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Albela Khatri

अब कल कोई इन पर किसी प्रकार के भ्रष्टाचार का आरोप मत लगाना

चुनाव जीतने के तुरन्त बाद लोकतन्त्र के दरबार में

अनेक महानुभावों ने

ओथ "ली"
शपथ "ग्रहण की"
या
कसम "खाई "

और ये पुनीत कार्य
सब के सामने सम्पन्न हुआ

कोई चोरी छुपे नहीं
अब कल कोई इन पर किसी प्रकार के भ्रष्टाचार का आरोप
मत लगाना
_________________अरे यार जिस काम की शुरुआत ही
"लेने"
+ग्रहण करने
+खाने से होती है

उस में खाने पीने की छूट तो होनी ही चाहिए
..हा हा हा हा हा हा हा हा


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6 comments:

DR. ANWER JAMAL May 12, 2011 at 12:26 AM  

आपने बिलकुल ठीक कहा है , बात यही है कि जब तक हम सच को जान पाते हैं तब तक उम्र का एक बड़ा हिस्सा बीत चुका होता है. लेकिन असल सवाल यह है कि हमारे समाज पर हमेशा से होल्ड ज़ुल्म करने वाले सूदखोरों और ज़मींदारों का रहा है, हरेक राजा और हरेक बादशाह के ज़माने में यही तबक़ा सिरमौर रहा है और हरेक शहर में जनता आज भी इन्हें सम्मान देती है और जो लोग जनता की भलाई में अपना तन-मन-धन खपा देते हैं , जनता उन्हें भुला देती है. इसके बाद जनता फिर चाहती है कि कोई आये और उसके उद्धार के लिए अपनी जान दे .
सवाल यह है कि आख़िर कोई ऐसा क्यों करे ?
क्या कोई समझदार आदमी खुद को बर्बाद करने के लिए तैयार होगा ?
जबकि भ्रष्टाचार करके वह एक ऐश्वर्यशाली जीवन जी सकता है .
धन्यवाद .
http://quranse.blogspot.com/2011/05/blog-post_11.html

Udan Tashtari May 12, 2011 at 4:54 AM  

इतनी छूट तो मिलना ही चाहिये.

Ratan Singh Shekhawat May 12, 2011 at 6:07 AM  

खाने पीने की छूट इस देश में तो पूरी मिली हुई है जी | ये आरोप प्रत्यारोप तो टाइम पास के लिए है | जांच आयोग भी अपने रिटायर लोगों को रेवड़ी बांटने का पुण्य फार्मूला है :) :)

Sudhir May 12, 2011 at 6:32 AM  

sahi baat hai ... haahahahahahah .. agar ye khyenge nahi to chunav mein jitni dod-dhoop karte hain, usse to ye 'bechare' sukh kar kanta ho jayenge ;P

DR. ANWER JAMAL May 12, 2011 at 9:23 AM  

Nice post.

दिल को जला रहा हूँ ज़माने के वास्ते
दुनिया से तीरगी को मिटाने के वास्ते

खा के गले पे तीर भी हंसना पड़ा मुझे
बस्ती में इंक़लाब को लाने के वास्ते

लो, फिर से आ गयी हैं ये नाज़ुक सी तितलियाँ
फूलों से खुशबुओं को चुराने के वास्ते

फिर से मेरे लहू की ज़ुरूरत पड़ी उसे
बुझते हुए चराग़ जलाने के वास्ते

कल रात उसने सारे खतों को जला दिया
मेरा ख़याल दिल से मिटाने के वास्ते

http://mushayera.blogspot.com/2011/05/gazal.html

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर May 12, 2011 at 1:10 PM  

वाकई...
अब हम नहीं कहेंगे.
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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