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Albela Khatri

जो भी मिला बहुत मिला, सन्तोष कीजिए

गफ़लत तो ख़ूब हो चुकी, अब होश कीजिए

जो भी मिला बहुत मिला, सन्तोष कीजिए

वो तो पलक झपकने से भी पहले आएगा

बशर्ते अपने आप को निर्दोष कीजिए

7 comments:

Gyan Darpan September 3, 2009 at 7:04 AM  

बहुत कम शब्दों में सटीक बात !

श्यामल सुमन September 3, 2009 at 7:12 AM  

बशर्ते अपने आप को निर्दोष कीजिए।

काश सबकी ऐसी कोशिश हो। खूबसूरत भाव अलबेला भाई।

ताऊ रामपुरिया September 3, 2009 at 12:59 PM  

बहुत सही.

रामराम.

Chandan Kumar Jha September 3, 2009 at 1:23 PM  

बहुत सुन्दर कहा आपने.

subhash Bhadauria September 3, 2009 at 2:23 PM  

अलबेलाजी आपकी इसी जमीन पर हमारी ताज़ा ये पंक्तियाँ देखिए-

मरने से पहले हमको न ख़ामोश कीजिए.
कोशिश हमारे दुश्मनो पुरज़ोश कीजिए.

शूली पे मुस्कारा के चढ़ो वक्त आने पर,
इज़्ज़त को यूँ वतन की न नामोश कीजिए. डॉ.सुभाष भदौरिया.

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" September 3, 2009 at 3:34 PM  

बिल्कुल सही कहा जी!!!!

राजीव तनेजा September 3, 2009 at 11:45 PM  

संतोष परम सुखम...

लेकिन संतोष किसे है आज के ज़माने में?...सभी तो निन्यानवे के फेर में लगे हुए हैँ

बढिया रचना

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