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Friday, September 6, 2013
कविता के मंच पर मौलिक कविता के अभाव को देखते हुए कुछ पुराने कवियों को सम्मान देने और कुछ नितान्त नए रचनाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए निर्मित काव्य-कुम्भ का पहला भाग बन कर तैयार है और जल्द ही इसका लोकार्पण समारोह होगा .
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| kavyakumbh album by hasyakavi albela khatri |
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| kavyakumbh album by hasyakavi albela khatri |
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Friday, June 21, 2013
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| जगतजननी आदिशक्ति राजराजेश्वरी माँ हिंगुलाज की नवीन आरती |
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Friday, June 14, 2013
तलाश
है एक अदद रचना की ........जी हाँ, सिर्फ़ एक रचना की, लेकिन ऐसी
वैसी
नहीं, एक ख़ास रचना की, उस रचना की जिसका मुद्रक-प्रकाशक होने
का मेरा बड़ा
मन कर रहा है . इत्ते दिन उसकी याद नहीं आई,क्योंकि एक तो
अन्य रचनाओं से
काम चल रहा था दूसरे उस में मंचीय कसाव नहीं होने के
कारण, बड़े मंचों
के लिए उपयोगी न हो कर महज गोष्ठी-वोष्ठी के काम की
ही थी लेकिन अब बड़ी
शिद्दत से ढूंढ रहा हूँ . ढूंढें ही जा रहा हूँ उस कमबख्त
को जो पहले
किसी काम की नहीं लग रही थी .लेकिन आज उसकी ज़रूरत पड़
गयी क्योंकि मेरे
अगले काव्य-संकलन में उसे शामिल करना इसलिए ज़रूरी
हो गया है क्योंकि सौ
में एक कम पड़ रही है .
हालांकि न वह ग़ज़ल की तरह अनुशासित है, न ही
नज़्म की तरह शगुफ़्त, न
कविता सी कोमलकान्त है, न ही मुक्तक की भान्ति
उन्मुक्त,,, दोहे और चौपाई
सी तीखी और मारक भले है लेकिन हाइकू जितनी सरल
नहीं है . असल में वह
एक अलग किस्म की रचना है जिसे लोग कुण्डलिया कहते
हैं . बस ...........उसी
को तलाश रहा हूँ . न जाने कहाँ कुंडली मार कर बैठ
गयी है कठोर .......
कितना दुःख होता है जब अपनी कोई रचना गुम हो
जाती है............ यह मुझसे
ज्यादा कौन समझेगा ? जिसकी एक ऐसी रचना खो गयी जिसे
मैं सलीके से
सुधार-वुधार कर अपनी क़िताब में छापना चाहता था ताकि लोग एन्जॉय कर
सकें . अरे भाई लोग एन्जॉय करें न करें, मुझे क्या मतलब,लेकिन मेरी किताब
तो पूरी हो जाती .....अब एक, सिर्फ़ एक कुण्डली के कम पड़ जाने से पांडुलिपि
का काम रुक गया है .
वैसे देखा जाए तो
मैं भी बड़ा चूतिया आदमी हूँ ............इत्ती बकवास लिखने से
अच्छा था,
एक नई रचना ही लिख लेता ............हुड !!!!!! बेवकूफ़ कहीं का
जाओ
भाई जाओ, टाइम खोटी मत करो, आप अपना काम कारो और मैं .....
रचना करता हूँ एक
नयी रचना की ताकि सौ पूरी हो जाए और संकलन समय
पर प्रकाशित हो जाए .
-अलबेला खत्री
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Thursday, June 13, 2013
चाँद : दो कुंडलिया
कविता लिख दूँ चाँद पर, यदि तुम करो पसन्द
मेरा तो इक लक्ष्य है, उर उमड़े आनन्द
उर उमड़े आनन्द, सुरतिया खिल खिल जाये
काश ! किसी उर्वशी से अपना उर मिल जाये
जीवन के मरुथल में बह जाये रस सरिता
करूँ समर्पित मैं तुमको अपनी हर कविता
चन्दा केवल एक है, अनगिन यहाँ चकोर
सभी ताकते चाँद को हो कर भाव विभोर
हो कर भाव विभोर, इश्क़ में मर जाते हैं
पर दीदारे-यार वो मन भर कर जाते हैं
हाय मोहब्बत ही बन जाती है इक फन्दा
कितने आशिक जीम गया यह ज़ालिम चन्दा
जय हिन्द
-अलबेला खत्री