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Albela Khatri

शेख सादी के अनुसार ऐसा होता है कंजूस आदमी.......




कंजूस आदमी का गड़ा हुआ धन

ज़मीं से

तभी बाहर निकलता है

जब वह

स्वयं ज़मीं में गड़ जाता है


- शेख सादी

रचनाकार साहित्य संस्थान के मंच  से  नरेश कापडिया  का सारस्वत सम्मान करते हुए  श्री सुबचन राम, मुकेश अग्रवाल और श्री अतुल तुलस्यान 




2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) May 18, 2012 at 1:13 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

मुकेश पाण्डेय चन्दन May 18, 2012 at 2:13 PM  

suna hai kanjuso ka dhan docter khate hai ! sundar vichar !

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