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Albela Khatri

फिर भी हमको कम लगती अपने हिस्से की धूप........

सागर में भी सूखा है मन

जाने कितना भूखा है मन

जितना चाहा उतना पाया, सपनों के अनुरूप

फिर भी हमको कम लगती अपने हिस्से की धूप



सपनों का संगीत अधूरा, अरमानों का गीत अधूरा

हार अधूरी, जीत अधूरी, जीवन की हर रीत अधूरी

मेले में भी तन्हा है मन

क्यों उलझा उलझा सा है मन

हाथों की इन रेखाओं में है सारा अभिरूप

फिर क्यों हमको कम लगती अपने हिस्से की धूप



कौन हैं अपने कौन पराये, हमको डराते अपने ही साये

छांव में बैठा मन ललचाये, धूप मिले तो खिल खिल जाए

चलते चलते हारा जीवन

बिखरा बिखरा सारा जीवन

और मिले कुछ धूप तो निखरे जीवन का रंग रूप

क्योंकि हमको कम लगती अपने हिस्से की धूप

7 comments:

Udan Tashtari August 27, 2009 at 8:35 AM  

बेहतरीन भाई!! सभी को ऐसा लगता है!

Sudhir (सुधीर) August 27, 2009 at 9:52 AM  

वाह अलबेला जी सबके दिल की बात की हैं आपने ....साधू

Sheena August 27, 2009 at 10:55 AM  

हाथों की इन रेखाओं में है सारा अभिरूप
िर क्यों हमको कम लगती अपने हिस्से की धूप

bahut khoob kaha aapne

-Sheena

रज़िया "राज़" August 27, 2009 at 11:49 AM  

शब्दों में जैसे जीवन को उतार दिया है आपने। वाह!!!!!

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) August 27, 2009 at 12:30 PM  

बहुत खूब.. आपकी बात पढ़कर तो हमें भी ऐसा ही लग रहा है.. हैपी ब्लॉगिंग :)

ओम आर्य August 27, 2009 at 4:31 PM  

ऐसा ही जीवन का एहसास है या मानव मन की न बुझने वाली प्यास ..........बहुत ही सुन्दर पन्क्तियाँ है जिसको सिर्फ महसूस कर सकते है ......

राजीव तनेजा August 27, 2009 at 11:02 PM  

आम जन-मानस की आवाज़ होती हैँ आपकी सभी रचनाएँ ...

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