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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

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मौत से कह दूंगा, रुक जा दो घड़ी, आने वाला है ज़माना प्यार का



सांस  में सुर सनसनाना प्यार का

ज़िन्दगी है  ताना बाना  प्यार का


मौत से कह दूंगा, रुक जा दो घड़ी

आने वाला है  ज़माना  प्यार का


यों तो हर मौसम का अपना रंग है

पर लगे मौसम सुहाना प्यार का


उफ़ जवानी का ये आलम जानेमन

और उस पर उमड़ आना  प्यार का


चीज  है अनमोल, पर बाज़ार में

नहीं मिलेगा चार आना प्यार का


बैठे ठाले यों ही कुछ कुछ लिख दिया

ख़ुद-ब-ख़ुद बन बैठा गाना प्यार का 


है मुकद्दरमन्द जिसको मिल गया

ज़िन्दगी में गुनगुनाना प्यार का


उस घड़ी मत रोकना "अलबेला" को

जब लबों पर हो तराना प्यार का


जय हिन्द !
gayika  Sadhna Sargam, Sangeetkar Arnab aur geetkar Albela Khatri

न तो पेट भर पाता है सदा के लिए, न ही पेट के नीचे की आग बुझा पाता है

देह की गंध

एक सी नहीं रहती


बदलती रहती है रंग


बदलते समय के संग



शैशव की गंध श्वेत होती है


किशोरवय में गुलाबी और यौवन में सुर्ख़ होती है


जो


अधेड़ावस्था में जोगिया होती हुई


बुढ़ापे में पीली हो जाती है


और


मौत पर काली हो जाती है



काली पड़ चुकी गंध में कोई और रंग चढ़ नहीं सकता


इसीलिए तो मानव  का वय-रथ आगे बढ़ नहीं सकता



योनिद्वार से निकल कर


हरिद्वार तक की यात्रा करने वाला मनुष्य


पेट के नीचे से  जन्म लेता है


और


जीवन भर पेट व  पेट के नीचे की क्षुधा


भरने का प्रयास करता है


मगर अफ़सोस !


न तो पेट भर पाता है सदा के  लिए


न ही पेट के नीचे की आग बुझा पाता है



घर्षण से लेकर स्खलन तक


अर्थात 


सम्भोग से ले  समाधि तक


तमाम रंग उभरते हैं उभारों की तरह


और


जलाते हैं मनुष्य को अंगारों की तरह



देह जब तक  जीवित रहती, वासना में जलती है


इक  धधकती आग हरदम तहे-दिल में पलती है


ये गाड़ी ज़ीस्त की ऐसे चलती है, ऐसे ही चलती है


-अलबेला खत्री





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