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धुआं आसमान में शेखी बघारता है और राख ज़मीन में कि वे आग के खानदान वाले हैं

धुआं आसमान में शेखी बघारता है

और राख ज़मीन में

कि वे आग के खानदान वाले हैं


- रवीन्द्र नाथ टैगोर



बुद्धिमानी के साथ खर्च करता हुआ आदमी थोड़े खर्चे से भी अपनी

गुज़र कर सकता है मगर फ़िजूलखर्ची से सारे ब्रह्माण्ड की सम्पदा

भी नाकाफ़ी हो सकती है


-अज्ञात महापुरूष


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