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Wednesday, May 22, 2013
सज़ा हम दे नहीं सकते, हमें तो प्यार आता है
ये मौसम अपने ही जीवन में बारम्बार आता है
हमें कुछ फ़र्क लगता ही नहीं अपनों में-गैरों में
हमें दिखता है दुश्मन भी गोया दिलदार आता है
-अलबेला खत्री
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Thursday, December 20, 2012
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Saturday, December 31, 2011
गन्ध ये बारूद की है शायद
जिसे सहना मेरे बूते से बाहर है
लेकिन मैं सह रहा हूँ
कर कुछ नहीं सकता
इसलिए सिर्फ़ कह रहा हूँ
कि हटादो ये कुहासा
क्योंकि इस सियाह आलम में
महज़ हैवानियत पलती है
बन्दगी को खतरा है
मौत के इस खेल में
ज़िन्दगी को खतरा है
दुनिया पर कब्ज़ा करने की खूंफ़िशां मन्शा वालो !
ख़बरदार !
तुम ही नहीं, तुम्हारी पुश्तों को भी ले डूबेगी
तुम्हारी ख़ुदगर्ज़ी .........
मैं तो फ़क़त इल्तज़ा कर सकता हूँ
आगे तुम्हारी मर्ज़ी ...............
मालिक करे नये साल में होश आ जाये आपको
बनाने वाला हैवान से अब इन्सां बनाए आपको
___नव वर्ष अभिनन्दन !
2012 मुबारक हो !
जय हिन्द !