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Albela Khatri

मैं आकण्ठ ऋणी हूँ माता ! तेरे अनुपम प्यार का........

अपनी अपनी माँ से कहता

हर व्यक्ति संसार का

मैं आकण्ठ ऋणी हूँ माता !

तेरे अनुपम प्यार का



तुमने मुझको जनम दिया माँ, ये दुनिया दिखलाई

तेरे आँचल में गूंजी मेरे शैशव की शहनाई

तेरी गोद में खेले मेरे बचपन और तरुणाई

तेरी ममता की छाया में मैंने प्रौढ़ता पाई

साँस साँस से मैं कृतज्ञ हूँ

तेरे
लाड़ दुलार का

मैं आकण्ठ ऋणी हूँ माता !

तेरे अनुपम प्यार का



बेशक मुझको याद नहीं अब मैंने तुमको कितना सताया

कभी बीमारी, कभी शरारत, रोज़ नया उत्पात रचाया

कितने दिन का चैन हर लिया, कितनी रातें तुम्हें जगाया

फ़िर भी तुम गीले में सोयीं और मुझे सूखे में सुलाया

मैं ना क़र्ज़ चुका पाऊंगा

माँ
तेरे उपकार का

मैं आकण्ठ ऋणी हूँ माता !

तेरे
अनुपम प्यार का




5 comments:

शरद कोकास August 23, 2009 at 11:24 PM  

"फ़िर भी तुम गीले में सोयीं और मुझे सूखे में सुलाया " अलबेला भाई इस पंक्ति का निहितार्थ तो माँ हुए बगैर समझना सम्भव ही नहीं है । हमारी वह क्षमता ही कहाँ कि इस मातृ ऋण से उऋण

राजीव तनेजा August 24, 2009 at 12:38 AM  

हर बच्चे की यही पुकार

माँ कर दे मेरी नैय्या पार

Babli August 24, 2009 at 6:43 AM  

बहुत ख़ूबसूरत और दिल को छू लेने वाली रचना लिखा है आपने! माँ का प्यार अमूल्य है! कितने तकलीफें उठाकर हमें पाल पोसकर बड़ा करती हैं माँ और उनके लिए जितना भी कहा जाए कम है! माँ और पिताजी दोनों ही भगवान समान है! बहुत पसंद आया आपकी ये रचना!

रज़िया "राज़" August 24, 2009 at 10:50 AM  

"माँ"के प्रति आपकी रचना बेहद सुंदर।"माँ" जैसी ही!!!!

चंदन कुमार झा August 25, 2009 at 2:07 AM  

माँ तो ऐसी ही होती है.....बहुत सुन्दर रचना. आभार.

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