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Albela Khatri

इतनी महंगाई में भी ज़िन्दा हैं हम,,,,, यह किसी बलिदान से कुछ कम नहीं




नम्रता
यदि ज्ञान से कुछ कम नहीं


तो अहम अज्ञान से कुछ कम नहीं




सड़ रहे हैं शव जहां पर प्राणियों के


वे उदर श्मशान से कुछ कम नहीं




जिस हृदय में प्रेम और करुणा नहीं


वो हृदय पाषाण से कुछ कम नहीं




इतनी महंगाई में भी ज़िन्दा हैं हम


यह किसी बलिदान से कुछ कम नहीं




आचरण यदि दानवों का छोड़ दे तो


आदमी भगवान से कुछ कम नहीं




काव्य में जिसके कलेजे की क़शिश है


वह कवि रसखान से कुछ कम नहीं



आपने अलबेला की कविताएं पढ़ लीं

यह किसी ऐहसान से कुछ कम नहीं



11 comments:

महफूज़ अली November 19, 2009 at 9:45 AM  

इतनी महंगाई में भी ज़िन्दा हैं हम,,,,, यह किसी बलिदान से कुछ कम नहीं .....

bilkul sahi kaha aapne....

Mithilesh dubey November 19, 2009 at 9:57 AM  

अरे नहीं सर जी एहसान तो आप करते है जो हमे अच्छी रचनायें पढ़ने को देते है ।

जी.के. अवधिया November 19, 2009 at 9:58 AM  

"जिस हृदय में प्रे और करुणा नहीं
वो हृदय पाषाण से कुछ कम नहीं"


बहुत सुन्दर!

खुशदीप सहगल November 19, 2009 at 10:19 AM  

अलबेला जी,
कविता से आपके अंदर की आग झलक रही है...वैसे मिस्टर नटवरलाल का एक गाना आपने भी सुना होगा...
ये जीना भी कोई जीना है... लल्लू
मैंने एक पोस्ट लिखी थी...सपनों की रोटी...उसका लिंक दे रहा हूं...पढ़िएगा ज़रूर
http://deshnama.blogspot.com/2009/08/blog-post_6948.html
जय हिंद...

Babli November 19, 2009 at 10:28 AM  

जिस हृदय में प्रेम और करुणा नहीं
वो हृदय पाषाण से कुछ कम नहीं
बिल्कुल सही बात है ! दिल को छू गई आपकी ये पंक्तियाँ!
आपने अलबेला की कविताएं पढ़ लीं
यह किसी ऐहसान से कुछ कम नहीं
खत्री जी इसमें ऐहसान कैसा? बल्कि आपकी रचनाएँ पढ़ना तो मुझे बेहद अच्छा लगता है!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक November 19, 2009 at 11:52 AM  

प्यार का पल चाहते पाषाण भी हैं।
इन पहाड़ों में बसे कुछ प्राण भी हैं।।

पत्थरों में भी हृदय है, पत्थरों में भी दया है।
चीड़ का परिवार, इनके अंक में ही बस गया है।

पत्थरों के देवता हैं,पत्थरों के घर बने हैं।
पत्थरों में पक्षियों के,घोंसले सुन्दर घने हैं।

पत्थरों में प्राण भी हैं,और हैं, पाषाण भी।
पत्थरों में आदमी हैं,और हैं भगवान भी।

मात्र ये कंकड़ नही,कल्याण भी हैं।
इन पहाड़ों में बसे,कुछ प्राण भी हैं।।

शिवम् मिश्रा November 19, 2009 at 12:55 PM  

"आपने अलबेला की कविताएं पढ़ लीं

यह किसी ऐहसान से कुछ कम नहीं"

आपका यह कहना हमारे लिए किसी जूत्ते से कम नहीं !
आपको पसंद करते है सो पढ़ते है , आप पर नहीं यह हम खुद पर ऐहसान करते है !

अर्शिया November 19, 2009 at 2:01 PM  

सत्य वचन।
------------------
11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?

Pratik Maheshwari November 19, 2009 at 2:44 PM  

बहुत ही सुन्दर लाईनें.. :
सड़ रहे हैं शव जहां पर प्राणियों के
वे उदर श्मशान से कुछ कम नहीं


आभार
प्रतीक माहेश्वरी

राज भाटिय़ा November 19, 2009 at 5:38 PM  

आपने हमारी की टिपण्णी पढ़ लीं

यह किसी ऐहसान से कुछ कम नहीं
बहुत सुंदर जी

prashant November 21, 2009 at 10:59 AM  

रूलाने के लिये तो बहुत से मर्ज हैं
हसाने के लिए आप का ब्लाग है ये कम नहीं(बहुत ज्यादा है)


आप का ब्लाग पढ़ के मन खुस हो गया इसी तरह लिखते रहें ।

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