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Albela Khatri

हिन्दी कवि-सम्मेलनों में अब कविता चोरों का बोलबाला कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है




एक समय था जब हिन्दी कवि-सम्मेलनों में प्रस्तुति देने वाले सभी कवियों की 

अपनी एक अलग पहचान होती थी. लोग केवल अपनी  लिखी कवितायेँ ही सुनाते 

थे और  अपनी ही टिप्पणियां  बोलते थे...परन्तु  तालियों की गडगडाहट और  

नोटों की खडखडाहट के आकर्षण ने  पिछले कुछ वर्षों में ऐसे बहुत से लोगों को 

मंच पर खींच लिया जो  बेचारे ख़ुद तो लिख नहीं पाते परन्तु दूसरों की रचनाओं 

को तोड़ मरोड़ कर  अपने अंदाज़ में सुना ज़रूर देते हैं . आज  मंचीय  

कवि-सम्मेलनों की स्थिति  धीरे धीरे यहाँ तक आ गयी है  कि  मौलिक 

रचनाकार  माइक पर  अपनी  बेहतरीन रचनाएं सुनाते हुए भी डरता है  कि 

कहीं  उसकी  रचना को चुरा कर  कोई  दूसरा  अपनी आइटम न बनाले...

चुटकुले, टिप्पणियां, शे'र शायरी और  मंच संचालन  तो इतने कॉमन हो गए हैं  

कि सिर्फ चेहरे बदलते हैं, पेमेंट बदलते हैं और कवियों के नाम भर बदलते हैं . 

बाकी मसाला वही रहता है चाहे कवि-सम्मेलन कोई भी कराये और कहीं  भी 

कराये. वैसे तो मैं इसका कई बार  शिकार हुआ हूँ  लेकिन  अब तो मामला 

हद से आगे जा पहुंचा है . क्योंकि  पहले केवल हास्य-चुटकियाँ ही चोरी होती 

थीं, अब तो कवितायें और निबन्ध भी....गत दिनों सागर विश्वविद्यालय में 

सम्पन्न एक  विराट कवि-सम्मेलन में एक कवि अशोक सुन्दरानी ने जिस 

कविता पर सर्वाधिक  तालियाँ बटोरीं, उस कविता  का पूरा ताना बना  ही 

मेरे आलेख से चुराया गया है . भले ही जूते को लेकर उस कविवर सुन्दरानी 

ने कुछ और बातें जोड़  दी हों, परन्तु  जहाँ  से उसमे कविता का तत्व  मुखर 

होता है वह पूरा  आलेख मेरा है . चूँकि मैं भी उस मंच पर मौजूद था  और 

चाहता तो विरोध कर सकता था ..तमाशा  खड़ा कर सकता था  लेकिन मैंने 

ऐसा न करके  अपरोक्ष रूप से शर्मिन्दा करने के लिए  मैंने उस  कवि को  

उसकी प्रस्तुति पर  गुलदस्ता भेंट  किया ...हा हा हा 



अब मैं आपको बताता  हूँ कि  मेरे पास मेरी बात का सुबूत  क्या है. दरअसल 

बात कोई चार  साल पुरानी है.  उन दिनों  मैं  सूरत के हिन्दी दैनिक राजस्थान 

पत्रिका  और लोक तेज़ में रोज़ाना व्यंग्य आलेख  लिखता था . तब मैंने  एक 

लेख  उस दिन लिखा था जिस दिन पहली बार सभा में जूता उछाला गया था . 

वह आलेख  छपा हुआ भी मेरे पास है  इसके अलावा मैंने ब्लोगिंग की  

शुरूआत के दिनों में उसे इसी ब्लॉग पर पोस्ट किया था  तथा बाद में मेरे ही 

दूसरे ब्लॉग पर भी  लगाया था . आज वही  आलेख एक बार फिर से.....

हालाँकि आलेख कोई बहुत  धाकड़  नहीं है  लेकिन सामयिक  विषय को 

देखते हुए  ठीक ही था .  लीजिये पढ़िए....आपके लिए एक बार फिर हाज़िर है : 

माहौल बहुत गर्म था। गर्म क्या था, उबल रहा था। वक्ताओं द्वारा लगातार

असंसदीय भाषा का प्रयोग करने से सदन में संसद जैसा दृश्य उपस्थित

हो चुका था। सभी को बोलने की पड़ी थी, सुनने को कोई राजी नहीं था।

गाली-गलौज़ तक पहुंची बहस किसी भी क्षण हाथा-पाई में भी तब्दील

हो सकती थी। तभी अध्यक्षजी  अपनी सीट पर खड़े हो गए और माइक

को अपने मुंह में लगभग ठूंसते हुए बोले, 'देखिए.. मैं अन्तिम चेतावनी

यानी लास्ट वार्निंग दे रहा हूं कि सब शान्त हो जाएं क्योंकि हमलोग यहां

शोकसभा करने के लिए जमा हुए हैं, मेहरबानी करके इसे लोकसभा

न बनाइए। प्लीज..अनुशासन रखिए और यदि नहीं रख सकते तो

भाड़ में जाओ, मैं सभा को यहीं समाप्त कर देता हूं।



अगले ही पल सब

शान्त हो चुके थे। मानो सभी की लपर-लपर चल रही .जुबानों को

एक साथ लकवा मार गया हो। अवसर था अखिल भारतीय जूता महासंघ

के गठन का जिसकी पहली आम बैठक में भाग लेने हज़ारों जूते-जूतियां

एकत्र हुए थे।



एक सुन्दर और आकर्षक नवजूती ने खड़े होकर माइक संभाला,

'आदरणीय अध्यक्ष महोदय, मंच पर विराजमान विदेशी कंपनियों के

सेलिब्रिटी अर्थात्‌ महंगे जूते-जूतियों और सदन में उपस्थित नए-पुराने,

छोटे-बड़े, मेल-फीमेल स्वजनों.. मेरे मन में आज वैधव्य का दुःख तो

बहुत है, लेकिन ये कहते हुए गर्व भी हो रहा है कि मेरे पति तीन साल

तक लगातार अपने देश-समाज और स्वामी की सेवा करते हुए अन्ततः

शहीद हो गए। उनका साइज भले ही सात था लेकिन मजबूत इतने थे कि

दस नंबरी भी शरमा जाएं।



सज्जनो, जिस दिन उनका निर्माण हुआ, उसके अगले ही दिन एक बहादुर

फौजी के पांवों ने उन्हें अपना लिया। भारतीय सेना का वो शूरवीर सिपाही

लद्दाख और सियाचीन जैसी बर्फ़ीली जगहों पर तैनात रह कर जब तक

अपनी सीमाओं की रक्षा करता रहा तब तक मेरे पति ने जी जान से उनके

पांवों की रक्षा की। गला कर बल्कि सड़ा कर रख देने वाली बर्फ़ीली

चट्टानों और भीतर तक चीर देने वाली तेज़-तीखी शीत समीर से

जूझते हुए वे स्वयं गल गए, गल-गल कर खत्म हो गए परन्तु अपनी

आख़री सांस तक अपने स्वामी के पांवों को ठंडा नहीं होने दिया। मुझे

अभिमान है उनकी क़ुर्बानी पर और मैं कामना करती हूं कि हर जनम

में मुझे पति के रूप में वही मिले चाहे हर बार मुझे भरी जवानी में ही

विधवा क्यूं न होना पड़े, इतना कह कर वह जूती सुबकने लगी।

पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। किसी ने नारा लगाया,

जब तक सूरज चान्द रहेंगे, जूते जिन्दाबाद रहेंगे।



एक अन्य मंचासीन जूता बोला, 'भाइयो और बहनो, आदिकाल से लेकर

आज तक, मानव और जूतों का गहरा सम्बन्ध रहा है। हमने सदा

मानव की सेवा की है और बदले में मानव ने भी हमारा बहुत ख्याल

रखा है, अपने हाथों से हमें पॉलिश किया है, कपड़ा मार-मार कर

चमकाया है यहां तक कि मन्दिर में भी जाता है तो भगवान से ज्य़ादा

हमारा ध्यान रखता है कि कोई हमें चुरा न ले, उठा न ले। मित्रो, त्रेतायुग

में तो हमारे पूज्य पूर्वज खड़ाउओं ने अयोध्या के सिंहासन पर बैठकर

शासन भी किया है। लेकिन आज हमारी अस्मिता संकट में है।

हम मानवोपकार के लिए सदा अपना जीवन अर्पित करते आए हैं, लेकिन

आज घृणित राजनीति में घसीटे जा रहे हैं और सम्मान के बजाय उपहास

का पात्र बनते जा रहे हैं।  कोई असामाजिक तत्व हमारी माला बनाकर

महापुरुषों की प्रतिमा पर चढ़ा देता है तो कभी कोई हमारे तलों में हेरोइन

या ब्राउन शुगर छिपा कर तस्करी कर लेता है। आजकल तो हम हथियार

की तरह इस्तेमाल होने लगे हैं, जब और जिसके मन में आए, कोई भी

हमें किसी नेता पर फेंककर ख़ुद हीरो बन जाता है और हमारे कारण

दो दो वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक हत्या हो जाती है बेचारे सज्जन लोग

टिकट से ही वंचित हो जाते हैं। इतिहास साक्षी है, हम अहिंसावादी हैं।

हम न अस्त्र हैं, न शस्त्र हैं लेकिन ये हमारी प्रतिभा है कि अवसर पड़े तो

हम दोनों तरह से काम आ सकते हैं। हमारी इसी योग्यता का लोगों ने

मिसयूज किया है। हमें......शोषण और अत्याचार के विरूद्ध

आवाज़ उठानी होगी।



हां, हां, उठानी होगी, सबने एक स्वर में कहा


इसी तरह और भी अनेक मुद्दे हैं जिनपर हमें एकजुट होकर काम

करना पड़ेगा और अपने हक के लिए संगठित होकर संघर्ष करना

पड़ेगा। जय जूता, जय जूता महासंघ।



सदन में तालियों के साथ नारे भी गूंज उठे

- जूतों तुम आगे बढ़ो जूतियां तुम्हारे साथ है,

हिंसा से अछूते हैं - हम भारत के जूते हैं....इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद ! 

http://hindihasyakavisammelan.blogspot.com/2011/06/blog-post_07.html

लायंस क्लब ऑफ़ मालेगांव  के वृक्षारोपण अभियान में  मुख्य अतिथि  अलबेला खत्री  अन्य  समाजसेवियों के साथ पौधे  रोपते हुए 





6 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) January 25, 2012 at 6:43 AM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
गणतन्त्रदिवस की पूर्ववेला पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

काजल कुमार Kajal Kumar January 25, 2012 at 7:09 AM  

गुलदस्ता लेकर तो चोट्टा गद गद हो गया होगा बिना ये माने कि उसने कोई चोरी भी की है

dheerendra January 25, 2012 at 11:42 AM  

बहुत सुंदर प्रस्तुति,व्यंग करती अच्छी रचना,..
WELCOME TO NEW POST --26 जनवरी आया है....
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए.....

डा. अरुणा कपूर. January 25, 2012 at 3:45 PM  

अलबेला जी आपने उन कविवर महाशय को जो गुलदस्ता भेट किया...उसमें फूल सजे हुए थे या..ज..ज..ज...हा,हा..हा !

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) January 29, 2012 at 9:05 AM  

आज 29/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर (सुनीता शानू जी की प्रस्तुति में) लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Rakesh Kumar January 29, 2012 at 11:54 PM  

basant ke bela men aapki prstuti
padhkar man jhoom uthha,albela ji.
tikhi aur dhaardar prastuti.
bahut bahut shubhkaamnayen aapko.

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