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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

हे भगवान् ! ये रचना इतनी ज़्यादा sexy क्यों है ?

हे भगवान !


हे जगदीश्वर !


हे त्रिलोकी के प्राइम मिनिस्टर !



ये कैसा संसार है ?


जहाँ देखो...


sex का बाज़ार है



फ़िल्मों वाले अश्लील दैहिक खेल बेच रहे हैं


टी.वी. वाले व्यभिचारिक तालमेल बेच रहे हैं


अखबार वालों को


कुछ मिला तो


विज्ञापन की आड़ में सांडे का तेल बेच रहे हैं




दाता !


विधाता !


ये तुमने.... कैसी रचना की रचना की है रचनाकार !


जिसकी संरचना में है 84 लाख योनियों की भरमार !


हम तो थक गए यार


हम तो टूट गए यार


इन योनियों को पार करते-करते


बार-बार जन्मते, बार-बार मरते




अब ये मानवी योनि मिली है


तो मन की कलियाँ खिली हैं



लेकिन दोबारा किसी योनि में आना पड़े


इसका क्या इन्तेज़ाम है ?



ये बात मैं तब तक नहीं पूछूंगा जब तक कि


पहलू में ललना हाथों में जाम है




लेकिन हे गोवर्धन गिरधारी !

नटवर नागर ! कृष्ण मुरारी !


मन करता है


एक सवाल करूँ तुझसे


जानूं तुझसे


कि आख़िर क्या लाचारी थी जो ये रचना ऐसी रचाई ?


ये रचना तुमने...क्या सोच कर इतनी sexy बनाई ?




जवाब तुम नहीं दोगे, मैं भलीभान्ति जानता हूँ


लेकिन ये अश्लील रचना


केवल वयस्कों के लिए है, मैं तो ऐसा मानता हूँ




11 comments:

Sheena August 29, 2009 at 5:08 PM  

Albela ji

Khuda bhi kabhi khud se sawaal karta hai,
kabhi apni hi banayi aadami naam ki is rachna pe malaal karta hai.
Sochta hai, kaisa hai yeh moorkh aadami,
karta hai khud sare galat kaam,
phir mujhse hi sawaal karta hai...


-Sheena

ओम आर्य August 29, 2009 at 5:52 PM  

शीना जी के विचार से मै भी सहमत हूँ भाई अलबेला जी........सुन्दर रचना

cmpershad August 29, 2009 at 7:53 PM  

यह क्या रचना रचाई?:)

शिवम् मिश्रा August 29, 2009 at 9:52 PM  

सुन्दर रचना |

राजीव तनेजा August 30, 2009 at 12:04 AM  

मज़ेदार रचना

डा. अमर कुमार August 30, 2009 at 2:04 AM  


आओ चलें, जँगल की ओर जहाँ कोई रचना न दिखेगी
और ज़ँगल ज़ँगल फूल खिलायेंगे
फिर धारा 377A खुल कर मनायेंगे

Anil Pusadkar August 30, 2009 at 1:42 PM  

खुदा को बीच मे लाकर जो चाहे कर लो।

विवेक सिंह August 30, 2009 at 2:06 PM  

रचना रचनाकार की है,

रचना रचनाकार की कार लेकर घूमने जाएगी तो 'र' अपनी अम्मा के पीछे रोता हुआ भागेगा,

बचेगा चना,

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता,

उसे बो देने में भलाई है,

जब फसल आयेगी तो फिर से भाड़ फोड़ने की कोशिश की जाएगी !

योगेन्द्र मौदगिल August 30, 2009 at 3:40 PM  

Jai hooooooooooo................

Babli August 31, 2009 at 6:15 AM  

बहुत बढ़िया लगा ! बेहद सुंदर और मज़ेदार रचना !

Murari Pareek August 31, 2009 at 10:35 AM  

वाह अलबेला जी ८४ लाख योनियों का खेल सचमुच बड़ा ही सेक्सी है ||

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