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Albela Khatri

सियासी लोगों की आँखों में जो घड़ियाली आँसू हैं



भाव बढ़ा पेट्रोल का, रुक गई सबकी सांस

गवर्नमेंट ने कर दिया फिर जनता को बांस

फिर जनता को बांस, मच गई त्राहि त्राहि

उपभोक्ता का रुदन ये दिल्ली सुनती नाहिं

महंगाई ले डूबेगी, घर के बजट की नाव

दिन दिन बढ़ता जा रहा सब चीजों का भाव

___________________


सियासत एक की दुल्हन नहीं कइयों की रानी है

ये है बदनामी मुन्नी की तो शीला की जवानी है


सियासी लोगों की आँखों में जो घड़ियाली आँसू हैं


इलेक्शन में तो मोती है, पर उसके बाद पानी है

हास्यकवि अलबेला खत्री जयपुर में  काव्य प्रस्तुति देते हुए 
 

3 comments:

निर्मला कपिला May 24, 2012 at 9:41 AM  

वाह वाह बहुत खूब!

रविकर फैजाबादी May 24, 2012 at 10:10 AM  

मोहन माखन खा गए, मोहन पीते दुग्ध ।
आग लगा मोहन गए, लपटें उठती उद्ध ।

लपटें उठती उद्ध, जला पेट्रोल छिड़ककर ।
होती जनता क्रुद्ध, उखाड़ेगी क्या रविकर ।

बड़े कमीशन-खोर, चोर को हलुवा सोहन ।
दाढ़ी बैठ खुजाय, अर्थ का शास्त्री मोहन ।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) May 24, 2012 at 4:42 PM  

बहुत सुन्दर..!
महँगाई की चिन्ता धनवानों को अधिक होती है!

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