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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

अपनी ही आग में उबलता है आदमी .......

शूलों से जो डर-डर

चलता है आदमी तो

पांव नीचे फूलों को मसलता है आदमी


अन्न जैसे कंचन को

कूड़ा कर फैंकता है

अमृत पी ज़हर उगलता है आदमी


जाने किस बात की

अकड़ है जो ऐंठ -ऐंठ

दो-दो फीट ज़मीं से उछलता है आदमी


गौर से जो देखा बन्धु

मुझे ऐसा लगा जैसे

अपनी ही आग में उबलता है आदमी

5 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar July 10, 2009 at 12:19 PM  

अलबेला जी, बहुत सुंदर.

ताऊ रामपुरिया July 10, 2009 at 12:55 PM  

वाकई जबरदस्त कहा.

रामराम.

महेन्द्र मिश्र July 10, 2009 at 1:11 PM  

बहुत सुन्दर रचना अलबेला जी बधाई.

Murari Pareek July 10, 2009 at 5:19 PM  

वाह वाह कुछ ऐसा :
इन्सां से ज्यादा किसकी है हालत तबाह|
इन्सां से ज्यादा कौन है नामा-स्याह ||
यह वो जिसकी रोज घटती है उम्र|
यह वो है जिसके रोज बढ़ते है गुनाह ||

Sheena July 10, 2009 at 6:25 PM  

bahut hi zabardast rachna..
badhai

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