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Albela Khatri

कवि की कलम का जनम नहीं होता है....

रात न ढले तो कभी


भोर नहीं होती बन्धु


सांझ न ढले तो कभी तम नहीं होता है



लोहू तो निकाल सकता


तेरे पाँव में से


कांच से मगर घाव कम नहीं होता है



जीने की जो चाह है तो


मौत से भी नेह कर


डरते हैं वो ही जिनमें दम नहीं होता है



सच मानो जब तक


पीर का काग़ज़ न हो


कवि की कलम का जनम नहीं होता है

14 comments:

शिवम् मिश्रा October 21, 2009 at 3:20 PM  

साधू साधू साधू !!

Mohammed Umar Kairanvi October 21, 2009 at 3:40 PM  

क्‍या खूब कहा डरते वही हैं जिनमें दम नहीं होता, बहुत सुन्‍दर अलबेली रचना,

M VERMA October 21, 2009 at 5:09 PM  

बहुत खूब

राज भाटिय़ा October 21, 2009 at 5:51 PM  

बहुत सुंदर लिखा आप ने .
धन्यवाद

शरद कोकास October 21, 2009 at 8:34 PM  

पीर के कागज़ पर कवि की कलम का जन्म यह बहुत ही सुन्दर बिम्ब है अलबेला भाई और यही यथार्थ है ।

मनोज कुमार October 21, 2009 at 11:24 PM  

इस रचना ने मन नोह लिया।

M VERMA October 21, 2009 at 11:25 PM  

पीर का कागत और कलम ---
बहुत खूब

राजीव तनेजा October 21, 2009 at 11:37 PM  

बहुत बढिया बात कह दी आपने

Udan Tashtari October 22, 2009 at 6:04 AM  

जय हो!! बहुत उम्दा!

Urmi October 23, 2009 at 8:24 AM  

बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना दिल को छू गई!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' October 23, 2009 at 2:31 PM  

कम शब्दों मे काम की बात।
यही तो आपकी खूबी है जी!

डॉ टी एस दराल October 23, 2009 at 8:24 PM  

बहुत खूब बात कही है. पर ये एक दम से संजीदा कैसे हो गए बंधू?

alka mishra October 24, 2009 at 5:47 PM  

wihangam rachna
nice

Dr. Sudha Om Dhingra October 26, 2009 at 5:51 PM  

अलबेला भाई, बहुत खूब, कमाल कर दिया.

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