एक नहीं अनेक संकट पहले से ही मौजूद हैं । विदेश में रखा काला धन
देश में आना चाहिए..ज़रूर आना चाहिए लेकिन वह रातोरात नहीं आ सकता
इस बात को आप भी जानते हैं । लिहाज़ा अन्य जो बड़े संकट देश में हैं ज़रा
उनके निराकरण का भी उपाय कीजिये ताकि लोगों का जीवन थोड़ा सरल
हो सके ।
# पानी पंद्रह रूपये लीटर बिक रहा है
क्या आपको ये नहीं दिख रहा है ?
# व्यापारी लोग हत्यारे हो गये हैं
नकली दूध, सब्ज़ी,अनाज और दवाओं के रूप में ज़हर बेच रहे हैं
और आप अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए
केवल कांग्रेसी द्रोपदी मनमोहनी की फटी हुई साड़ी खेंच रहे हैं
# मंहगाई और बेरोज़गारी का दानव देश को खा रहा है
ऐसे में आपको लोगों की पीड़ा का ख्याल नहीं आ रहा है ?
# दुश्मन मुल्क घात लगाए बैठा है
सरहद पर घुसपैठ जारी है
ऐसे में सरकार और सुरक्षा दलों का ध्यान बटाना आपकी कौन सी लाचारी है ?
मेरे आदरणीय बाबा !
अगर सत्याग्रह ही करना है
तो पहले देश की समस्याओं को मिटाने के लिए करो !
ये हो जाये तो फिर आराम से
विदेश में रखा काला धन वापस देश में लाने के लिए करो !
जय हिन्द !
जय भारत !
जय हिन्दुस्तान !
-अलबेला खत्री
Labels: अन्ना , रामदेव , सामयिक आलेख , हास्य कवि अलबेला खत्री
सुअर कोई गन्दगी पर जो जा बैठा तो हंगामा.........
पत्रकार ने पूछा
शरद पवार जी ! आपके चेले कलमाड़ी ने राष्ट्र मण्डल खेलों में घपले करके
बहुत सा पैसा खाया ...आपकी क्या प्रतिक्रिया है इस पर ?
शरद पवार बोले
असल में खाना तो मैं चाहता था, मगर मज़बूरी ये है कि अब मेरा मुँह
कुछ खाने लायक नहीं रहा
पत्रकार बोला
मुँह को छोड़िये, मुँह तो खाने क्या, किसी को दिखाने लायक भी नहीं रहा
शरद पवार उवाच
इसीलिए मैंने कलमाड़ी को आँख मार कर कह दिया कि बेटा ..तू खाले
और हमारे लिए रख ले...........कलमाड़ी पर मैं भरोसा इसलिए करता हूँ
क्योंकि ये होशियार आदमी है करता ज़्यादा है बोलता कम है, खाता
ज़्यादा है, ढोलता कम है । अब ये अन्ना फन्ना लगे हैं ढोल बजाने.......
बजाते रहें....मैंने तो एक कविता लिखी है । कहो तो सुनाऊं ?
पत्रकार -
कविता और आप ?
शरद पवार -
अब कवि के सपनों में आया हूँ तो कविता तो करनी ही पड़ेगी न !
सुनो-
सुअर कोई गन्दगी पर जो जा बैठा तो हंगामा
कोई कुत्ता जो इक हड्डी चबा बैठा तो हंगामा
किये हैं और भी लोगों ने जम कर ख़ूब घोटाले
मगर कलमाड़ी थोड़ा धन कमा बैठा तो हंगामा

Labels: अन्ना , अलबेला खत्री , कलमाड़ी , घोटाला , भ्रष्टाचार , हास्य कविता





