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Albela Khatri

अन्धों में राजा बन बैठे, आज यहाँ कुछ काने लोग

बुरा-भला कह रहे शमा को कुछ पागल परवाने लोग

बन्द किवाड़ों को कर बैठे, घर घुस कर मर्दाने लोग



पानी बिकने लगा यहाँ पर,कसर हवा की बाकी है

भटक-भटक कर ढूंढ रहे हैं गेहूं के दो दाने लोग



और पिलाओ दूध साँप को , डसने पर क्यों रोते हो?

कहना माना नहीं हमारा , देते हैं यों ताने लोग



कैसा है ये चलन वक़्त का ,समझ नहीं कुछ आता है

अन्धों में राजा बन बैठे, आज यहाँ कुछ काने लोग

14 comments:

Ratan Singh Shekhawat September 5, 2009 at 8:20 AM  

सत्य वचन :)

जी.के. अवधिया September 5, 2009 at 8:59 AM  

पानी बिकने लगा यहाँ पर, कसर हवा की बाकी है

वाह खत्री जी, बिल्कुल सही कहा!

मात्र 30-35 साल पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि भारत जैसे देश में, जहाँ पानी पिलाने को पुण्य का कार्य समझा जाता था, पानी बिकने लगेगा। आपका अनुमान सही है कि कुछ दिनों में हवा भी बिकने लगेगा।

Mithilesh dubey September 5, 2009 at 9:29 AM  

बहुत अच्छे बात तो सच है।

पी.सी.गोदियाल September 5, 2009 at 9:34 AM  

अन्धो में राजा बन बैठे, आज यहाँ कुछ काने लोग !

क्या बात कही !

neeshoo September 5, 2009 at 10:54 AM  

वाह वाह क्या बात है सर जी , मजा आगया पढ़ कर ।

ओम आर्य September 5, 2009 at 11:00 AM  

बहुत ही सुन्दर रचना........

Nirmla Kapila September 5, 2009 at 11:23 AM  

सच मे यहाँ पानी बिकने लगे वहाँ और किस का राज कहा जा सकता है निस्संदेह अन्धों मे काने राजे का अच्छी रचना है आभार्

शिवम् मिश्रा September 5, 2009 at 12:37 PM  

"पानी बिकने लगा यहाँ पर,कसर हवा की बाकी है

भटक-भटक कर ढूंढ रहे हैं गेहूं के दो दाने लोग"


"कैसा है ये चलन वक़्त का ,समझ नहीं कुछ आता है

अन्धों में राजा बन बैठे, आज यहाँ कुछ काने लोग"




सत्य वचन, सत्य वचन !!
वाह खत्री जी, बिल्कुल सही कहा!!

दीपक भारतदीप September 5, 2009 at 12:52 PM  

क्या बात है? वाह!
दीपक भारतदीप

चंदन कुमार झा September 5, 2009 at 1:02 PM  

बहुत ही सत्य बहुत ही कटु।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" September 5, 2009 at 6:05 PM  

कैसा है ये चलन वक़्त का ,समझ नहीं कुछ आता है

अन्धों में राजा बन बैठे, आज यहाँ कुछ काने लोग ||

लाजवाब्!! बिल्कुल सही बात कही है!!

रज़िया "राज़" September 5, 2009 at 7:47 PM  

मज़ा आ गया कविता पढकर,वाह!बहुत अल्बेलाजी।

देखो देने कैसे लगते,आज यहाँ हैं सयाने लोग।

राजीव तनेजा September 5, 2009 at 9:47 PM  

सुना है कि अगला विश्वयुद्ध भी पानी को लेकर ही होने वाला है...


सच्चाई से परिपूर्ण सुन्दर रचना

Udan Tashtari September 6, 2009 at 5:16 AM  

सही, सीधी और सच्ची बात!!

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