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Albela Khatri

कविता : तीन अवस्थायें

शब्द-शब्द जब मानवता के हितचिन्तन में जुट जाता है

तम का घोर अन्धार भेद कर दिव्य ज्योति दिखलाता है

जब भीतर की उत्कंठायें स्वयं तुष्ट हो जाती हैं

अन्तर में प्रज्ञा की आभा हुष्ट-पुष्ट हो जाती है

अमृत घट जब छलक उठे

बिन तेल जले जब बाती

तब कविता उपकृत हो जाती

अमिट-अक्षय-अमृत हो जाती



देश काल में गूंज उठे जब कवि की वाणी कल्याणी रे

स्वाभिमान का शोणित जब भर देता आँख में पाणी रे

जीवन के झंझावातों पर विजय हेतु संघर्ष करे

शोषित व पीड़ित जन गण का स्नेहसिक्त स्पर्श करे

आँख किसी की रोते-रोते

जब सहसा मुस्का जाती

तब कविता अधिकृत हो जाती

साहित्य में स्वीकृत हो जाती



क्षुद्र लालसा की लपटें जब दावानल बन जाती हैं

धर्म कर्म और मर्म की बातें धरी पड़ी रह जाती हैं

रिश्ते-नाते,प्यार-मोहब्बत सभी ताक पर रहते हैं

स्वेद-रक्त की जगह रगों में लालच के कण बहते हैं

त्याग तिरोहित हो जाता

षड्यन्त्र सृजे दिन राती

तब कविता विकृत हो जाती

सम्वेदना जब मृत हो जाती


7 comments:

Udan Tashtari July 7, 2009 at 1:19 AM  

बहुत गहरे भाव लिए बेहतरीन अभिव्यक्ति!!

राजीव तनेजा July 7, 2009 at 2:03 AM  

बात तो सही है...


बढिया रचना

M VERMA July 7, 2009 at 4:22 AM  

तब कविता विकृत हो जाती
सम्वेदना जब मृत हो जाती
===
सघन भाव
उत्कृष्ट कविता

Dr. Sudha Om Dhingra July 7, 2009 at 7:29 AM  

अलबेला भाई,
अति उत्तम कविता--वह क्या खूब कहा--
जब भीतर की उत्कंठायें स्वयं तुष्ट हो जाती हैं
अन्तर में प्रज्ञा की आभा हुष्ट-पुष्ट हो जाती है
अमृत घट जब छलक उठे
बिन तेल जले जब बाती
तब कविता उपकृत हो जाती
अमिट-अक्षय-अमृत हो जाती

और इन पंक्तियों की खूबसूरती--

आँख किसी की रोते-रोते
जब सहसा मुस्का जाती
तब कविता अधिकृत हो जाती
बहुत -बहुत बधाई!

Vivek Rastogi July 7, 2009 at 8:48 AM  

स्वेद-रक्त की जगह रगों में लालच के कण बहते हैं

वाह क्या भाव हैं ।

Anil Pusadkar July 7, 2009 at 9:25 AM  

अलग अंदाज़,अलबेला अंदाज़्।शानदार्।

Murari Pareek July 7, 2009 at 9:44 AM  

आप तो हर रंग मैं लाजवाब लिखते हो अति सुन्दर !! भगवान् ने सोचा कौन अलग अलग कलाकार बनाने का झंझट करेगा !! ये बच्चे कलाकारों का मशाला इसी में भर दो !!

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