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ये रचना मुझे सुन्दर लगी और प्यारी भी, आपको पसंद आये तो बताना ........प्लीज़
Labels: .khatri , adult , adult poetry , albela , anand rathi , hai , hasya kavi , hindi kavi , hindi poetry , KAVI , rachna , rachnakar ki rachna , आत्मिकी अलबेला खत्री , घरवाली
क्या अदा, क्या जलवे तेरे रचना ! तू तो नहीं मिली पर मेरा काम तो हो गया
गुमशुदा रचना की तलाश में अपने मुख्य ब्लॉग पर कल एक पोस्ट मैंने
किसलिए लगाईं थी, यह तो मैं ख़ुद नहीं जानता, लेकिन परिणाम बड़ा अच्छा
आया, ये मैं जानता हूँ . जिस ब्लॉग पर रक्तदान जैसे संवेदनात्मक विषय पर
पाठकों की संख्या केवल तीन अंकों में थी, मेरी रचना का जादू ऐसा चला
कि पाठक संख्या सीधे चार अंकों में पहुँच गयी .
पहले मैं समझता था कि लोग ज़्यादातर केवल जापानी तेल, सेक्स, सविता
भाभी, जवानी और छाती से छाती मिली जैसी शब्दावलियाँ ही बांचते हैं . लेकिन
आज मुझे एहसास होगया कि यहाँ मेरी रचना भी काफी हॉट है . लिहाज़ा
मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं भी अब अपने ब्लॉग पर फिर से लिखना शुरू करूँगा
.....और अन्य ब्लोग्गर बन्धुओं की रचनाएं बांच कर उन्हें लगातार टिप्पणियां
भी दूंगा . इससे दो फ़ायदे एक साथ होंगे, एक तो ये कि मुझे नई नई रचनाओं
को पढने का अवसर मिलेगा, दूसरा मैं जिन्हें टिप्पणियां दूंगा, वे भी ब्लॉग पर आयेंगे
मेरी रचना का आनंद लेने के लिए ............
जय हिन्द !
Labels: adult , comedy , funny hasyakavisammelan , hasya , hindi hasyahungama , hindi kavi sammelan , hinglaj , hingulaj ग़ज़ल , KAVI , khatri , raaz ki baat , rachna , rachnakaar , rajkumar bhakkar , support narendra modi
कहाँ खो गई एक रचना ! वोह रचना जो कभी मेरे आसपास ही रहती थी
तलाश है एक अदद रचना की ........जी हाँ, सिर्फ़ एक रचना की, लेकिन ऐसी
वैसी नहीं, एक ख़ास रचना की, उस रचना की जिसका मुद्रक-प्रकाशक होने
का मेरा बड़ा मन कर रहा है . इत्ते दिन उसकी याद नहीं आई,क्योंकि एक तो
अन्य रचनाओं से काम चल रहा था दूसरे उस में मंचीय कसाव नहीं होने के
कारण, बड़े मंचों के लिए उपयोगी न हो कर महज गोष्ठी-वोष्ठी के काम की
ही थी लेकिन अब बड़ी शिद्दत से ढूंढ रहा हूँ . ढूंढें ही जा रहा हूँ उस कमबख्त
को जो पहले किसी काम की नहीं लग रही थी .लेकिन आज उसकी ज़रूरत पड़
गयी क्योंकि मेरे अगले काव्य-संकलन में उसे शामिल करना इसलिए ज़रूरी
हो गया है क्योंकि सौ में एक कम पड़ रही है .
हालांकि न वह ग़ज़ल की तरह अनुशासित है, न ही नज़्म की तरह शगुफ़्त, न
कविता सी कोमलकान्त है, न ही मुक्तक की भान्ति उन्मुक्त,,, दोहे और चौपाई
सी तीखी और मारक भले है लेकिन हाइकू जितनी सरल नहीं है . असल में वह
एक अलग किस्म की रचना है जिसे लोग कुण्डलिया कहते हैं . बस ...........उसी
को तलाश रहा हूँ . न जाने कहाँ कुंडली मार कर बैठ गयी है कठोर .......
कितना दुःख होता है जब अपनी कोई रचना गुम हो जाती है............ यह मुझसे
ज्यादा कौन समझेगा ? जिसकी एक ऐसी रचना खो गयी जिसे मैं सलीके से
सुधार-वुधार कर अपनी क़िताब में छापना चाहता था ताकि लोग एन्जॉय कर
सकें . अरे भाई लोग एन्जॉय करें न करें, मुझे क्या मतलब,लेकिन मेरी किताब
तो पूरी हो जाती .....अब एक, सिर्फ़ एक कुण्डली के कम पड़ जाने से पांडुलिपि
का काम रुक गया है .
वैसे देखा जाए तो मैं भी बड़ा चूतिया आदमी हूँ ............इत्ती बकवास लिखने से
अच्छा था, एक नई रचना ही लिख लेता ............हुड !!!!!! बेवकूफ़ कहीं का
जाओ भाई जाओ, टाइम खोटी मत करो, आप अपना काम कारो और मैं .....
रचना करता हूँ एक नयी रचना की ताकि सौ पूरी हो जाए और संकलन समय
पर प्रकाशित हो जाए .
-अलबेला खत्री









