jab ek bhains bhi ilection 2014 ke liye khadi ho gayi
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agrawal samaj ke prernasrot shri chandrabhan khordia nahin rahe
AAJ KI KHUSHI ME DUKH BHI SHAMIL HAI DOSTO !
kudrat bhi kya kya rang dikhati hai ......maine sapne me bhi kalpna
nahin ki thi ki jinke charan chhokar aaj aashirwaad lena tha .......
unkee ki shoksabha me jana padega .....
na keval surat balki asam se le kar rajasthan tak sammanit aur suvikhyat
samajsevi baboo shri CHANDRABHAN KHORDIA jo ki mere param
mitra MUKESH KHORDIA ke poojya dadaji aur samast khordia parivar
ke sath sath agrawal samaj ke prernasrot the ka asaamyik nidhan ho
jane se mujhe bahut dukh pahuncha hai kyonki mera bhi unse bada prem
aur lagaav tha . surat me HAMARA GUJARAT ke prastutikaran me unka
bada yogdaan raha ......parmatma divangat aatma ko apne shri charnon
me sthan pradan kare aur khordia parivar ko yah vajrapat sahne ki kshmata
pradaan kare . isee vinamra vinamra bhaavanjali ke sath maine aaj ka mera
sara program radd kar diya hai aur bairth day party nahin manaunga .
om shanti shanti shanti
- albela khatri
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shri chandrabhan khordia & shri mukesh khordia |
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23 july ko apne 50ven janmdin par main aap sabhi mitron ko hardik naman
hardik naman karta hun aur jane-anjane jo bhi bhool mujhse
aapke prati ab tak hui ho, uske liye vinamra kshmaprarthi hoon.
saath hi jin logon ne mere sath vishwasghat athva dhokhadhadi
karke mera dil dukhaya hai, unhen unki sabhi galtiyon ke liye
kshma karta hun JAI HIND !
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50th birth day of albela khatri |
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ये सांप पूरे देश को डस जाएगा और तुम्हारी आचार संहिता खड़ी-खड़ी देखती रह जाएगी
'घर में नहीं दाने, पर अम्मा चली भुनाने' ये एक मुहावरा है और बड़ा प्यारा मुहावरा है। इसका रचयिता कौन था, इसका जन्म कहां और किन हालात में हुआ, इसकी मुझे न तो कोई जानकारी है तथा न ही मैं जानने को उत्सुक हूं। अपने को क्या लेना-देना यार, कोई भी हो, हमें क्या फ़र्क पड़ता है? हमें अपने ख़ुद के दादाजी के दादाजी का नाम मालूम नहीं है तो दूसरों का इतिहास पढऩे का औचित्य ही क्या है। हां, इस मुहावरे का अर्थ अपन जानते हैं, इसलिए गाहे-ब-गाहे यूज .जरूर कर लेते हैं। आज भी करेंगे, क्योंकि चुनाव आयोग ने देश में एक आदर्श आचार संहिता लागू कर रखी है और ये संहिता उन लोगों के लिए लागू कर रखी है जिनका न तो कोई आदर्श है, न ही आचार। इसलिए ये आचार संहिता, लाचार संहिता बन चुकी है। रोज़-रोज़ इस संहिता का शीलभंग होता है, रोज़ मुकदमें दर्ज़ होते हैं, लेकिन साक्ष्य के अभाव में पीड़िता को न्याय नहीं मिल पा रहा। अब तो जैसे ''करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निसान'' वाली स्थिति हो गई है। अब तो आचार संहिता को बार-बार भंग होने की आदत सी पड़ गई है, इसलिए इसे उतनी तकलीफ़ नहीं होती जितनी कि शुरू-शुरू में होती थी। लेकिन विषय चिन्ता का है और चिन्ता करनी चाहिए इसलिए कर लेते हैं क्योंकि अपने देश की चिन्ता अपने को ही करनी है, बराक ओबामा तो इस काम के लिए आएगा नहीं।
देखा जाए तो आचार संहिता से हमें कोई ख़ास ऐतराज़ नहीं है। आप लगाओ, .जरूर लगाओ, एक्सट्रा पड़ी हो, तो दो-चार एक साथ लगाओ लेकिन पहले कहीं आचार तो दिखाओ। कहीं तो दिखाओ, किसी के पास तो दिखाओ। अरे जब आचार ही नहीं है तो संहिता को क्या शहद लगाकर चाटें? बहुत हो गया नाटक, अब ये चूहे बिल्ली का तमाशा बन्द करो । जब आप किसी अपराधी को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बता देते हैं तो वो अपनी लुगाई को मैदान में उतार देता है। आप 10 बजे लाउडस्पीकर बन्द करा देते हैं, तो टी.वी. पर विज्ञापन और भाषण शुरू हो जाते हैं जो रात भर चलते हैं। आप जनसभाओं की वीडियो शूटिंग करते हैं तो लोग उस फुटेज को डब किया हुआ तथा फ़र्जी बता देते हैं। क्या तीर मार लिया आचार संहिता ने ? सिवाय इसके कि जनता के सारे काम रुक गए। न कोई नया काम शुरू हो सकता है, न ही कोई घोषणा हो सकती है। इसलिए मैं कहता हूं ये आचार संहिता आचार संहिता नहीं, लाचार संहिता है। इसके पास कोई चारा नहीं। सारा चारा भाई लोगों के पेट में पहुंच चुका है और देश का भाईचारा अलगाव की लपेट में पहुंच चुका है।
अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं? देश को अब आचार संहिता की नहीं, विचार संहिता की .जरूरत है। क्योंकि आचार तो एक क्रिया है और क्रिया करने से होती है अपने आप नहीं होती जबकि करने में अपन कितने आलसी हैं ये तो बताने की बात ही नहीं है, दुनिया जानती है। विचार जो है वो कारण है और हर क्रिया की जननी है। इसे करना भी नहीं पड़ता क्योंकि ये स्वयंभू है। समय साक्षी है, हमारे राजनीतिकों के आचार से ज्य़ादा विचार दूषित हैं। दूषित विचार से शुद्ध आचार का सृजन हो ही नहीं सकता इसलिए आचार संहिता का अचार डालो और विचार संहिता लागू करो क्योंकि अब देश में विचार विषैले हो गए हैं और बहुत ज्य़ादा विषैले हो गए हैं।
'एक सांप ने एक नेता को डसा, नेता मज़े में पर सांप चल बसा' क्योंकि आज का स्वार्थी और सत्तालोलुप नेता सांप से भी ज्य़ादा .जहरीला हो गया है, इतना हुआ कठोर कि पथरीला हो गया है। इसका इलाज करो, जैसे भी होता हो जिस तकनीक से भी होता हो करो, वर्ना ये सांप पूरे देश को डस जाएगा और तुम्हारी आचार संहिता खड़ी-खड़ी देखती रह जाएगी।
'सादा जीवन- उच्च विचार' इस देश की व देश के महान नेताओं की परंपरा रही है। इस परंपरा को बचाने के लिए विचार पर नियंत्रण करो। अन्यथा तुम कितनी भी पाबन्दियां लगाओ, कितनी भी शूटिंग कराओ और चाहे कितने ही मुकदमें दर्ज़ कराओ, नतीजा ठन-ठन गोपाल ही आने वाला है।
'तुम मुझे ख़ून दो- मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा' एक विचार था, 'अहिंसा परमोधर्मः' भी विचार था, 'ग़ाजिय़ों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिन्दोस्तान की' भी विचार था और 'जय जवान'-'जय किसान' के अलावा 'गरीबी हटाओ- देश बचाओ', 'तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें' इत्यादि विचारों ने हमारे राष्ट्र और जनमानस को देश प्रेम से सराबोर किया है जबकि आजकल 'तिलक-तराजू और तलवार-इनके मारो जूते चार' जैसे विषैले विचार देश में घृणा का वातावरण बनाये हुए हैं। कोई किसी को बुढिय़ा बता रहा है, कोई किसी के हाथ काटने की बात करता है, कोई उत्तर भारतीयों के पीछे लठ्ठ लेके पड़ा है और कोई मां जितनी उम्रदराज़ महिला (महिला भी ऐसी-वैसी नहीं सर्वांगशक्तिमान मुख्यमंत्री सुश्री मायावती) को सार्वजनिक रूप से पप्पी देने की बात करता है तो बड़ा खेद होता है विचारों के इस सामूहिक पतन पर।
रोको, विचारों को अश्लील, अभद्र और अमानवीय होने से रोको अगर रोक सकते हो। नहीं रोक सकते तो आचार संहिता के ढक़ोसले को ही रोक लो, भगवान तुम्हारा भला करेगा। क्योंकि इस आचार संहिता से नेता नहीं जनता परेशान है। बाकी तुम जानो और तुम्हारा सिस्टम जाने।
तुम्हारी ऐसी की तैसी
जय हिन्द !
-अलबेला खत्री
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he hanuman bachalo - albela khatri |
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he hanuman bachalo - albela khatri |
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he hanuman bachalo - albela khatri |
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नरेन्द्र मोदी के मुंह से कुत्ता शब्द निकल गया तो शरीफ़ लोगों की तशरीफ़ में गूमड़ उग आये
धर्मेन्द्र जब कहते हैं, "कुत्ते मैं तेरा ख़ून पी जाऊंगा" या "बसन्ती, इन कुत्तों के
सामने मत नाचना" तो किसी को कोई तकलीफ़ नहीं होती, राजीव गाँधी जब
राम जेठमलानी को कुत्ता कहते हैं तो किसी हरामखोर को शर्म नहीं आती और
तो और पुरखों द्वारा बनाई गई कहावतों - कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती,
धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का, कुत्ते की मौत मरना, तेरे नाम का कुत्ता पालूं,
कुत्ते को हड्डी डालना और हाथी चलते रहते हैं कुत्ते भोंकते रहते हैं इत्यादि से भी
किसी के पिछवाड़े में कोई काँटा नहीं चुभता परन्तु नरेन्द्र मोदी के मुंह से कुत्ता
शब्द निकल गया तो कुछ शरीफ़ लोगों की तशरीफ़ में बड़े बड़े गूमड़ उग आये ......
....है न हैरानी की बात .........
वे लोग कहते हैं - कुत्ते का नाम क्यों लिया ? बकरी का ले लेते, बिल्ली का ले लेते .
अरे भाई, नरेन्द्र मोदी ने कुछ गलत नहीं कहा . जो कहा ठीक कहा . ये और कोई
जाने या न जाने, मैं भली भान्ति जानता हूँ . और अगली पोस्ट में बताऊंगा भी
लेकिन पहले मैं आप सब मित्रों की राय जानना चाहता हूँ कि मोदी जी ने बिल्ली
और बकरी का नाम न लेकर कुत्ते का नाम ही क्यों लिया . आइये, फटाफट बताइए .....
-अलबेला खत्री
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खुजली है भाई खुजली है
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पत्ते - पत्ते में भरा है रंग तेरे प्यार का, तेरे मुस्कुराने से है मौसम बहार का
प्रकृति में मानव की माता का आभास है
प्रकृति में प्रभु के सृजन की सुवास है
नदी-नहरों में इसी दूध के फौव्वारे हैं
झांझर सी बजती है पवन के पाँव में
हम सारे मानव तेरी आँखों के तारे माँ
सभी के सरों पे तेरा एक जैसा हाथ रे
पीपल बबूल नीम आम देवदार में
तेरे मुस्कुराने से है मौसम बहार का
सागरों की लहरों में तेरी हलचल है
कलियों का खिलखिलाना तेरा ही इशारा है
हुआ है न होगा कभी, तोहरा जवाब माँ
तेरी गोद में खेले हैं सारे अवतार रे
हीरों- पन्नों का दिया है तूने वरदान माँ
कैसे हम चुकाएंगे तेरे एहसान माँ
दशों ही दिशाओं में फैली है हरियाली रे
मैया तेरी काया की ही पावन सुगन्ध है
नानक पे बुद्ध पे दया पे महावीर पे
सभी ने पाया है तेरे आँचल का प्यार माँ
भोर में हवाएं तेरा आँगन बुहारती
जगत जननी तू महान है महान है
हरे भरे जंगलों को सहरा बनाते हैं
तूने नहीं किया किसी चोट का विरोध माँ
लगे न नज़र तुझे किसी दुश्मन की
यूँ ही हँसती गाती रहे सारी कायनात माँ
हिमालय की चोटियों में तू ही खिलखिलाती है
तुझ जैसा जग में न दानी कोई दूजा रे
मैया तेरे चरणों की करें हम पूजा रे
सभी को सुनाई देती माता तेरी लोरियां
तुझे देखने से माता वो भी याद आता है
तुझ से बिछुड़ के मानव कहाँ जायेंगे
तेरे बिना मानव को कहाँ कोई ठौर माँ
पद्य सूरदास के व तुलसी की चौपाइयां
तूने जगमगाया माता साहित्य का पन्थ है
मानव की मिट्टी में मिलाओ अब प्यार माँ
जल रहा है नफ़रतों में आज संसार माँ
-अलबेला खत्री
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इसीलिए हे पवनपुत्र ! मैं तेरी शरण में आया
क्या मुस्लिम,क्या सिक्ख, इसाई, क्या वैष्णव,क्या जैन
सब के सब हैरान यहाँ पर, सब के सब बेचैन
खादी वाले जनता का धन लूट रहे दिन-रैन
हाय ! लुटेरों के शासन में, भीगे सब के नैन
क्या होगा कल हाल देश का, सोच सोच घबराया
इसीलिए हे पवनपुत्र ! मैं तेरी शरण में आया
प्यारे अन्जनी के लाल !
हमें संकट से निकाल !
धर्म के ठेकेदार हमें टुकड़ों में बाँट रहे हैं
छंटे छंटाये लोग आज लोगों को छाँट रहे हैं
करुणा की काया को दीमक बन के चाट रहे हैं
मानवता के कल्पवृक्ष को जड़ से काट रहे हैं
खुदगर्ज़ी में इन्सां ने इन्सां का ख़ून बहाया
इसीलिए हे पवनपुत्र ! मैं तेरी शरण में आया
प्यारे अन्जनी के लाल !
हमें संकट से निकाल !
लालच में असली डॉक्टर भी नकली दवा चलाते
हलवाई नकली मावा से नकली माल बनाते
व्यापारी भी नकली मिर्च-मसाले हमें खिलाते
दूध-दही, फल-फ्रूट, साग-सब्ज़ी भी नकली आते
गद्दारों ने बैंकों तक में नकली नोट चलाया
इसीलिए हे पवनपुत्र ! मैं तेरी शरण में आया
प्यारे अन्जनी के लाल !
हमें संकट से निकाल !
जय हिन्द
-अलबेला खत्री
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urgently wanted actor / actress for albelakhatri's TUMHARI YAAD AATI HAI
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क्या अदा, क्या जलवे तेरे रचना ! तू तो नहीं मिली पर मेरा काम तो हो गया
गुमशुदा रचना की तलाश में अपने मुख्य ब्लॉग पर कल एक पोस्ट मैंने
किसलिए लगाईं थी, यह तो मैं ख़ुद नहीं जानता, लेकिन परिणाम बड़ा अच्छा
आया, ये मैं जानता हूँ . जिस ब्लॉग पर रक्तदान जैसे संवेदनात्मक विषय पर
पाठकों की संख्या केवल तीन अंकों में थी, मेरी रचना का जादू ऐसा चला
कि पाठक संख्या सीधे चार अंकों में पहुँच गयी .
पहले मैं समझता था कि लोग ज़्यादातर केवल जापानी तेल, सेक्स, सविता
भाभी, जवानी और छाती से छाती मिली जैसी शब्दावलियाँ ही बांचते हैं . लेकिन
आज मुझे एहसास होगया कि यहाँ मेरी रचना भी काफी हॉट है . लिहाज़ा
मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं भी अब अपने ब्लॉग पर फिर से लिखना शुरू करूँगा
.....और अन्य ब्लोग्गर बन्धुओं की रचनाएं बांच कर उन्हें लगातार टिप्पणियां
भी दूंगा . इससे दो फ़ायदे एक साथ होंगे, एक तो ये कि मुझे नई नई रचनाओं
को पढने का अवसर मिलेगा, दूसरा मैं जिन्हें टिप्पणियां दूंगा, वे भी ब्लॉग पर आयेंगे
मेरी रचना का आनंद लेने के लिए ............
जय हिन्द !
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