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Albela Khatri

किसी एक को श्रेष्ठ बताना मेरे बस की बात नहीं

धर्म के नाम पे रक्त बहाना मेरे बस की बात नहीं

अपने घर में आग लगाना मेरे बस की बात नहीं


पौड़ी-आयत-ऋचा-वर्ड-लोगास-ताओ सब प्रिय मुझको

किसी एक को श्रेष्ठ बताना मेरे बस की बात नहीं


यों तो मैं भी स्वार्थ के वश मैला हो जाया करता हूँ

किन्तु वतन पर दाग़ लगाना मेरे वश की बात नहीं


बेशक मुझको मदिरा पीने में संकोच नहीं लेकिन

पितृपक्ष में पैग लगाना मेरे बस की बात नहीं


कवि-सम्मेलन के मंचों पर गीत सुनाया करता हूँ

सड़े-गले चुटकुले सुनाना मेरे बस की बात नहीं


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14 comments:

जी.के. अवधिया September 24, 2010 at 2:04 PM  

"यों तो मैं भी स्वार्थ के वश मैला हो जाया करता हूँ
किन्तु वतन पर दाग़ लगाना मेरे वश की बात नहीं"

बहुत खूब!

डा. अरुणा कपूर. September 24, 2010 at 4:17 PM  

आप की रचना वाकई काबिल-ए-तारीफ है अलबेला जी!

झूठी जय-जय-कार करना...मेरे बस की बात नहीं....

दीपक 'मशाल' September 24, 2010 at 5:42 PM  

इसीलिए आप हम सबको प्रिय हैं जी..

कविता रावत September 24, 2010 at 6:10 PM  

यों तो मैं भी स्वार्थ के वश मैला हो जाया करता हूँ
किन्तु वतन पर दाग़ लगाना मेरे वश की बात नहीं
....bahut sahi..

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" September 24, 2010 at 6:15 PM  

लाजवाब!

Majaal September 24, 2010 at 7:11 PM  

ग़ज़ल बनाना तो जरूर आपके बस की बात लगती है जनाब, लिखते रहिये ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) September 24, 2010 at 8:36 PM  

पौड़ी-आयत-ऋचा-वर्ड-लोगास-ताओ सब प्रिय मुझको
किसी एक को श्रेष्ठ बताना मेरे बस की बात नहीं
--
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं!

आशा जोगळेकर September 25, 2010 at 12:21 AM  

अलबेला जी बहुत खूबसूरत गज़ल । एक एक शेर बढिया पर ये सबसे ज्यादा मन को भा गया ।

यों तो मैं भी स्वार्थ के वश मैला हो जाया करता हूँ

किन्तु वतन पर दाग़ लगाना मेरे वश की बात नहीं

Udan Tashtari September 25, 2010 at 6:32 AM  

बेहतरीन...

सतीश सक्सेना September 25, 2010 at 8:04 AM  

आज तो आपको प्यार करने का जी करता है अलबेला भाई ! दिल से निकली हुई यह रचना बेहतरीन कृतियों में से एक मानी जानी चाहिए !! हार्दिक शुभकामनायें !!

Vijay Kumar Sappatti September 25, 2010 at 9:31 AM  

is baar to chaa gaye albela ji
waah waah kya khoob likha hai

sundar bhaav darshati rachna ..

badhayi kabool kare..

पी.सी.गोदियाल September 25, 2010 at 10:20 AM  

बेशक मुझको मदिरा पीने में संकोच नहीं लेकिन
पितृपक्ष में पैग लगाना मेरे बस की बात नहीं

मेरे पितृ तो काफी शौक़ीन मिजाज थे इसलिए बुरा नहीं मानते :)

ओशो रजनीश September 25, 2010 at 11:41 AM  

अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

यहाँ भी आये और अपनी बात कहे :-
क्यों बाँट रहे है ये छोटे शब्द समाज को ...?

संगीता स्वरुप ( गीत ) September 25, 2010 at 12:22 PM  

सुन्दर अभिव्यक्ति ..

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tepa & wageshwari award winner the great indian laughter champion -2 fame hindi hasyakavi, lyric writer,music composer, producer, director, actor, t v  artist  & blogger from surat gujarat . more than 6200 live performance world wide in last 27 years
this time i creat an unique video album SHREE HINGULAJ CHALISA for TIKAM MUSIC BANK
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