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Albela Khatri

थोड़ा सा रबड़ चढ़ा लेता तो तुझ जैसी नालायक औलाद भी नहीं होती


शहर में ऑटो रिक्शा और taxi की हड़ताल के कारण रंगलाल

और उसका बेटा नंगलाल रात को ग्यारह बजे पैदल ही चल कर घर

जा रहे थे अब रात के सन्नाटे में बूढ़े रंगलाल की लाठी ठक ठक

की ज़ोरदार आवाज़ कर रही थी......जो कि नंगलाल को अत्यन्त

कर्कश लग रही थी और बर्दाश्त नहीं हो रही थी


नंगलाल : बापू, तुममे भी अक्ल नहीं है .....अरे ज़रा सा रबड़ चढ़ा लेते

तो ये लाठी घिसती भी नहीं और इतनी आवाज़ भी नहीं होती


रंगलाल : ठीक कहा बेटा ! थोड़ा सा रबड़ चढ़ा लेता तो बाप को

बेअक्ल कहने वाली तुझ जैसी नालायक औलाद भी नहीं होती

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ख्याली सहारण और अलबेला खत्री अहमदाबाद में


www.albelakhatri.com

10 comments:

शिवम् मिश्रा July 18, 2010 at 8:54 PM  

बाप........बाप ही होता है .........क्या जवाब दिया है !

Vikas Mogha July 18, 2010 at 9:25 PM  

ha ha ha ha

राज भाटिय़ा July 18, 2010 at 9:55 PM  

हाय दईया!!!!

ललित शर्मा July 19, 2010 at 6:32 AM  

हा हा हा

आज नंगलाल की फ़ोटो भी लगा दी है जी आपने।

राम राम

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक July 19, 2010 at 8:18 AM  

जवाब नही सर जी!

sajid July 19, 2010 at 11:13 AM  

दुखी पिता !

अन्तर सोहिल July 19, 2010 at 11:52 AM  

हा-हा-हा
सही कहा

प्रणाम

Ram Krishna Gautam July 19, 2010 at 1:09 PM  

The Ultimate One...


Regards

Ram K

honesty project democracy July 19, 2010 at 2:08 PM  

सही में बाप तो बाप ही है ,बेटा तो बेटा ही रहेगा ...अच्छी प्रस्तुती लेकिन द्विअर्थी भावनात्मक संबाद को ब्लॉग पर दूसरे तरीके से लिखने का प्रयास करें खत्री साहब तो ज्यादा अच्छा रहेगा ....

dev July 31, 2010 at 1:40 PM  

बाप को उसी वक्त वो लाठी भी नालायक बेटे को मारनी थी , क्योकि जो अपने माँ बाप का सम्मान न करें वो “ जानवर” के समान होता है ओर जानवरों को सिर्फ लाठी से ही हाँका जाता है

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