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Albela Khatri

शक्लें देखो इन युवा मंत्रियों की

इसे कहते हैं चार आने का चना और चौदह रूपये का मसाला.. मसाला भी साला ऐसा कि दोनों टाइम हाहाकार मचा दे..इनपुट में भी और आउटपुट में भी। ये ज्ञान वाली बात मैंने मुफ़्त में इसलिए कही, क्योंकि लम्बे अध्ययन और गहन चिन्तन के उपरान्त ये दो कौड़ी का निष्कर्ष मेरी समझदानी में फिट हुआ है कि संसद में बैठने वाले हमारे नेता तथा सड़क पर तमाशा दिखाने वाले मदारी, दोनों एक ही मिट्टी के बने हैं। इसलिए दोनों में गहरी समानता देखने को मिलती है।
सड़क का मदारी डमरू बजा-बजा कर लोगों को आकर्षित करता है, अजगर, नेवला, सांप और खोपिड़यां..पता नहीं क्या-क्या दिखाकर भीड़ जमा करता है लेकिन जैसे ही भीड़ सांप-नेवले की लड़ाई देखने को उत्सुक होती है, वह मदारी दन्तमन्जन या ताबीज़ निकालकर बेचना शुरू कर देता है। लोग कहते हैं - सांप नेवले की लड़ाई कराओ तो वो कहता है - कराऊंगा, पहले इस पापी पेट के लिए कुछ रोकड़ा तो दो... लोग बेचारे तमाशा देखने को लालायित हो चुके होते हैं इसलिए कोई पैसा देता है, कोई मन्जन खरीदता है, लेकिन सारा पैसा जमा होने के बाद मदारी कुछ ऐसे मन्तर वन्तर का ढोंग करता है कि सब लोग वहां से खिसक लेते हैं और मदारी सारा माल लेकर, बांसुरी  बजाता हुआ अपने घर कू चल देता है।
इसी प्रकार हमारे नेता सौ-सौ झांसे देकर हमारा वोट ले लेते हैं और बाद में ऐसे चम्पत होते हैं कि अगले चुनाव तक पब्लिक उन तक पहुंच ही नहीं पाती। ताज़ा उदाहरण है श्रीमान बालगोपाल राहुल गांधी का जिनके युवा आभामण्डल को फैलाते हुए ये प्रचार किया गया कि इस बार नये और ऊर्जावान उत्साही लोगों को ही मंत्री मण्डल में लिया जाएगा ताकि राजीव गांधी के अधूरे सपनों को पूरा किया जा सके। जनता ने सोचा-अब मज़ा आएगा। नये लोग आएंगे तो काम भी नया करेंगे, लेकिन नयेपन के नमूनों के ढोल की पोल कल शाम उस वक्त खुल गई जब डा. मनमोहन सिंह ने उन्हीं खुर्रांट बुजु़र्गों को मंत्री बनाया जिनसे हम बुरी तरह ऊबे हुए हैं।
ज़रा शक्लें तो देखो इन तथाकथित युवा मंत्रियों की...जिनमें से कोई भी महापुरूष 60 से कम का नहीं है। ले दे के एक राहुल बाबा की उम्मीद थी तो वो भी खिसक लिए पतली गली से...यानी मंत्री मण्डल में शामिल नहीं हुए। अब कोई क्या उखाड़ लेगा इनका...
कई साल पहले मेरे एक दोस्त, अरे वही....डी.वी.पटेल (नैशविल टेनिसी वाले) ने मुझसे पूछा था कि राजीव गांधी, वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर और डा. मनमोहनसिंह में क्या फ़र्क है- मैंने कहा-राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना ये दर्शाता है कि कोई भी आदमी, हमारे देश का प्रधानमंत्री बन सकता है, वी.पी. सिंह ने ये साबित किया कि कोई भी आदमी जब प्रधानमंत्री बन जाता है, तो देश की हालत क्या हो जाती है, चंद्रशेखर को देखकर हमें भरोसा हो गया कि इस देश का काम बिना प्रधानमंत्री के भी चल सकता है और डा. मनमोहन सिंह की ऊर्जा बताती है कि कुर्सी मिल जाए तो बुढ़ापे में भी जवानी के वायरस जेनरेट हो जाते हैं।
हालांकि बूढ़ा होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन बूढ़े लोगों द्वारा सत्ता पर कब्ज़ा किए रहना ज़रूर अपराध है। ठीक उसी प्रकार जैसे ब्रह्मचारी होना कोई पाप नहीं है, लेकिन ब्रह्मचारी का पुत्र होना तो हन्ड्रेड परसेन्ट पाप है, आज के ज़माने में राम जैसी मर्यादित सन्तान की इच्छा करना कोई अपराध नहीं है, लेकिन इस चक्कर में दशरथ की तरह तीन-तीन लुगाइयां लाना अवश्य अपराध है। ये बात मैंने इसलिए की क्योंकि हमारे यहां पुरातन परम्परा रही है, राजा-महाराजाओं की ये रीत रही है कि जैसे ही सन्तान युवा हो जाए, शासन का दायित्व उसे सौम्प कर, स्वयं वाया वानप्रस्थ होते हुए सन्यास आश्रम की ओर निकल लो, ताकि प्रजा को सतत ऊर्जावान राजा की छत्रछाया उपलब्ध रहे और समय के साथ-साथ सत्ता का तेवर भी बदले। लेकिन अपने यहां शास्त्रों को पूजा तो जाता है, पढ़ा भी जाता है और उनके कारण दंगा-फ़साद भी हो जाता है, लेकिन शास्त्रों की बात मानता कोई नहीं। 
जब कोई मानता ही नहीं और मानना चाहता भी नहीं तो मैं क्यों माथा मारूं यार? हटा सावन की घटा, जो होता है हो जाने दे.... चल हवा आने दे......

6 comments:

श्यामल सुमन May 23, 2009 at 3:06 PM  

ठीक, मदारी की तरह नेता करे कमाल।
औसत मंत्री-उम्र है साढ़े बासठ साल।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

नितिन | Nitin Vyas May 23, 2009 at 4:25 PM  

बढ़िया लेख, अभी बहुत साल लगेंगे अपने देश में युवा की परिभाषा बदलने में। अब ७८ साल के प्रधानमंत्री जी के लिये ६० वाले तो युवा ही हुए ना!!

रंजन May 23, 2009 at 9:35 PM  

"राजीव गांधी, वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर और डा. मनमोहनसिंह में क्या फ़र्क है- मैंने कहा-राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना ये दर्शाता है कि कोई भी आदमी, हमारे देश का प्रधानमंत्री बन सकता है, वी.पी. सिंह ने ये साबित किया कि कोई भी आदमी जब प्रधानमंत्री बन जाता है, तो देश की हालत क्या हो जाती है, चंद्रशेखर को देखकर हमें भरोसा हो गया कि इस देश का काम बिना प्रधानमंत्री के भी चल सकता है और डा. मनमोहन सिंह की ऊर्जा बताती है कि कुर्सी मिल जाए तो बुढ़ापे में भी जवानी के वायरस जेनरेट हो जाते हैं"

क्या तुलना की है.. बहुत करारा मारा..

Kumar Anurag May 24, 2009 at 1:08 AM  

अलबेला भाई नमस्कार. आप जितने खुबसूरत है, ब्लॉग भी आपने उतना ही खुबसूरत बना रखा है. सामग्री का तो कहना ही क्या!
इतनी सरलता से आपने व्यंग लिखा हैं, सबके बस में संभव नहीं है. हमारा समाज लम्बे समय से मानसिक रूप से इस लिए पिछड़ा हुआ रहा कि हमारे राजनीतिज्ञओं की सोची-समझी चाल रही है कि जन साधारण हमेशा पिछड़ा ही रहे, और नारकीय जीवन गुजारे, यह व्यवस्था आदि युग से चली आ रही है. धूर्त लोग इसे राजनीती का हतियार बना डाला. हम प्रगतिशील न बने ऐसी इन्होने व्यवस्था रची. परिणाम स्वरुप दस्यु एवं दस्युसुंदरी का पदार्पण हुआ. और कालांतर में इन्हें भी राजीनति करने दिया गया. फिर हमारी सामाजिक-राजनीती परिवेश ऐसा बदला कि अच्छे -अच्छे लोग समझ नहीं पाए. लम्बे समय से गिद्ध की दृष्टि रखने वाली पार्टी भी जनता को नोच-नोच कर खाने के जुगार में लगी रही. फिर सांप्रदायिक पार्टी भी को मिला. जनता को बेवकूफ बनाने लगी. ऐसी पार्टी के लोग सांप्रदायिक कट्टर नास्तिक हैं. सिर्फ जनता को भएभीत कर फिर उनसे अपना उल्लू सीदा करना ही उनका मकसद रहा है, कहने को तो बहुत कुछ हैं पर---- फिर अलबेला साहब आपको शुक्रिया इस लिए की आपने मेरा ब्लॉग देखा और अपनी प्रतिक्रिया देकर मेरा सम्मान बढाया.
अरुण कुमार झा मेरे वेबसाइट और ब्लॉग पर आपका एक बार फिर स्वागत है, www.drishtipat.com & http://drishhtipatpatrika.blogspot.com. http://ranchihalchal.blogspot.com

Shashi Bhushan Tamare May 24, 2009 at 10:57 AM  

satyam shivam sundaram.thanks.

जयंत - समर शेष May 24, 2009 at 11:57 AM  

" चल हवा आने दे......"
Waah waah!!!

Lekin desh ki to hawaa band hai..
aane kahaan se den??

Waise bhi Rahul to parde ke peeche se sabako nachaataa hai..
To fir ek maamuli saa mantri ban ke kyaa karane kaa???
Bole to, pecche rahane kaa aur shaan se jeene kaa!!!!!!!!!

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